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आशीष नंदी पर मामला दर्ज हो गया और कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम को तमिलनाडु में दिखाए जाने की अनुमति तभी मिली जब वह इसके सात दृश्यों को हटाने को तैयार हो गए। सलमान रुश्दी को कोलकाता जाने नहीं दिया गया और नवीनतम घटनाक्रम में कश्मीर में लड़कियों के रॉकबैंड में गाने-बजाने के विरुद्ध फतवा जारी किया गया है। हाल के वषरें में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगातार प्रहार हो रहे हैं। हमेशा तर्क दिया जाता है कि इससे किसी विशेष जाति, संप्रदाय या वर्ग की भावना आहत होती है। यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ केवल मीठी-मीठी बातें करना है जिसमें किसी की निंदा या आलोचना न हो तो उस स्वतंत्रत

प्रतिबंध को समस्या का एकमात्र समाधान मानने के दुष्परिणाम के रूप में राजधानी दिल्ली में प्लास्टिक व गुटखे पर लगी पाबंदी के बावजूद खुले आम बिक्री, प्रयोग और सेवन के तौर पर देखा जा सकता है। गुटखे पर लगे प्रतिबंध के लगभग तीन माह और प्लास्टिक पर प्रतिबंध को एक माह बीत जाने के बावजूद दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं है जहां प्लास्टिक बैग व गुटखों की उपलब्धता व प्रयोग खुलेआम न दिखता हो। और तो और डलाव व कूड़ा घरों में कूड़े से ज्यादा प्लास्टिक व पॉलीथीन देखने को मिल रहे हैं। मजे की बात तो यह है कि गुटखा उत्पादकों ने इस प्रतिबंध का भी आसान तोड़ निकाल लिया है। चूंकि पान मसाला व तंबा

बारिश आई नहीं कि हमारे शहरों के बखिए उधडऩे लगते हैं। ताशमहल की तरह ढहते पुराने या निर्माणाधीन (अक्सर अवैध) नए मकान, बदहाल सड़कें, जलभराव से अदृश्य बने फुटपाथ, वाहन चालकों के दु:स्वप्न बने सड़कों पर बिछे जर्जर जड़ों वाले उखड़े पेड़, ट्रैफिक जाम और बिना ढक्कन वाले मेनहोलों से भलभलाकर सड़क पर उफनाते शहरी नाले; यह आज मानसूनी महीनों के दौरान देश के तकरीबन हर बड़े शहर का नजारा है। फिर गर्मी आई तो बिजली, पानी की कमी और बीमारियों का प्रकोप चालू हुआ। जब-जब इस बदहाली के दोष का विभिन्न राजनेताओं के बीच बंटवारा होने लगता है, तब-तब कहा जाने लगता है कि हमारा दोष नहीं, अमुक ने

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के चक्कर में पंद्रह महीने जेल में बिताकर लौटे पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा कुछ हफ्ते पूर्व जब चेन्नई पहुंचे तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। उन्मादी भीड़ उस शख्स के लिए आतिशबाजी कर रही थी, जो तमिलनाडु चुनाव में अपनी पार्टी की हार के लिए काफी हद तक जिम्मेदार था। जिसने दुनिया की नजरों में भारत की छवि खराब कर दी और केंद्र सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर दिया। इसके अगले ही हफ्ते राजा जब अपने निर्वाचन क्षेत्र नीलगिरिस व गृहनगर पेरंबलूर पहुंचे तो उनका और भी जबरदस्त स्वागत किया गया। अपने देश और अपनी पार्टी को इतना अधिक नुकसान पहुंचाने पर उन्हें दंडित करने के

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गुरचरण दास

सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा को लेकर जब भी हमारे देश में राज्य सरकारों से जबाव तलब किया जाता है तो उनका दावा होता है कि उनके यहां अब यह समस्या बिल्कुल नहीं। इस कुप्रथा का नामो निशान मिट गया है और इन सफाई कर्मियों का उन्होंने अपने यहां पूरी तरह पुनर्वास कर दिया है, लेकिन इन दावों में कितनी सच्चाई और कितना झूठ है, यह हाल ही में हमारे सामने निकलकर आया। साल 2011 की जनगणना के आंकड़े इन दावों की हवा निकाल रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 50 फीसद भारतीय खुले में शौच को जाते हैं और 13 लाख ऐसे अस्वच्छ शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं, जिनकी साफ-सफाई का जिम्मा आज भी घोषित और अघोषित रूप से

“नरेला इलाके में घर के बाहर खेल रही 6 साल की बच्ची को बहला फुसलाकर पड़ोसी ने किया बलात्कार। अजमेरी गेट इलाके की 14 वर्षीय छात्रा के साथ अध्यापक द्वारा चार साल से किये जा रहे यौन शोषण मामले का सनसनीखेज खुलासा। सफदरजंग अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए देररात महिला वार्ड में घुसकर गर्भवती महिला के साथ बलात्कार का प्रयास। मुंडका में नाबालिक युवती के साथ पड़ोसी द्वारा बलात्कार। उत्तर पश्चिम जिले के महेंद्र पार्क में रूई मांगने के बहाने सर्वोदय विद्यालय की नौवीं कक्षा की छात्रा के साथ पड़ोसी युवक द्वारा बलात्कार।“

लोकपाल बिल कुछ और समय के लिए टल गया है और अन्ना हजारे की टीम ने एक और आंदोलन करने की बात कही है। लोकायुक्त के मसले और लोकपाल को कौन हटा सकता है, लोकपाल से सीबीआई का रिपोर्टिंग संबंध कैसा होगा, जैसे बिंदुओं पर अब भी राजनीतिक दलों में सामंजस्य नहीं है। लेकिन वास्तव में ये सभी बहसें अर्थहीन हैं। वास्तविक समस्या है न्याय प्रक्रिया में होने वाला विलंब। यदि सीबीआई पर लोकपाल का नियंत्रण हो, तब भी अदालतों पर तो उसका कोई नियंत्रण नहीं होगा। निचली अदालतों में अनेक कारणों और अनेक तरीकों से अदालती मामलों को लंबित किया जाता है। यह एक बड़ी समस्या है। जैसा कि एक पुरानी कहावत भी है : देर

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गुरचरण दास

बीते शनिवार को एक जैसे दो समाचार आए। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को एक लाख रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में चार साल की सजा सुनाई गई। इसके अलावा दिल्ली के एक पूर्व न्यायाधीश गुलाब तुलस्यानी को दो हजार रुपये की घूस के बदले तीन साल के लिए जेल भेज दिया गया। पहले मामला का निपटारा 11 साल बाद हुआ और दूसरे का 26 साल बाद। दोनों ही मामलों में फैसला सीबीआइ की विशेष अदालतों ने सुनाया। इसी दिन यह स्पष्ट हो गया कि इन दोनों मामलों को ऊंची अदालतों में चुनौती दी जाएगी यानी अभी अंतिम फैसला आना शेष है। कोई नहीं जानता कि यह कब होगा, लेकिन अंतत: न्याय का चक्र घूमा और भ्रष्ट तत्वों क

आजादी के 6 दशक बीत जाने के बाद भी देश से अस्पृश्यता मिटने का नाम नहीं ले रही है। देश में अब भी ऐसी तमाम जगहें हैं जहां प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दलितों व गैर दलितों के बीच भेदभाव जैसी कुरीति मौजूद है। यह तो तब है जबकि सरकार अस्पृश्यता के मामलों पर जीरो टालरेंस की नीति अपनाए हुए है। वोट बैंक की राजनीति के लिए ही सही सभी राजनैतिक पार्टियां भी अपने आपको दलितों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने में जुटी रहती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी दलितों को समाज में बराबरी के हक के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। कम से कम हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के पंडोह क्षेत्र के चंद मुट्ठ

सुप्रीम कोर्ट ने न्याय पाने के अधिकार को मूल अधिकार बताते हुए अदालत जाने के अधिकार को इसका हिस्सा माना है। इस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी पहल की है। बीते ३१ जनवरी को सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर दिए गए निर्णय के बहुत दूरगामी परिणाम होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भ्रष्टाचार मुक्त समाज में रहना आम जनता का मूल अधिकार है। इसलिए उसे हासिल करने के लिए अदालत में जाना और न्याय प्राप्त करना भी उस मूल अधिकार का हिस्सा है। स्वामी ने केंद्र सरकार को एक प्रत्यावेदन देकर पूर्व संचार मंत्री ए.

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