सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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पिछले कुछ महीनों से देश में एक अजीब-सी मायूसी छा रही थी। महत्वपूर्ण नीतियों में विलंब, भ्रष्टाचार और लोकमत को अनदेखा करने की प्रवृत्ति से निराशा का माहौल बन गया था। लेकिन हताशा के ये बादल अब धीरे-धीरे हटते नजर आ रहे हैं। शुक्रिया उन नागरिकों का जिन्होंने जनहित में लड़ाई लड़ी। इसके अलावा माहौल में परिवर्तन में न्यायालय के निर्णयों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इन्हीं की बदौलत राजनीतिक सुधारों के नागरिकों के प्रयास आंशिक रूप से ही सही, सफल हो पाए। आखिरकार जनता के दबाव और चुनावी राजनीति की मजबूरियों के कारण सरकार को अंतत: कार्रवाई करनी ही पड़ी

18 सितंबर को ग्रीस के निवासी उस समय काफी आहत हुए जब उन्हें वामपंथी रैप गायक की हत्या और पूर्व में नियो नाजी पार्टी से संबंधित गोल्डेन डॉन के एक सदस्य द्वारा हत्या की बात कबूलने की बात पता चली। यह पार्टी उस समय देश में हो रहे ओपिनियन पोल्स में तीसरे क्रम पर चल रही थी। इस मामले को लेकर मचे बवाल के कुछ दिनों के बाद, लोक व्यवस्था मंत्री ने गोल्डेन डॉन से संबंधित 32 आपराधिक मुकदमों का खुलासा प्रमुख अभियोजन के समक्ष किया, जिसे पार्टी के आपराधिक संगठन होने के बाबत फैसला करना था। अगले सप्ताहांत (28 व 29 सितंबर) को गोल्डेन डॉन नेता निकोलस माइकलोलियाकोस, चार अन्य

राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ जारी अभियान अपने निर्णायक मोड़ पर है, लेकिन इसे अभी खत्म नहीं माना जा सकता। तब तो और नहीं, जब हमारे संसदीय लोकतंत्र की नैतिकता में लगातार गिरावट की चिंता स्पष्ट है और इस पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा भी हो रही है। इस दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला 10 जुलाई, 2013 को आया, जिसमें देश की सबसे बड़ी अदालत ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (4) को निरस्त कर दिया। इसके तहत किसी भी मामले में दोषी और कम से कम दो साल की सजा पाए सांसद या विधायक की सदस्यता खत्म हो जाएगी। साथ ही, वह छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य होगा। इस

दागी नेताओं को अयोग्य ठहराने और नकारात्मक मतदान को वैधता देने वाले सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला, एक अरसे से लंबित चुनाव सुधार की जरूरत को बल प्रदान करने वाले हैं। इन फैसलों पर देश में व्यापक सकारात्मक प्रतिक्रिया का आना, संकेत है कि चुनाव सुधार के पक्ष में जनमत तैयार हो रहा है। सुधार को लेकर चुनाव आयोग पहले से ही कोशिशें करता रहा है, लेकिन एक स्वस्थ लोकतंत्र में बदलाव और सुधार की जो प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए वैसा कुछ फिलहाल नहीं दिख रहा। जो समाधान लोकतंत्र के सर्वोच्च निकाय संसद से निकलना चाहिए वो न्यायालय से

जुलाई में अपराधियों को विधायी सदनों में प्रवेश करने से प्रतिबंधित करने का निर्णय सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट ने असंवेदनशील राजनीतिक वर्ग को एक और तगड़ा झटका दिया है। इस बार उसने लंबे इंतजार के बाद मतदाताओं को एक ऐसा अधिकार दे दिया जिसकी मदद से वे राजनीतिक दलों की मनमानी का मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं को चुनाव में उतरने वाले सभी प्रत्याशियों को खारिज करने का विकल्प देकर चुनाव सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। इस फैसले के बाद अब मतदाताओं को ‘इनमें से कोई नहीं’ बटन दबाने का विकल्प मिलेगा। अपने आदेश में शीर्ष

संसद का सत्र आरंभ होते ही नई दिल्ली का माहौल काफी सक्रिय और जोशपूर्ण हो जाता है। बावजूद इसके कि आजकल अधिकतर गतिविधियां संसद में नहीं, बल्कि संसद के बाहर पूरी की जाती हैं। इस बार के मानसून सत्र का अंतिम सप्ताह दो कारणों से महत्वपूर्ण था। पहला, कई वर्षो के गतिरोध के बाद भूमि अधिग्रहण एवं खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए। दूसरा, वह मामले अधिक स्पष्ट दिखाई दिए जहां राजनीतिक दल आसानी से समझौता कायम कर सकते हैं। यहां मैं सूचना का अधिकार, संशोधन विधेयक, 2013 की बात कर रहा हूं। ज्यादातर लोगों का मानना है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 एक ऐसा कारगर

- घरेलू नौकर उपलब्ध कराने वाली दिल्ली की प्लेसमेंट एजेंसियों की हकीकत पर आधारित ‘संस एंड डॉटर’ डॉक्यूमेंट्री ने किया सोचने पर मजबूर

-  जीविका फिल्म फेस्टिवल के तीसरे दिन विभिन्न देशों की दस डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का हुआ प्रदर्शन

गांव के एक युवक ने मेरे भोले भाले माता पिता को बहका कर और मुझे अच्छी नौकरी दिलाने और साथ ही साथ पढ़ाई कराने के नाम पर अपने साथ दिल्ली लेकर आया। लेकिन यहां लाकर मुझे एक ऐसे घर में नौकरानी के काम में लगा दिया गया

कुछ महीने पहले मुंबई के सबर्ब विलेपार्ले में पुलिस फुटपाथ को हॉकरों से खाली कराने की मुहिम चला रही थी। उसी दौरान डर से भाग रहे एक हॉकर की मौत हो गई। इसने शहर में एक बड़े विवाद का रूप ले लिया। सांसद प्रिया दत्त और एमएलए कृष्णा हेगड़े ने इस मृत्यु के लिए पुलिस की कार्रवाई को जिम्मेदार बताते हुए एक हॉकर पॉलिसी लागू करने की मांग की।

हर बड़े शहर में हॉकर फुटपाथ और सड़क घेर कर अपना धंधा करते हैं। और हर जगह पुलिस और म्युनिसपैलिटी वाले जब-तब इन हॉकरों को खदेड़ने की मुहिम चलाते हैं। हॉकरों की यह स्थिति मुंबई, दिल्ली, बेंगलूर

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