सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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विभिन्न मामलों में न्यायपालिका द्वारा दी जाने वाली व्यवस्थाओं और टिप्पणियों को पढ़ने के बाद इस पर आश्चर्य होता है कि आखिर हम भारतीय लोग अधिकांश समय न्यायाधीशों को इस तरह की सक्रियता दिखाने के लिए क्यों विवश करते हैं। इस संदर्भ में जो बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है वह यह कि भारत में आज जिस तरह की न्यायिक निगरानी व्यवस्था है यदि वैसा कुछ नहीं होता तो क्या होता? फिर बात चाहे 2जी घोटाले की रही हो, खनन घोटाले की या फिर कोयला खदानों के आवंटन में हुए घपले-घोटालों की, इन सभी मामलों की निगरानी के कार्य में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण और सक्रिय
अगर इस चुनाव अभियान में जो अभी कायदे से शुरू भी नहीं हुआ है, नेताओं द्वारा प्रयोग किए गए शब्दों और भाषा का उदाहरण देने की कोशिश की जाए तो इस आकार के कई लेख तो उन उदाहरणों से भर जाएंगे। सिर्फ यह कहकर ही बात शुरू की जाए कि हम बदजुबानी-असंसदीय भाषा और ठेठ देसी हिसाब से कहें तो गाली-गलौज की भाषा पर चर्चा करना चाहते हैं। किसी को यह समझने में देर नहीं लगेगी कि हम राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, मुलायम सिंह यादव, कुमार विश्वास, शाजिया इल्मी, दिग्विजय सिंह समेत शीर्ष के उन सब नेताओं द्वारा हाल
आपराधिक मामलों का सामना कर रहे विधायकों-सांसदों के मामलों की सुनवाई एक वर्ष में पूरी करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश न केवल राजनीति के अपराधीकरण को रोकने में मील का पत्थर साबित हो सकता है, बल्कि न्याय प्रक्रिया के प्रति आम लोगों के भरोसे को बढ़ाने वाला भी। ऐसे किसी फैसले की जरूरत इसलिए थी, क्योंकि आम तौर पर निचली अदालतों में विधायकों-सांसदों के मामलों की सुनवाई वर्षो तक खिंचती रहती थी। जब तक उनके मामलों का निस्तारण होता था तब तक उनका कार्यकाल पूरा हो जाता था। इस दौरान संबंधित राजनीतिक दल इस तर्क की आड़ लेकर यह उपदेश देते रहते थे कि जब तक

17 दिसंबर के अंक में प्रकाशित अपने लेख में फौजिया रियाज ने मांग की है कि धारा 377 को खत्म कर देना चाहिए। होमोसेक्सुअलिटी पर सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद देशभर में इसको लेकर बहस छिड़ी हुई है। मामला सेक्सुअलिटी से जुड़ा हो तो लोगों की दिलचस्पी काफी बढ़ जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धारा 377 में आपसी सहमति से बनाए जाने वाले समलैंगिक संबंध को भी जुर्म माना गया है। फिलहाल यह धारा वैलिड है, इसलिए यह जुर्म है। ऐसे में समलैंगिकता का समर्थन करने वालों की यह मांग तर्कसंगत लग सकती है कि इस धारा को ही खत्म कर दिया जाए। लेकिन इस मामले में भीड़ का

पिछले दिनों भारत ने विश्व में अपनी प्रतिभा और विज्ञान का लोहा मनवाते हुए, मंगल-ग्रह पर बेहद कम खर्च पर अपना मंगलयान भेजा। दूसरी तरफ़, उसी भारत का सुप्रीम कोर्ट 1861 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए एक कानून में हस्तक्षेप से इनकार करता है, और इसकी जिम्मेदारी संसद को सौंप देता है। ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाया गया 'इंडियन पीनल कोड' का सेक्शन 377 दो वयस्कों के समलैंगिक यौन संबध बनाने को अपराध मानता है, जिसके लिए आपको दस साल की जेल या आजीवन कारावास तक हो सकता है। इस कानून के समर्थकों का कहना है कि समलैंगिक संबंधों से एड्स का खतरा बढ़ता है, हालांकि
समलैंगिकता के विरोधियों का तर्क है कि समलैंगिकता और अप्रजननमूलक यौनाचार परंपरा-विरुद्ध और पश्चिम से आयातित है। लेकिन इस बात के प्रमाण बड़ी संख्या में मिलते हैं कि समाज में स्त्री-पुरुष के बीच प्रजननमूलक यौन-क्रिया के अलावा विभिन्न प्रकार के यौन-संबंध हमेशा से बनते रहे हैं। साथ ही, ऐसे यौनाचारों को लेकर विभिन्न प्रतिक्रियाएं भी रही हैं। पढ़ें :
 
समलैंगिकता: बहस के कुछ सन्दर्भ

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सेक्स को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया है। ट्विटर पर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का काफी विरोध हो रहा है। सेक्शन 377 को खत्म करने की एक मुहिम चली हुई है। पढ़िए, जानेमाने लोगों ने क्या लिखा...

 

भारत ने प्रेम बैन कर दिया है। शेम...शेम।

तस्लीमा नसरीन, लेखिका

 

हम गे कपल्स के पीछे पुलिस लगा देंगे। क्या 21वीं सदी में ऐसा भारत

370 हटाने पर दृढ़, फैसला थोपेंगे नहीं
 
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को हमें दो पहलुओं से देखना होगा। इसका ऐतिहासिक पक्ष और फिर मौजूदा स्थिति। आजादी के ठीक पहले देश का 60 फीसदी हिस्सा ब्रिटिश इंडिया में था और 40 फीसदी हिस्सा रियासतों में बंटा हुआ था। आबादी के लिहाज से 30 करोड़ लोग ब्रिटिश इंडिया में रहते थे और शेष 10 फीसदी रियासतों में। कुल 552 रियासतें थीं, जिनमें जम्मू-

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