सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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धन, धन होता है। यह काला और सफेद नहीं होता। धन को काले और सफेद (कानूनी और गैर कानूनी) में विभाजित करना ही असल समस्या है। जैसे ही सरकार अथवा कोई सरकारी संस्था धन को काले या सफेद में वर्गीकृत करती है, उक्त धन अपना नैसर्गिक गुण अर्थात और धन पैदा करने की क्षमता समाप्त कर देता है। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा नुकसान, मौजूदा धन की सहायता से और धन पैदा न कर पाने की क्षमता पहुंचाती है। आगे बढ़ने से पहले हमें गैरकानूनी अर्थात काले धन की उत्पत्ति को समझना होगा। मोटे तौर पर काले धन का मुख्य कारण सरकार द्वारा लोगों को अधिक आय अर्जित करने
खराब नीतियों द्वारा थोपे गए नुकसान भयानक हो सकते हैं, लेकिन टीवी के एंकरों का ध्यान इन पर कभी नहीं जाता। जनता की नजर भी इन पर तभी जाती है, जब कोई विशाल संख्या ऐसे नुकसानों के साथ नत्थी कर दी जाती है (मसलन 2 जी स्पेक्ट्रम और कोल ब्लॉक्स के मामले)। इन मामलों से जुड़ी संख्याएं बाद में बढ़ा-चढ़ा कर पेश की गई प्रतीत हुईं, लेकिन हर तरफ फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों के गुस्से को आकार देने में इनकी एक भूमिका जरूर रही। दुर्भाग्यवश, खराब कानूनों और लालफीताशाही से होने वाले नुकसान को लेकर हमारे पास
क्या राजनैतिक दलों की कार्यप्रणाली पारदर्शी होनी चाहिए? यह सवाल हमारे सामने मई 1999 से मौजूद है जब विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया था। उस रिपोर्ट में कहा गया था, ‘तर्क की कसौटी पर कसें तो यदि लोकतंत्र और जवाबदेही हमारी संवैधानिक प्रणाली के केंद्रीय तत्व हैं तो यही अवधारणा राजनैतिक दलों पर भी लागू होती है और उनके लिए बंधनकारी है। यह संसदीय लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं। राजनैतिक दल ही सरकार बनाते हैं, संसद का गठन करते हैं और देश की सरकार चलाते हैं। इस प्रकार राजनैतिक दलों
पिछले कुछ दिनों से 'पीके' फिल्म दो कारणों से चर्चा में है। पहला, कमाई के मामले में नित्य नए रिकॉर्ड बनाने के कारण और दूसरा, धर्म के नाम पर होने वाले आडम्बरों पर कटाक्ष करने और अपने खिलाफ होने वाले हिंसक प्रदर्शनों की मार झेलने के कारण। हालांकि विरोध प्रदर्शन के केंद्र बिंदू में अभिनेता 'आमिर खान' ही हैं। संभव है कि ऐसा उनके दूसरे धर्म यानि कि मुसलमान होने के कारण हो रहा हो, क्योंकि धर्म आधारित पाखंडों पर फिल्में पहले भी बनती रहीं हैं और हल्के फुल्के विरोध भी होते रहे हैं। श्रेष्ठ उदाहरण के
जब आप यूरोप में यात्रा करें तो आमतौर पर आपको ट्रेन या बस में अापके टिकट की जांच करने वाला टिकट इंस्पेक्टर दिखाई नहीं देता। आप ऐसी कई यात्राएं कर सकते हैं, जिसमें आपके टिकट की जांच ही न हो। किंतु काफी समय बाद अचानक न जाने कहां से तीन-चार इंस्पेक्टर प्रकट होंगे। सारे दरवाजों पर खड़े हो जाएंगे और तेजी से टिकटों की जांच कर लेंगे। जिसके पास टिकट नहीं होगा, उसे तत्काल वास्तविक कीमत का 150 गुना दाम चुकाना होता है। कोई बहाना नहीं चलता है। जुर्माना नहीं भरा तो आपको हिरासत में ले लिया जाएगा। हर यात्रा
तो हमने उबर पर प्रतिबंध लगा दिया और इसके साथ एप आधारित सारी टैक्स कंपनियों पर भी पाबंदी लगा दी, क्योंकि मोबाइल एप कंपनी में रजिस्टर्ड ड्राइवर ने टैक्सी में सवार दिल्ली की युवती से दुराचार किया था। कारण बताया गया कि उबर ने पंजीयन नहीं कराया और उस प्रक्रिया का पालन नहीं कराया, जो एक रेडियो कंपनी को करना चाहिए और स्वतंत्र रूप से अपने ड्राइवरों की पृष्ठभूमि की पर्याप्त जांच नहीं की। उनका सत्यापन नहीं कराया। बेशक, सरकार ने नहीं बताया कि कंपनी को दुराचार की घटना होने के पहले महीनों तक क्यों काम करने दिया गया।
भारत में न्याय मिलने में विलंब के लिए कई प्रक्रियागत खामियां जिम्मेदार हैं। न्याय प्रक्रिया में सुधार के लिए कुछ कदम उठाए जाने चाहिए। 
स्वायत्तता के तमाम प्रावधानों के बावजूद भारत में न्यायपालिका आज भी आर्थिक रूप से सरकार पर ही निर्भर है। कहने को न्यायपालिका हमारी प्रणाली का एक अहम और पृथक अंग है पर न्यापालिका के लिए अलग से कोई बजट नहीं होता है, जैसा कि रेलवे के लिए होता है। 
दिल्ली में पिछले शुक्रवार की रात उबेर नामक कंपनी के एक टैक्सी ड्राईवर द्वारा एक कंपनी में कार्यरत महिला पर बलात्कार कर लिया गया. महिला ने बहादुरी के साथ अपना संयम खोये बगैर उस टैक्सी का फोटो अपने कैमरे पर ले लिया और शनिवार की सुबह उसने पुलिस में इस घटना की रिपोर्ट कर दी. शाम होते होते वह टैक्सी ड्राईवर मथुरा में अपने आवास से गिरफ़्तार भी हो गया. जिस संयम से उस बहादुर महिला ने अपने सम्मान से खेलने वाले को कानून के हाथों में पहुंचाया था उसके बाद वास्तव में वह महिला बुद्धिमानी से भरी बहादुरी की मिसाल बन जाना चाहिये था. टीवी पर उसकी समय

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