अधिक जानकारी के लिये देखें : http://www.ccs.in/rule-of-law.asp
सभी हैं कानून के अधीन
अक्टुबर 24, 2011 - 15:28सितंबर की उस तपती हुई दोपहर को जब मुख्य और जिला सत्र न्यायाधीश एस कुमारगुरु ने निर्णय सुनाना शुरू किया, तब धर्मपुरी (तमिलनाडु) के उस खचाखच भरे कोर्टरूम में खामोशी पसरी हुई थी। न्यायाधीश ने 3.30 बजे निर्णय सुनाना प्रारंभ किया था, लेकिन यह प्रक्रिया लगभग एक घंटे तक जारी रही, क्योंकि उन्हें उन 215 सरकारी अधिकारियों के नाम पढ़कर सुनाने थे, जिन्हें दोषी ठहराया गया था। उन 12 अधिकार
सूचना का अधिकार का न हो दुरुपयोग
सितंबर 1, 2011 - 17:03सर्वोच्च न्यायालय के प्रबल समर्थक निश्चित तौर पर उसे यह श्रेय देंगे कि बीते तीन दशकों के दौरान उसने तीन क्रांतिकारी बदलावों की शुरुआत की। पहला था 1980 के दशक में जनहित याचिका से जुड़ा आंदोलन जिसने देश के हर नागरिक के लिए अदालत के दरवाजे खोले, खासतौर पर उन लोगों के लिए जो अपनी गरीबी, निरक्षरता और पिछड़ेपन के कारण ऐसा करने में असमर्थ थे। लगभग उसी समय न्यायालय ने अपने कुछ फैसलों के जरिए नागरिक अधिकारों की शुरुआत की जो आगे चलकर सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम का आधार बना। तीसरी लहर थी भ्रष्टाचार-निरोधक तंत्र की स्थापना की. इसका अंकुरण भी अदालती कक्षों में हुआ जब हवाला मामलों, 2जी मामलों तथा ऐसे ही बड़े मामलों में उसने कई महत्त्वपूर्ण फैसले दिए.
लोकपाल काफी नहीं, बुनियादी सुधारों की है जरूरत
अगस्त 1, 2011 - 12:31कुछ साल पहले मैंने इसी कॉलम में इस बात पर बड़ा आश्चर्य जताया था कि कैसे अमरिका के शीर्ष उद्योगपतियों को भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें सजा भी मिल जाती है, लेकिन भारत में ऐसे ही अपराधों में शामिल व्यवसायी आसानी से बच जाते हैं। भारत में दरअसल भ्रष्ट राजनेताओं ने पुलिस और न्यायिक व्यवस्था को इस तरह से अपंग बना दिया है कि तमाम स्तर की सुनवाइयों के बाद भी उन्हें दोषी साबित नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि इस तरह का सड़ा हुआ सिस्टम धूर्त उद्योगपतियों को भी गिरफ्तार नहीं होने देगा, क्योंकि किसी भी तरह का घपला इन दोनों की मिलीभगत से ही अंजाम दिया जाता है। ऐसे में जब हमारा सिस्टम इन धूर्त राजनेताओं पर कार्रवाई करेगा, तब ही भ्रष्ट उद्योगपतियों को भी गिरफ्तार किया जा सकेगा।
लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए चुनावी सुधार ज़रूरी
अप्रैल 21, 2011 - 18:59द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए देशों में भारत के पास लगातार सफल चुनाव संपन्न कराने का और एक मज़बूत व शांतिपूर्ण लोकतंत्र चलाने का अच्छा रिकॉर्ड है. पिछले पचास सालों में कई देश जो लोकतान्त्रिक उम्मीदों के साथ जन्मे थे, समय के साथ तानाशाही ताकतों और सैन्य विद्रोहों का शिकार हो गए. हमारे पडोसी देश पाकिस्तान और बंगलादेश के उदाहरण से ही पता चलता है कि लोकतंत्र चलाना कितना कठिन है. फिर भी भारत विगत कई सालों से परिस्थितियों के साथ लचीलापन रखते हुए लोकतान्त्रिक मान्यताओं को बनाये रखने में कामयाब रहा है. लोग बड़ी तादातों में वोट करने आते हैं और समय के साथ केंद्र व राज्यों की निर्वाचित इकाईओं में विभिन्न जातियों व सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व बढ़ा ही है.
अंतर्राष्ट्रीय संपत्ति अधिकार सूचकांक में भारत की रैंक 52
मार्च 25, 2011 - 16:01सन 2011 के अंतर्राष्ट्रीय संपत्ति अधिकार सूचकांक की हाल में ही घोषणा हुई जिसमें विश्व के 129 देशों के बौद्धिक और भौतिक संपत्ति अधिकारों को मापा गया है.
भारत स्थित सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी सहित विश्व के 67 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने इस बार वाशिंगटन डी सी स्थित 'प्रोपर्टी राईट्स अलाइंस' के साथ मिल कर इस पांचवे वार्षिक सूचकांक को पेश किया है.
संपत्ति अधिकार के क्षेत्र में भारत अभी भी पीछे है और काफी सुधार की संभावना है. इस बार के सूचकांक में भारत का कुल स्कोर 5.6 है और 129 देशों में उसकी रैंक 52 है. अगर क्षेत्रीय आंकड़ों की बात करें तो 19 देशों में भारत की रैंक 9 है.
पुलिस को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त करें
फरवरी 1, 2011 - 13:16जब विकृत या गलत या उल्टी प्रोत्साहन व्यवस्था भ्रष्टाचार को दंडित करने की बजाए ईनाम देती है, तब भ्रष्टाचार बढ़ने लगता है। हमें इस विकृत प्रोत्साहन का अंत करने के लिए संस्थागत परिवर्तनों की जरूरत है।
रसूकदार भी बने दंड के भागी
जनवरी 20, 2011 - 11:382जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर लोगों के मन में जो गुस्सा है, अगर वह बेकार चला जाए तो यह बहुत शर्मनाक होगा। ऐसा न हो, यह सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका यही है कि दोषियों को फौरन से पेशतर कैदखाने की सलाखों के पीछे भेज दिया जाए। यदि हम ऐसा कर पाने में कामयाब साबित होते हैं तो हम अपने प्रशासनिक तंत्र में भी विश्वास कायम रख पाएंगे।
मनरेगा में 200 दिन नहीं होंगे हितकर
दिसम्बर 16, 2010 - 15:16मनरेगा (MGNREGA) के अंतर्गत 100 श्रमिक दिवसों को बढ़ा कर 200 दिवस करने की कई दिनों से बात चल रही है. भारत के अति निर्धनों की आय का स्त्रोत बनी इस विवादित स्कीम के अंतर्गत दिन बढाने का प्रस्ताव सुनने में तो लोक कल्याणकारी लगता है पर इस का बहुत गंभीर आंकलन करने की आवश्यकता है.
