स्कूलों के लिए भूमि की अनिवार्यता से संबंधित मानदंडों का गणित

शिक्षा निदेशालय ने 22 मार्च 2013 को एक परिपत्र (सर्क्युलर) जारी कर अनधिकृत कॉलोनियों में संचालित होने वाले प्राइमरी स्कूलों व मिडिल स्कूलों के लिए भूमि की न्यूनतम सीमा की अनिवार्यता में ढील दी थी। वर्तमान में यह सीमा प्राइमरी स्कूलों के लिए 200 स्क्वायर यार्ड और मिडिल स्कूलों के लिए 700 स्क्वायर मीटर (857 स्क्वायर यार्ड) है।

8 कमरों वाले एक स्कूल के लिए 700 स्क्वायर मीटर जमीन की अनिवार्यता बहुत अधिक है। यदि 5 कमरों के स्कूल के लिए 200 स्क्वायर यार्ड जमीन अनिवार्य है तो इस हिसाब से 3 और कमरों के लिए 120 स्क्वायर यार्ड अतिरिक्त जमीन की आवश्यकता होनी चाहिए। इस प्रकार, मिडिल स्कूल चलाने के लिए प्राइमरी स्कूल के लिए आवश्यक जमीन की अनिवार्यता से चार गुना अतिरिक्त जमीन (700 स्क्वायर मीटर = 837 स्क्वायर यार्ड) की अनिवार्यता तय करना अनुचित और मनमानी पूर्ण है। 

उसी परिपत्र (सर्क्युलर) की उप धारा 5 कक्षा के कमरों के आकार की गणना के लिए दो आंकलन विधियों (एल्गोरिद्म) को आधार बनाया गया है

1. कक्षा की संख्या के आधार पर - मान्यता प्राप्त करने के लिए एक प्राइमरी स्कूल में कक्षा के कमरों का आकार कम से कम 30 स्क्वायर मीटर होना चाहिए। मिडिल स्कूल के मामले में कक्षा के कमरों का आकार 40 स्क्वायर मीटर होना चाहिए। इस गणित के हिसाब से एक मिडिल स्कूल चलाने के लिए आवश्यक जमीन की अनिवार्यता (5 X 30) + (3 X 40)  = 270 स्क्वायर मीटर = 323 स्क्वायर यार्ड होनी चाहिए।

2. छात्रों की संख्या के आधार पर – कक्षा के कमरों का आकार निर्धारित आकार से कम होने की दशा में, कक्षा में छात्रों की संख्या इस प्रकार निश्चित की जानी चाहिए जिससे कि 60 स्क्वायर फीट क्षेत्र शिक्षण कार्य के लिए छोड़ कर प्रत्येक छात्र को कक्षा में 10 स्क्वायर फीट की जगह प्राप्त हो सके।

आंकलन की दोनों विधियों (एल्गोरिद्म) के हिसाब से मिडिल स्कूल के संचालन के लिए 320 स्क्वायर यार्ड से 325 स्क्वायर यार्ड जमीन की ही आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि नीति निर्धारकों के विचार से भी अनधिकृत कॉलोनियों में मिडिल स्कूल चलाने के लिए 320 स्क्वायर यार्ड जमीन पर्याप्त है, फिर भी तालिका में बिना सोचे समझे 700 स्क्वायर मीटर क्षेत्र की जरुरत दर्ज कर दी गई जबकि आंकलन की दोनों विधियों के तहत प्राप्त आवश्यक क्षेत्र से यह कहीं भी मेल नहीं खाता है।

निजी स्कूल संचालकों के पास जमीन का अभाव होता है। लेकिन सरकार भी वंचित तबके के छात्रों के लिए और अधिक स्कूल खोलनें की स्थिति में नहीं है। इस कारण कक्षा 5वीं और 6वीं कक्षा के लिए आवश्यक सीटों से लगभग 35 हजार सीटों की कमी पैदा हो गई है। इसके साथ ही साथ, यह नीति भी स्पष्ट नहीं है कि प्राइमरी स्कूलों को दूसरी पाली में मिडिल लेवल की कक्षाएं चलाने की अनुमति है अथवा नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि नर्सरी से 5वीं तक चलने वाले प्राइमरी स्कूल दूसरी पाली में 6वीं से 8वीं तक मिडिल क्लास की कक्षाएं चला सकते हैं या नहीं। हालांकि प्राइमरी स्कूलों को दूसरी पाली में प्राइमरी स्तर की कक्षाएं चलाने की अनुमति अवश्य है।

यहां तक कि शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई एक्ट) 2009 भी प्राइमरी और मिडिल स्कूलों के साथ एक समान व्यवहार करता है। यह प्रति कक्षा एक अध्यापक और प्रति अध्यापक 30 बच्चों के प्रावधान को जरूरी बनाता है। आरटीई मिडिल लेवल के स्कूलों के लिए किसी विशेष अथवा अतिरिक्त व्यवस्था की बात नहीं करता है।

29 अप्रैल 2016 को दिए एक आदेश में दिल्ली हाई कोर्ट ने कोआर्डिनेशन कमेटी ऑफ पब्लिक स्कूल्स (सीसीपीएस) द्वारा दायर एक याचिका को खारिज कर दिया था। याचिका के माध्यम से प्राइमरी स्कूलों व मिडिल स्कूलों के लिए बिल्डिंग नॉर्म्स में भेदभाव को चुनौती दी गई थी। इस मनमानेपन व अनुचित प्रावधान के विरोध में दायर याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा था कि स्कूलों की ये दोनों श्रेणियां समान नहीं है और इसलिए नीति निर्धारण के दौरान दोनों के लिए अलग अलग नॉर्म्स बनाना उचित है। साथ ही कोर्ट ने मामले में और सुनवाई करने से इंकार करते हुए कहा कि अदालत आम तौर पर नीतिगत फैसलों के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती। इस मामले में बहस करते हुए सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि ऐसा कदम इसलिए उठाया गया है ताकि शिक्षा के व्यवसायीकरण पर रोक लगायी जा सके। यह भयावह है कि किसी भी अनुभवजन्य समर्थन से रहित ऐसे व्यक्तिपरक तर्क का प्रयोग मिडिल स्कूलों के खात्में के लिए किया जा रहा है जिसके कारण दिल्ली में 6वीं और 8वीं कक्षा में 35 हजार से अधिक सीटों की कमी देखने को मिल रही है। कोआर्डिनेशन कमेटी ऑफ पब्लिक स्कूल्स बनाम गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली की पेटेंट अपील पत्र संख्या 528/ 2016 के माध्यम से सीसीपीएस द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट के 29 अप्रैल 2016 के आदेश को चुनौती दी है। इस मामले में पिछली सुनवाई 23 सितंबर 2016 को हुई थी और फैसले को सुरक्षित रखे हुए लगभग छह माह बीत चुके हैं।

एड. प्रशांत नारंग (लेखक सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता हैं)

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