नए भूमि अधिग्रहण कानून में बाजार की बाधा और वर्गीकरण को कम किया जाना चाहिए

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जमीन हमेशा ही विवादों का कारण रही है। शहरीकरण, गैर-कृषि कार्यों के लिए जमीन की बढ़ती मांग, छोटे जमीन मालिकों में कुशलता का अभाव व रोजगार की कमी से विवाद की वजह को समझा जा सकता है। पश्चिमी यूरोप, खास तौर पर ब्रिटेन और इससे भी बढ़कर इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति से पहले ही जमीन के बाजार को मुक्त कर दिया गया था और शिक्षा तथा तकनीकी कौशल की पहुंच बढ़ गई थी। हमने ऐसे सुधार नहीं लागू किए जो लोगों को कृषि कार्य से बाहर निकलने या कृषि में ही कुछ नया कर सकने में समर्थ बना सके।

लोगों के पास ऐसी कुशलताएं भी नहीं हैं, जिन्हें बाजार में भुनाया जा सके। जमीन संबंधी ज्यादातर विवाद वास्तव में कुशलता से जुड़ी हुई समस्या है। इसका मतलब ये नहीं है कि भूमि के छोटे जोत और जीविका केंद्रित कृषि की स्थिति बनाए रखी जाए। कृषि की उपज भी भारत में इतनी कम है कि कृषि भूमि को गैर-कृषि भूमि में बदलने से भारत में भूखमरी जैसी स्थिति कतई नहीं बनने वाली।

उपजाऊ और सिंचित कृषि योग्य जमीन का गैर-कृषि कार्यों में इस्तेमाल नहीं किया जाए, इस तर्क का आखिर क्या मतलब है? कुछ जमीन मूल्यवान हैं और कुछ नहीं। अगर हमने सिंचाई के बेहतर इंतजाम किए होते तो कृषि योग्य जमीन का और ज्यादा बड़ा हिस्सा ज्यादा मूल्यवान हो सकता था। जमीन चाहे कृषि योग्य हो या फिर गैर-कृषि इस्तेमाल के लिए, हर कोई वो जमीन चाहेगा, जिसका मूल्य ज्यादा हो न कि जिसका मूल्य कम हो।

ऑस्कर वाइल्ड का एक मशहूर कथन है, "वह सनकी है जो हर चीज की कीमत जानता है लेकिन किसी का महत्व नहीं समझता"। यह कथन ‘लेडी विंडरमेयर्स फैन’ से लिया गया है, जो सेसिल ग्राहम के एक सवाल के जवाब में लॉर्ड डॉर्लिंगटन द्वारा कहा गया है। सामान्यतः हम यह याद नहीं रखते कि सेसिल ग्राहम ने इसके जवाब में क्या कहा। "और मेरे अजीज डॉर्लिंगटन, वह भावुक है जो हर चीज का अतार्किक मूल्य समझता है, जबकि उसे किसी भी चीज का बाजार भाव पता नहीं होता।" हमें यह कैसे पता चलता है कि किसी वस्तु की कीमत क्या है? बाजार में उसकी कीमत से और मांग-पूर्ति के दबाव से, बशर्ते बाजार को काम करने दिया गया हो।

फिलहाल दो विधेयक काफी चर्चा में हैं, 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करने वाला विधेयक और पुनर्स्थापन और पुनर्वास विधेयक। दोनों की मियाद खत्म हो चुकी है और उन्हें फिर से संसद के पटल पर रखा जाना है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की वेबसाइट से हमें ये पता चलता है कि सलाहकार परिषद में इस बात को लेकर एक राय नहीं है कि भूमि अधिग्रहण कानून संशोधन विधेयक में क्या-क्या रखा जाए। हालांकि एनएसी इस बात पर सहमत है कि दोनों विधेयक अलग-अलग न हो कर एकीकृत रूप में बनाए जाएं। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक इस तरह का एकीकृत विधेयक अब ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा बनाया जाएगा।

दो विधेयकों को एक किए जाने के पीछे वाजिब कारण हैं। हालांकि यह देखना होगा कि दोनों ही विधेयकों में ‘मुआवजा’ के अर्थ और दायरे को लेकर क्या कोई सैद्धांतिक भेद है? साधारण समझ से लगता है कि यह भेद हो सकता है। भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक में ‘अधिग्रहण’ शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया है? इससे ऐसा लगता है कि जमीन जबरदस्ती ली जानी है। दो पक्षों के आपसी लेन-देन में इस शब्द के लिए जगह नहीं होनी चाहिए, बशर्ते इकरारनामे में कोई धांधली न हो।

निजी बाजार अपना काम करता है, लेकिन जब निजी बाजार की कार्यप्रणाली में कोई समस्या आती है, तब राज्य इसमें दखल देता है और निजी व सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए जमीन का अधिग्रहण करता है। इसलिए इसका मुआवजा दिया जाता है। कानूनी तौर पर मुआवजे का हकदार केवल वही शख्स है, जिसका कोई कानूनी अधिकार है। पुनर्वास और पुनर्स्थापना विधेयक के प्रावधान से इसकी तुलना कीजिए। इस विधेयक में कानूनी अधिकार रखने वाले (पट्टेदार, किराएदार, लीज धारक, मालिक) के साथ ही उन लोगों के हितों का सवाल भी उठाया गया है, जिनका कोई कानूनी दावा नहीं बनता लेकिन जिनकी आजीविका प्रभावित होती है।

ये सामाजिक सरोकार बिलकुल जायज है और विधेयक में इसका प्रावधान होना चाहिए। लेकिन इसका मुआवजे के साथ घालमेल नहीं किया जाना चाहिए और न ही ऐसा किया जा सकता है। जब हम ये कहते हैं कि जमीन अधिग्रहण में कई समस्याएं हैं, तो क्या ये समस्याएं अधिग्रहण के साथ हैं या फिर पुनर्वास नीति के साथ है? शायद दोनों के साथ हैं। अगर हमारी सैद्धांतिक समझ स्पष्ट नहीं होगी तो हम पूरे मसले पर भावुक होकर ही विचार करेंगे।

भारत में हम कई क्षेत्रों में किसी भी चीज का बाजार भाव नहीं जानते, क्योंकि यहां बाजार को खुले तौर पर काम करने का मौका ही नहीं दिया गया। इसका सबसे अच्छा उदाहरण जमीन है। एक सामान्य सिद्धांत है, बाजार के कामकाज में रोकटोक एक गलत विचार है। बाजार का वर्गीकरण करना एक खराब विचार है। बाजार में व्यवधान पैदा करना गलत विचार है। भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक के 70/30 नियम को ही लें, जिसे सलाहकार परिषद का समर्थन हासिल है। राज्य ऐसी स्थिति में जमीन का अधिग्रहण कर सकता है जब 70 फीसदी जमीन की खरीद स्वतंत्र बाजार के सिद्धांतों के अनुसार की गई हो। इसमें ग्रामीण और शहरी जैसा कोई भेद नहीं है।

कानूनी तौर पर भूमि अधिग्रहण का कानून शहरी जमीन पर भी लागू होता है लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसे सिर्फ ग्रामीण जमीन पर ही लागू किया जाता है। जब भी अधिग्रहण की बात आती है, तो ग्रामीण इलाकों की जमीन ही अधिग्रहित की जाती है। और सरकार अपनी मर्जी से इस जमीन का गैर कृषि कार्यों में इस्तमाल कर लेती है। इसी तरह राजनीतिक तंत्र इससे फायदा कमाता है। इस तरह से परिवर्तित जमीन की कीमत गैर-परिवर्तित जमीन की तुलना में काफी ज्यादा होती है। उच्च स्टाम्प शुल्क और आय के अवैध स्रोतों को छिपाने और टैक्स चोरी के लिए जमीन का पंजीकरण काफी कम मूल्य पर किया जाता है। अनुसूचित जनजाति श्रेणी में आने वाली जमीन को बेचे जाने पर कड़े प्रतिबंध हैं। इससे अनुसूचित जनजाति जमीन को खरीददार नहीं मिलते, जबकि सामान्य जमीन की मांग काफी बढ़ जाती है।

सामान्य जमीन की कीमत बढ़ने के अलावा अनुसूचित जनजाति जमीन के स्वामित्व पर सवाल उठाया जा सकता है या गुपचुप खरीददारी की जा सकती है। जमीन के स्वामित्व संबंधी सही जानकारी हमारे पास नहीं है। भूमि सर्वेक्षण काफी पुराने हैं। भूमि स्वामित्व का बीमा नहीं है। कारोबारी कम्पनियां जमीन अधिग्रहण के मामले में सरकार को हस्तक्षेप करने के लिए क्यों कहती हैं? इसलिए नहीं कि हो सकता है कि पूरी जमीन के बीच कोई एक व्यक्ति किसी भी कीमत पर अपनी जमीन बेचने के लिए तैयार नहीं हो, बल्कि वे इसलिए सरकारी हस्तक्षेप चाहती हैं कि जमीन के स्वामित्व को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। इसलिए जब तक भूमि स्वामित्व विधेयक पर काम नहीं होगा, तब तक भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक और पुनर्वास विधेयक पारित करने का कोई औचित्य नहीं। कुछ जगहों पर पट्टेदारी अवैध है, जिसकी वजह से इसे गुपचुप तरीके से अंजाम दिया जाता है। इसके कारण दूसरी कई समस्याएं खड़ी होने के साथ ही पट्टेदारों के लिए अपने अधिकारों को साबित कर पाना काफी मुश्किल हो जाता है।

आज भी भूमि अधिग्रहण एक साथ एकमुश्त नहीं होता, ये क्रमिक तौर पर किया जाता है। जाहिर है जो जमीन पहले अधिग्रहित की जाती है, उसकी कीमत कम होती है और जिस जमीन का अधिग्रहण बाद में किया जाता है, उसकी कीमत अधिक होती है, इससे अधिग्रहण की नीयत पर सवाल उठने लगते हैं। 70/30 नियम की वजह से क्रमिक खरीद की ये समस्या और बढ़ जाती है। यह निजी बाजार की स्वायत्त कार्यप्रणाली को और बाधित करता है। हम एक भावुक की तरह ऐसे सुझाव नहीं दे सकते, जो आर्थिक समझ-बूझ की विरोधी हो। हमें बाजार के सामने आने वाली बाधाओं को हटाना है न कि बढ़ाना है।

- बिबेक देबरॉय