किराया नियंत्रण कानून और बेघरों का दुख..

जोनाथन बदरंग से मकानों के बीच की गलियों से होता हुआ आगे बढ़ा। उसने गौर किया कि गरीबों के से कपड़े पहने कुछ लोगों का समूह तीन बड़ी इमारतों के सामने खड़ा था। इन इमारतों के नाम ब्लॉक अ, ब्लॉक ब और ब्लॉक स थे। ब्लॉक अ, बिल्कुल खाली और बहुत ही बदहाल स्थिति में था। उसकी दीवारों की ईंटें गिर रही थीं, खिड़कियां टूटी हुई थीं और बची खुची खिड़कियों के शीशों पर गंदगी जमा थी। अगला दरवाजा ब्लॉक ब की इमारत का था। उसकी सामने की सीढ़ियों पर लगो जमा थे। इमारत की तीनों मंजिलों पर लोगों की चहल पहल थी। खिड़कियों और बालकनी से निकली हुई डंडियों पर धुले हुए कपड़े टंगे हुए थे। लोगों को जहां भी जगह मिली उन्होंने सूखने के लिए कपड़े डाले थे। वह इमारत किराएदारों से ठसाठस भरी हुई थी।

 

तीसरी इमारत ब्लॉक स, सड़क के दूसरी ओर थी। यह इमारत बहुत अच्छी हालत में थीं और ब्लॉक अ की तरह ही खाली थीं। इसकी साफ सुथरी कांच की खिड़कियां धूप में चमक रही थीं। बढ़िया प्लास्टर की हुई दीवारें चिकनी और साफ थीं।

 

जोनाथन इन इमारतों का मुआयना कर ही रहा था कि उसे अपने कंधे पर हल्की थाप महसूस हुई। उसने मुड़ कर देखा, सामने लंबे भूरे बालों वाली एक लड़की खड़ी थी। धूसर रगं के उसके कपड़े उसकी नाप से बड़े थे। पहली बार में देखने पर जोनाथन को वह सुंदर भी नहीं लगी, लेकिन वह लड़की दिखने में काफी समझदार और दयालु लग रही थी।

 

‘क्या तुम्हें किराए के लिए खाली किसी मकान की जानकारी है?’ लड़की ने अपनी खुशनुमा मधुर आवाज में पूछा।

 

‘माफ करना ! लेकिन मैं यहां का रहने वाला नहीं हूं, इसलिए मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है, लेकिन तुम सामने वाली इमारतों में पता क्यों नहीं करती?’

 

‘इसका कोई फायदा नहीं’, उसने बड़ी नरमी से जवाब दिया।

 

‘लेकिन क्यों, मुझे तो वो खाली दिखाई दे रही हैं’ जोनाथन ने कहा।

 

‘हां, खली तो हैं। किराया नियंत्रण से पहले मेरा परिवार ब्लॉक अ में ही रहता था।’

 

‘ये किराया नियंत्रण क्या है?’ जोनाथन ने पूछा।

 

‘यह एक कानून है जिसके तहत मकान मालिक अपने किराया नहीं बढ़ा सकते।’

 

‘क्यों?’ जोनाथन ने जानना चाहा।

 

‘ओह, यह एक बेवकूफी भरी कहानी है,’ उस लड़की ने कहा। ‘कुछ समय पहले जब ड्रीम मशीन हमारे आसपास के इलाकों में घुमाई जा रही थी, मेरे पिता और उनके जैसे ही कुछ और किराएदारों ने किराया बढ़ाने के लिए मकानमालिकों की शिकायत की। निश्चित तौर पर कीमतें बढ़ रहीं थी और ज्यादा लोग किराये पर घर ले रहे थे। लेकिन मेरे पिता का कहना था कि हम बढ़ाया गया किराया क्यों दें? इसलिए किराएदार या मैं कहूं कि भूतपूर्व किराएदारों नें मिलकर अधिकारियों की परिषद से मांग की कि किराया बढ़ोतरी पर रोक लगा दी जाए। परिषद ने उनकी मांग मान ली। उन्होंने प्रशासकों, निरीक्षकों, जजों और सुरक्षाकर्मियों की एक लंबी चौड़ी फौज की भर्ती की और किराया न बढ़ाने का नया कानून लागू कर दिया।’

 

‘तो इससे किराएदार खुश हुए?’

 

‘लेकिन क्यों?’

 

‘खर्चे लगातार बढ़ रहे थे- इमारतों के लिए मरम्मत करने वाले, सुरक्षाकर्मी, प्रबंधक, सुविधाएं, कर और ऐसे ही कई खर्च बढ़ते जा रहे थे। लेकिन मकानमालिक इन खर्चों को पूरा करने के लिए मकानों का किराया नहीं बढ़ा सकते थे। तब उन्हें समझ आया कि अगर हम किराया नहीं बढ़ा सकते तो मकान बनाना और उसे किराए पर देना घाटे का सौदा है तो भला यह करने की जरूरत क्या है?’

 

‘कर भी बढ़ गए थे?’ जोनाथन ने पूछा।

 

‘बिल्कुल किराया नियंत्रण का कानून लागू करने में होने वाले खर्चे को पूरा करने के लिए कर बढ़ाए गए। आखिर इसके लिए बजट और कर्मचारियों की संख्या तो बढ़ानी ही थी। बहरहाल, जब मालिकों की रेखदेख और मरम्मत वगैरह का काम रूक गया तो हर कोई मकानमालिकों से नफरत करने लगा।’

 

‘उनसे पहले तो कोई नफरत नहीं करता था?’

 

‘नहीं, किराया नियंत्रण कानून से पहले हमारे पास चुनने के काफी सारे विकल्प होते थे। मकानमालिक हमेशा अच्छा व्यवहार करते थे जिससे लोग उनसे मकान किराए पर लें। मकानमालिकों का व्यवहार दोस्ताना होता था और वह लोगों को आकर्षित करने के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराते थे। अगर कोई मकानमालिक खराब व्यवहार करता था तो लोगों तक इसकी खबर जल्दी पहुंच जाती थी और लोग उसका मकान किराए पर लेने से बचते थे। अच्छे मकानमालिकों के पास किराए पर लेने वाले लोग लगातार आते थे, जबकि बुरे व्यवहार वाले मकानमालिकों के घर खाली पड़े रहते थे।’

 

‘तो फिर यह बदलाव क्यों?’

 

‘किराया नियंत्रण के बाद हर कोई बुरा बन गया,’ अब उस लड़की के चेहरे पर उदासी का भाव था, ‘और जो सबसे बुर मकानमालिक थे वे सबसे अमीर बन गए।’ वह लड़की सड़क के किनारे पर बैठ कर माइसेस (बिल्ली) के कान के पीछे सहलाने लगी। माइसेस इसका पूरा आनंद ले रही थी।

 

यह जानते हुए कि आगे की बात जानने के लिए जोनाथन उसकी ओर ताक रहा है, उसने आत्मविश्वास के साथ बोलना शुरू किया, ‘घरों के रखरखाव व मरम्मत का खर्च बढ़ रहा था लेकिन किराया बढ़ाने पर रोक थी। यहां तक कि सबसे अच्छे मकानमालिकों को भी इन खर्चों में कटौती करने पर मजबूर होना पड़ा।’

 

जब इमारतें बहुत असुविधाजनक और टूट फूट की वजह से रहने के लिए खतरनाक हो गई तो किराएदार नाराज हो गए और उन्होंने परिषद द्वारा नियुक्त निरीक्षकों से शिकायत की। निरीक्षकों ने मकानमालिकों पर जुर्माना लगा दिया। हालांकि जुर्माने से बचने के लिए कुछ मकानमालिक निरीक्षकों को रिश्वत देते थे। ऐसी हालत में, ब्लॉक अ के मकानमालिक जैसे सीधे साधे लोगों के लिए सब कुछ छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। ब्लॉक अ का मकानमालिक न तो घाटे का बोझ उठा सकता था और न ही जुर्माने से बचने के लिए रिश्वत दे सकता था, इसलिए वह सबकुछ छोड़ कर भाग गया।

 

‘अपनी इमारत को ही छोड़ कर चला गया?’ जोनाथन ने आश्चर्य से पूछा

 

जारी है..

लिबर्टी इंस्टिट्यूट द्वारा प्रकाशित केन स्कूललैंड की प्रसिद्ध किताब ‘जोनाथन गुलिबल’ से साभार

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