देश में बांस की बहुतायात, फिर भी चीन से होता है आयात: सलाम

चीनी वस्तुओं के किसी भी बाजार में छाए रहने का मुख्य कारण उनका तुलनात्मक रूप से सस्ता होना होता है। लेकिन यदि देसी वस्तु के सस्ते होने के बावजूद उसी चीनी वस्तु की भारी मात्रा आयात की जाए और यहां के उत्पादकों की अनदेखी की जाए तो इसे नीति निर्धारकों की अदूरदर्शिता  नहीं तो और क्या कहेंगे।

जी हां, देश के जंगलों में बांस की बड़ी तादात बेकार पड़े होने के बावजूद भारी मात्रा में चीनी बांस का आयात किया जाता है। वह भी यहां उपलब्ध बांस की कीमत से अधिक दर पर। इससे एक तरफ जहां स्थानीय उत्पादकों के सामने आजीविका का संकट उत्पन्न हो जाता है वहीं निर्माण कार्यों सहित अन्य कार्यों में लकड़ी के उपयोग व इसकी जरूरत के कारण दूसरे पेड़ों के कटने से पर्यावरण को भी काफी नुकसान पहुंचता है। विशेषज्ञों द्वारा इस यह जानकारी सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा आयोजित '10वें जीविका एशिया लाइवलीहूड डॉक्यूमेंट्री फिल्म फेस्टिवल' के दौरान इंडिया हैबिटेट सेंटर में किया गया।

इंडिया हैबिटेट सेंटर में बृह्स्पतिवार से शुरू हुए चार दिवसीय जीविका डॉक्यूमेंटरी फिल्म फेस्टिवल के पहले दिन साउथ एशिया बांबू फेडरेशन के संस्थापक व एक्जीक्युटिव डाइरेक्टर कामेस सलाम ने बांस के बाबत सरकारी नीति की खामियों की तरफ ध्यानाकर्षण कराया। 'रियलाइजिंग द पोटेंशियल ऑफ द बांबू सेक्टर इन इंडिया' विषयक परिचर्चा के दौरान सलाम ने कहा कि बांस के घास प्रजाती के होने के बावजूद भी इसकी कटाई पर अब भी पेड़ों की कटाई जैसा प्रतिबंध लगा हुआ है। यदि बांस की कटाई की अनुमति मिल जाए तो जंगलों के आसपास रहने वाले लाखों आदिवासियों की आजीविका का समाधान हो सकता है। इसके अतिरिक्त कागज के उत्पादन, निर्माण कार्यों व उद्योग धंधों की जरूरत को पूरा करने के लिए पेड़ों की होने वाली अंधाधुंध कटाई की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। इस मौके पर मिनिस्ट्री ऑफ इंवायरमेंट एंड फोरेस्ट के इंस्पेक्टर जनरल डा. एसके खंडूरी व फिल्म मेकर नंदन सक्सेना आदि उपस्थित थे। इस दिन आठ डॉक्यूमेंट्री फिल्में 'नो प्रोब्लेम', 'आरोहन','ग्रीन स्कूल', 'ए कॉमन स्टोरी'. 'देयर लास्ट वेपन', 'द रोड बैक होम', 'द इम्पैक्ट ऑफ वन', 'कॉटन फॉर माय श्राउड', व 'एम-सी-एमः यूटोपिया मिल्क सियापा' की स्क्रीनिंग की गई। विदित हो कि चार दिनों तक चलने वाले इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म फेस्टिवल के दौरान दस देशों की 38 डॉक्यूमेंट्री फिल्में दिखाई जाएंगी।

 

- अविनाश चंद्र