इंडस्ट्रीज के लिए बने नियम स्कूलों पर थोपने से पैदा हो रहीं सारी समस्याएं: कुलभूषण शर्मा

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से निर्मित शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई एक्ट 2009) आने और वर्ष 2010 से लागू होने के 7 वर्ष पूरे हो चुके हैं। लेकिन इतनी बड़ी समयावधि बीत जाने के बाद भी तमाम समस्याएं अब भी बरकरार हैं। एक तरफ स्कूल आरटीई के प्रावधानों को अव्यवहारिक बताकर इसकी मुखालफत कर रहे हैं वहीं सरकार हर हाल में उन प्रावधानों को लागू कराना चाहती है। तय समय सीमा के भीतर प्रावधानों के लागू न किए जाने की दशा में स्कूलों पर तगड़े जुर्माने और उन्हें बंद करने का नियम है। गैर आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक आरटीई कानून आने के बाद से अबतक देशभर में तालाबंदी की मार झेल रहे अथवा बंद हो चुके छोटे छोटे स्कूलों की संख्या 2 लाख से ज्यादा है। इतनी भारी तादात में स्कूलों के बंद होने से करीब ढाई करोड़ बच्चों के शैक्षणिक भविष्य पर खतरा मंडराने लगा है। इन्हीं सारे मुद्दों पर आजादी.मी ने बजट प्राइवेट स्कूलों की अखिल भारतीय संस्था 'नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलाएंस' (निसा) के प्रेसिडेंट कुलभूषण शर्मा से बात की। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंश: 

आजादीः कुलभूषण जी नमस्कार!
कुलभूषणः नमस्कार!

आजादीः कुलभूषण जी, सबसे पहले हमें बताईए कि बजट प्राइवेट स्कूल कौन हैं? और शिक्षा के क्षेत्र में इनका क्या योगदान है?
कुलभूषणः साधारण शब्दों में कहें तो सीमित संसाधनों के साथ संचालित होने वाले ऐसे स्कूल कम से कम फीस लेकर शिक्षा प्रदान करते हैं, बजट प्राइवेट स्कूल कहलाते हैं। तकनीकि तौर पर बात करें तो ऐसे स्कूल जो सरकारी स्कूलों में प्रति छात्र खर्च की जाने वाली धनराशि से कम शुल्क लेते हुए शिक्षा प्रदान करते हैं ऐसे स्कूल बजट स्कूलों की श्रेणी में आते हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली में सरकारी स्कूलों में प्रतिछात्र 17 हजार रूपए प्रतिवर्ष (1416 रूपए प्रतिमाह) खर्च होता है। इस प्रकार दिल्ली में 1416 रूपए प्रतिमाह से कम फीस लेने वाले स्कूल बजट स्कूलों की श्रेणी में आएंगे। ऐसे स्कूलों के संचालक आमतौर पर शिक्षा के प्रति अत्यंत निष्ठावान होते हैं और स्वयं भी बीएड आदि होते हैं। बजट स्कूल देश में 25-30 वर्षों से शिक्षा प्रदान कर रहे हैं और कई कई स्कूल ऐसे हैं जो 40-50 वर्षों से संचालित हो रहे हैं। इन स्कूलों का सरकार के सर्वशिक्षा अभियान के उद्देश्य को अमली जामा पहनाने में बड़ा योगदान है। देश के दूरदराज के क्षेत्रों में जहां अब भी सरकारी स्कूल नहीं हैं वहां ऐसे स्कूल ही शिक्षा प्रदान करने का कार्य करते आए हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश में 4-5 लाख बजट प्राइवेट स्कूल हैं और निजी स्कूलों में पढ़ने वाले 95 फीसदी छात्र ऐसे स्कूलों में नामांकित हैं।

आजादीः बजट प्राइवेट स्कूलों की समस्याएं क्या हैं? निसा क्या है?
कुलभूषणः बजट प्राइवेट स्कूलों के साथ समस्या यह है कि स्कूलों के बाबत जब भी नीतियां बनती है तो मोटे तौर पर निजी एवं सरकारी स्कूलों को ध्यान में रखते हुए बनती है। साथ ही बजट स्कूलों को निजी स्कूल वर्ग में रख दिया जाता है। अब निजी स्कूलों की नीतियां बड़े और एलिट स्कूलों को ध्यान में रखकर बनायी जाती है और छोटे बजट स्कूलों की समस्याओं और सीमाओं को अनदेखा कर दिया जाता है। परिणाम स्वरूप बजट स्कूल जो कि गैरसरकारी सहायता प्राप्त स्कूल होते हैं वे बड़े स्कूलों वाले नियम कानूनों को पूरा नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए, 500 रूपए फीस लेने वाला स्कूल अपने अध्यापकों को 5 हजार फीस लेने वाले स्कूल के बराबर वेतन देने में सक्षम नहीं हो पाता है। लेकिन ऐसा न करने पर उसे सरकारी कोपभाजन का शिकार बनना पड़ जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो शिक्षा और स्कूलिंग को गैर लाभकारी (नॉट फॉर प्रॉफिट) वर्ग में रखा गया है लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर, लैंड, सैलरी, पीएफ, ईएसआई, कमर्शियल रेट पर प्रॉपर्टी, बिजली, पानी टैक्स आदि जैसे 'इंडस्ट्रीज' पर लागू होने वाले नियम इन स्कूलों पर भी थोप दिए गए हैं। पहले से ही गैर सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों को बैंक फाइनेंस भी नहीं करते। बजट स्कूलों की ऐसी छोटी-बड़ी तमाम समस्याओं को लेकर आवाज उठाने के लिए 'नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलाएंस' (निसा) का गठन किया गया। यह बजट प्राइवेट स्कूलों का देशव्यापी संगठन हैं। इस संगठन का अनौपचारिक गठन वर्ष 2011 में हुआ था और अबतक देशभर से 56 हजार से अधिक स्कूल इसके साथ जुड़ चुके हैं। समस्याओं के खिलाफ आवाज उठाने के साथ ही साथ यह संगठन बजट स्कूलों में प्रदान की जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए भी प्रतिबद्ध है और स्कूलों को इसके लिए प्रेरित व प्रशिक्षित करता है।

आजादीः निसा समय समय पर आरटीई की भी खिलाफत करता रहता है? बीपीएस को आरटीई से क्या समस्या है?
कुलभूषणः दरअसल, यह गलतफहमी है जिसे दूर किया जाना बेहद जरूरी है। बीपीएस आरटीई के खिलाफ नहीं है। हम तो हरियाणा सहित अन्य राज्यों में जहां आरटीई लागू नहीं है वहां भी आरटीई लागू करने की मांग करते हैं। वास्तव में हम आरटीई के कुछ प्रावधान अत्यंत दोषपूर्ण हैं जिसके कारण बच्चों को शिक्षा प्रदान करने की गारंटी देने वाला यह कानून स्वयं ही शिक्षा से वंचित करने के कानून में तब्दील हो गया है। उदाहरण के लिए, आरटीई एक्ट लागू होने के पहले तक देश में सातवीं कक्षा तक के स्कूलों के लिए सरकार से मान्यता लेने की आवश्यकता नहीं होती थी। ऐसे में गली मोहल्लों सहित अधिकृत, अनधिकृत सभी क्षेत्रों में छोटे छोटे भूभाग में स्कूल खूल गए और 'नेबरहुड' में शिक्षा प्रदान करने लगे। 2009 में आरटीई एक्ट पारित होने के बाद सभी स्कूलों के लिए मान्यता लेना आवश्यक कर दिया गया और इसके लिए कड़े प्रावधान कर दिए गए। इन प्रावधानों में जमीन की उपलब्धता अर्थात 'लैंड नॉर्म्स' सबसे ज्यादा दोषपूर्ण प्रावधान साबित हुआ। क्योंकि छोटे स्कूलों के पास एक तो बजट की कमी होती है दूसरे जिन क्षेत्रों में दशकों से ये स्कूल संचालित हो रहे हैं वहां घनी बस्तियां बस चुकी हैं। ऐसी स्थिति में जमीन उपलब्ध ही नहीं है। उपर से तुर्रा ये कि यदि स्कूल आवश्यक भू क्षेत्र में संचालित नहीं होंगे तो उन्हें मान्यता नहीं प्रदान की जाएगी और उनपर जुर्माना लगाने के साथ बंद करने का प्रावधान है। स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को 25 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है लेकिन रिईम्बर्समेंट समय से नहीं होता, जिससे ये स्कूल आर्थिक बोझ से दबते जा रहे हैं। इसके अलावा ट्रैफिक, फायर एनओसी इत्यादि होने का भी प्रावधान है जबकि गलियों में चलने वाले स्कूलों को ये एनओसी मिलते ही नहीं हैं। साथ ही बच्चों को स्टेशनरी, यूनिफॉर्म आदि देने संबंधित फरमान भी कोढ़ में खाज़ की स्थिति पैदा करते हैं। निसा ऐसे ही दोषपूर्ण प्रावधानों में संशोधन की मांग करती हैं जिसे लोग आरटीई की खिलाफत समझ बैठते हैं।

आजादीः तो आप क्या चाहते हैं कि बजट स्कूलों के लिए मान्यता की अनिवार्यता ही समाप्त कर दी जाए?
कुलभूषणः नहीं। हम मान्यता की अनिवार्यता समाप्त करने की बात नहीं कहते। हां, हम मान्यता प्रदान करने के तरीकों में बदलाव की बात करते हैं। आरटीई में स्कूलों की मान्यता के लिए जो अर्हताएं हैं वे अधिकांशतः इनपुट आधारित हैं, जैसे कि भूमि की उपलब्धता, अध्यापकों की संख्या एवं उनकी डिग्री, कक्षा में छात्र एवं अध्यापक अनुपात, खेल के मैदान, तमाम एनओसी इत्यादि। जबकि हमारी मांग मान्यता आऊटपुट के आधार पर देने की है। यहां गुजरात सरकार का उदाहरण देना उपयुक्त होगा। गुजरात में स्कूलों को मान्यता देने के लिए बच्चों के सीखने के परिणाम (लर्निंग आउटकम) को वरीयता दी जाती है। हम भी केंद्र सरकार से यही मांग करते हैं कि स्कूलों को मान्यता देने के लिए इनपुट की बजाए आउटपुट को वरीयता दी जाए।

आजादीः नई शिक्षा नीति से बजट प्राइवेट स्कूलों को क्या उम्मीदें हैं?
कुलभूषणः केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री से कई बार मिलकर हमने अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन दिया है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण मांग यह है कि नई शिक्षा नीति तैयार करने के लिए गठित होने वाली कमेटी में प्रशासनिक अधिकारियों, सरकारी प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों, बड़े स्कूलों के साथ साथ बजट प्राइवेट स्कूलों का प्रतिनिधित्व भी हो। इसके अलावा हमारी मांग है कि बजट स्कूलों को अलग वर्ग में रखते हुए इनके लिए अलग बोर्ड का गठन किया जाए, इन्हें लघु उद्योगों की भांति सरकारी संरक्षण प्राप्त हो। छोटे स्कूलों की स्थापना के लिए जमीन उपलब्ध कराए जाएं, जो स्कूल पहले से संचालित हो रहे हैं उन्हें लैंड नार्म्स से छूट प्रदान की जाए अथवा सरकार उनके लिए जगह उपलब्ध कराए व स्कूलों को फंड प्रदान करने की बजाए छात्रों को वाउचर के माध्यम से फंड प्रदान किए जाएं ताकि बच्चों के पास विकल्प मौजूद हों और स्कूलों में बेहतर करने की प्रतिस्पर्धा का माहौल बन सके।

आजादीः बजट स्कूलों के लिए अलग बोर्ड की क्या आवश्यकता है?
कुलभूषणः मौजूदा एजुकेशन बोर्ड्स की रीतियां नीतियां भी सरकारी नीतियों के जैसे ही मुख्यतः बड़े निजी स्कूलों को ध्यान में रखकर बनाई गयी हैं। ऐसी नीतियों का पालन कर पाना छोटे बजट स्कूलों के लिए संभव नहीं है। इसलिए हमारी मांग है कि बजट स्कूलों को ध्यान में रखते हुए अलग बोर्ड की स्थापना की जाए ताकि बड़ी तादात में मौजूद बजट स्कूलों का सुचारू रूप से संचालन सुनिश्चित हो सके। इसके अलावा बोर्ड को स्वायत्ता भी प्राप्त हो और उसमें सरकारी हस्तक्षेप न हो।

आजादीः नो डिटेंशन पॉलिसी को लेकर बजट स्कूलों का क्या स्टैंड है?
कुलभूषणः आरटीई के मौजूदा प्रारूप में यदि कुछ अच्छे प्रावधान हैं तो 'नो डिटेंशन' उसमें से एक है। दुनियाभर के शोध एवं अध्ययनों में यह साबित हो चुका है कि बच्चों को फेल करने का परिणाम अंततः नकारात्मक ही होता है। भारत जैसे देशों में इसका परिणाम बड़ी संख्या में ड्रॉप आउट विशेषकर लड़कियों के मामले में उत्पन्न हो सकता है। वैसे भी वर्ष भर की पढ़ाई का मूल्यांकन 2 घंटे की परीक्षा में करना कतई जायज नहीं है। जहां तक सीखने की बात है तो आरटीई में इसके लिए सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सीसीई) का प्रावधान है जिसके तहत रेग्युलर असेसमेंट की बात कही गई है। जबकि सरकारी स्कूलों में नो डिटेंशन को मेंडेट्री प्रमोशन के तौर पर ले लिया गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि कुछ न सीखने वाले छात्र भी अगली कक्षाओं में बढ़ते गए। हम नो डिटेंशन के समर्थन में हैं। हालांकि डिटेंशन के समय भी और अभी नो डिटेंशन के दौर में भी प्राइवेट स्कूलों के छात्रों का प्रदर्शन सरकारी स्कूलों की तुलना में काफी अच्छा रहा है। यदि सरकार को प्रयोग ही करना है तो बेहतर होगा कि वह अपने स्कूलों में करे और बार बार नीतियों में परिवर्तन कर हम निजी स्कूलों को परेशान न करे। 

आजादीः आप लोग सीबीएसई के द्वारा प्रिंसिपलों की नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल होने का विरोध क्यों कर रहे हैं?
कुलभूषणः देखिए, एजुकेशन बोर्ड को जो मेंडेट है वह सिर्फ और सिर्फ परीक्षा आयोजित कराने और रिजल्ट घोषित करने का है। लेकिन मौजूदा बोर्ड्स अपने अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए रिकग्निशन प्रदान करने सहित स्कूलों के तमाम प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप करने लगे हैं। बोर्ड के ऐसे कार्यो में शामिल होने के कारण यह पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार के गिरफ्त में है। यदि बोर्ड प्रिंसिपल की नियुक्ति में शामिल होता है तो यह भ्रष्टाचार और विकराल होगा। चूंकि बोर्ड में गवर्मेंट अथॉरिटी को वीटो है इसलिए पूरी प्रक्रिया का सरकारी करण हो जाएगा। इससे प्रिंसिपल की नियुक्ति में अनावश्यक देरी होगी और गुणवत्ता भी प्रभावित होगी। मैं एकबार फिर याद दिला दूं कि किसी भी हस्तक्षेप के पीछे कोई कारण होना चाहिए। यदि निजी स्कूलों का प्रदर्शन सरकारी स्कूलों से बेहतर है तो प्रक्रिया में छेड़छाड़ क्यों? वह भी गैरसहायता प्राप्त स्कूलों में। यह सीधे सीधे निजी स्कूलों को प्राप्त स्वायतता में हस्तक्षेप है।

- आजादी.मी