औद्योगिक क्रांति से ही समृद्धि आएगी

इतिहास के सबसे बड़े सबकों में से एक यह है कि केवल औद्योगिक क्रांति ही किसी गरीब राष्ट्र को समृद्ध बना सकती है। हर सफल राष्ट्र मैन्यूफैक्चरिंग से ही समृद्ध हुआ है। केवल इसी तरह कोई राष्ट्र लाखों अकुशल युवाओं को काम दे सकता है, लेकिन दो दशकों के सुधारों के बाद भी भारत अब तक औद्योगिक क्रांति नहीं ला पाया है। इसकी अर्थव्यवस्था अब भी उत्पादन क्षेत्र की बजाय सेवा क्षेत्र पर आधारित है। त्रासदी यह है कि 90 फीसदी भारतीय अच्छी मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों में काम करने की बजाय अनियमित किस्म की अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं। हालत यह है कि गणेशजी की प्रतिमाएं तक चीन से आ रही हैं।

हमारे प्रधानमंत्री बहुत अच्छे अर्थशास्त्री हैं। वे तथा आर्थिक सलाहकारों की उनकी टीम को भारतीय अर्थव्यवस्था की इस ढांचागत कमजोरी का तभी पता था जब यूपीए सरकार ने सत्ता संभाली थी। उनकी सरकार को भारत को मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में महान देश बनाने पर ध्यान केंद्रित करना था। यूपीए-2 को निरर्थक श्रम कानूनों में सुधार करना चाहिए था। बिजली, सड़क और अन्य आधारभूत सुविधाओं में निवेश करना था। इंस्पेक्टर राज का खात्मा कर देना था। पर इस सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। परिणाम यह है कि भारत बिजनेस करने की सहूलियत के मामले में दुनिया में 134वें स्थान पर है। यह विश्व बैंक का कहना है।

यह सब करने की बजाय सरकार उद्योगों के खिलाफ ही हो गई। इसने करों में पिछली तारीखों से लागू होने वाले बदलाव किए। लाल और हरे फीतों के जरिये सैकड़ों परियोजनाएं रोक दीं। घूस लेने के लिए अफसरों द्वारा निर्णय रोक देने की लालफीताशाही से तो हम परिचित हैं, लेकिन यह सरकार 'हरा फीताशाही' ले आई। यानी पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर मंजूरी देने में लेटलतीफी।

हर सरकार को ही पर्यावरण की रक्षा करनी होती है पर कोई सरकार इसके लिए विकास ठप नहीं कर देती। सरकार ने कंपनियों पर मनमाने ढंग से जुर्माना ठोक दिया। विदेशी निवेश आमंत्रित करते समय मूर्खतापूर्ण शर्तें लगाईं। पूर्ववर्ती सरकार की सड़क निर्माण योजना भी धीमी पड़ गई। भारतीय व्यवसायी विदेश में निवेश का फैसला लेने लगे, क्योंकि वहां सरकार की ओर से झंझटें कम हैं। इस बिजनेस विरोधी और अनिश्चित वातावरण के कारण ईमानदार व्यवसायियों का व्यवस्था से भरोसा ही उठ गया। केवल सरकार से साठगांठ वाले व्यवसायी ही उसके साथ बने रहे और भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ा।

और अब, जब देश भीषण आर्थिक संकट में है तो यह दो विनाशकारी कानून लेकर आई है। एक कानून के पीछे यह सोच है कि उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहण डरा-धमकाकर ही होता है। नए कानून के तहत भूमि-अधिग्रहण में बरसों लग जाएंगे क्योंकि छोटी परियोजनाओं के भूमि अधिग्रहण प्रस्ताव भी सौ हाथों से गुजरेंगे। इसके बाद अन्य राष्ट्रों के साथ होड़ में हमारा नुकसान की स्थिति में रहना तय है और औद्योगिक क्रांति कभी आएगी ही नहीं।

दूसरा कानून इस मूर्खतापूर्ण अनुमान पर आधारित है कि दो-तिहाई भारतीय रोज भूखे सो जाते हैं, इसलिए अब सरकार 80 करोड़ भारतीयों को बाजार की तुलना में 10 फीसदी दर पर अनाज मुहैया कराएगी। हालांकि आधिकारिक सर्वेक्षणों के मुताबिक दो फीसदी से भी कम भारतीय भूखे रह जाने की गुहार लगाते हैं। जब देश दिवालिया होने की कगार पर हो तो इतना पैसा आएगा कहा से? महीनेभर पहले सोनिया गांधी ने संसद से कहा कि यदि खाद्य सुरक्षा विधेयक के लिए पैसा नहीं है तो किसी न किसी तरह निकालना ही पड़ेगा। और यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली ध्वस्त हो गई हो तो वे कहेंगी इसे सुधारना होगा। पर यह किया कैसे जाएगा, यह उन्होंने नहीं बताया।

भरोसा था कि आर्थिक सुधारों की रफ्तार धीमी है तो क्या सुधार तो निश्चित रूप से हो रहे हैं और अब पीछे मुडऩे का तो सवाल ही नहीं है। यही सोचकर 1991 के बाद व्यवसायियों ने खूब पैसा लगाकर ऊंची वृद्धि दर का तोहफा दिया, जिसने देश को दुनिया की दूसरी सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बना दिया। पर सरकार ने इसकी कद्र नहीं की और कुछ सुधारों को तो उसने वापस तक ले लिया। भारतीय रिजर्व बैंक में रघुराम राजन के आने से स्थिति कुछ सुधरी है पर रुपए के गिरने और उससे बॉण्ड व इक्विटी बाजार में जो नुकसान हुआ है उससे भरोसे को धक्का पहुंचा है।

इंदिरा गांधी के जमाने के बाद किसी सरकार ने आर्थिक वृद्धि के प्रति इतना तिरस्कार व बिजनेस के प्रति इतनी शत्रुता नहीं दिखाई है। यह सरकार वाकई मानती है कि भारत का तेज आर्थिक विकास बिजनेस के हित में तो था पर लोगों के हित में नहीं था। इसलिए इसने मनरेगा जैसे कदम उठाए। उसने आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करने वाले तत्वों की उपेक्षा की जो निवेशकों का भरोसा बढ़ाते और मनरेगा के 'बोगस जॉब' की बजाय टिकाऊ रोजगार लाते। नतीजा यह है कि आर्थिक वृद्धि 9 फीसदी से गिरकर आज लगभग 4.5 फीसदी सालाना हो गई है। एक फीसदी की वृद्धि दर से 15 लाख प्रत्यक्ष रोजगार निर्मित होते हैं। ऐसा हर रोजगार 3 अप्रत्यक्ष रोजगार देता है। हर रोजगार पांच लोगों को सहारा देता है। इस तरह 1 फीसदी वृद्धि दर 3 करोड़ लोगों का कल्याण करती है। वृद्धि दर 4 फीसदी गिराकर 12 करोड़ लोगों को तकलीफ में डाल दिया गया हैं।

एक ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कांग्रेस सरकार को आर्थिक वृद्धि में भरोसा ही नहीं है। इसे तो सिर्फ गरीबों को मुफ्त चीजें बांटने, तोहफे देने में भरोसा है, क्योंकि उसे लगता कि चुनाव में वोट कबाडऩे का यही तरीका है। यह बहुत ही त्रासदीपूर्ण स्थिति है, क्योंकि अर्थशास्त्र का प्राथमिक विद्यार्थी भी जानता है कि आर्थिक वृद्धि और औद्योगिक क्रांति से ही देश में टिकाऊ समृद्धि लाई जा सकती है।

यदि हम सही नीतियां अपनाएं तो अब भी औद्योगिक क्रांति ला सकते हैं। रुपए के गिरने से निर्यात के जरिये हमारे उत्पादन उद्योग को पुनर्जीवित करने का मौका है। पर इसके लिए भरोसेमंद आधारभूत ढांचे के विकास और पारदर्शी कानूनों के प्रति अगली सरकार को कटिबद्ध होना होगा, जिससे निवेशकों का विश्वास जीता जा सके। इस बीच, सरकार के बेहतर होगा कि वह जल्दी चुनाव की घोषणा कर लोगों को ही यह तय करने दे कि वे लंबे समय तक चलने वाली समृद्धि का रास्ता अपनाना चाहते हैं कि थोड़े वक्त के लोकलुभावने तोहफो के रास्ते को सही मानते हैं। लोकतंत्र में निश्चित रूप से यह कभी नहीं कहा जा सकता कि अगली सरकार क्या करेगी पर आदमी का दिल ऐसा है कि यह हमेशा 'बेहतर कल' की उम्मीद ही करता है।

 

गुरचरन दास (स्तंभकार व साहित्यकार)

साभारः दैनिक भास्कर

 

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.