रेलवे को सियासत के शिकंजे से आजाद करें

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बर्बादी से बचाने के लिए इसे कई कॉरपोरेशनों में तोड़कर उनके शेयर जनता को बेच दिए जाने चाहिए

दस साल बाद आखिरकार रेलवे का किराया बढ़ाया गया। यह बात और है कि सवारी गाड़ियों पर आने वाले 25 हजार करोड़ रुपए के घाटे में से मात्र 6600 करोड़ रुपयों की भरपाई ही इस वृद्धि से हो पाएगी। सरकारें रेल किरायों पर इतनी ज्यादा सब्सिडी इतने लंबे समय से आखिर क्यों देती आ रही हैं? अन्य किसी भी सब्सिडी की तुलन में रेल सब्सिडी का औचित्य सबसे कम है। न तो रेलों का ज्यादा इस्तेमाल गरीबों द्वारा किया जाता है, न ही इन्हें किसी अर्थ में अपरिहार्य माना जा सकता है। ज्यादातर रेलें विकसित इलाकों में चलती हैं। पिछड़े इलाकों की सेवा करना उनका मुख्य काम नहीं है। वैसे भी रेलवे 19वीं सदी की टेक्नोलॉजी है। 20वीं सदी में इनकी जगह बसों ने ले ली और दुनिया में हर जगह बसें ट्रेनों से कहीं ज्यादा सस्ती हैं। तो फिर इस महंगे और पुराने जमाने के यात्रा साधन को, जिसकी गरीबी या पिछड़ापन मिटाने में कोई भूमिका नहीं है, इतनी सब्सिडी क्यों दी जा रही है?

लोकल ट्रेनों का जाल

दिल्ली चेन्नई जैसी लंबी दूरियों के लिए बस का सफर बहुत असुविधाजनक होगा। लेकिन इतनी लंबी यात्राएं व्यापार, रोजगार, संबंधियों से मिलने और तीर्थयात्रा या पर्यटन के उद्देश्य से की जाती है। एक गरीब देश में ऐसे कामों को सरकारी मदद के दायरे में नहीं लिया जाना चाहिए। सबसे ज्यादा सब्सिडी महानगरों के ईर्दगिर्द चलने वाली ट्रेनों के किराये पर दी जाती है। कुछ विश्लेषकों की दलीली है कि इससे गरीब लोगों को शहर आने में मदद मिलती है। लेकिन सच्चाई यह है कि इन गाड़ियों से सफर करने वाले ज्यादातर पैसेंजरों का व्यापारिक उद्देश्य होता है। कोई अस्थाई श्रमिक शायद ही कभी रेल से कहीं आता जाता हो, जबकि व्यापारिक उद्देश्यों वाले यात्री अपने आने जाने का खर्च अपनी चीजों के विक्रय मूल्य में शामिल कर लेते हैं।

भीड़ और प्रदूषण

तजुर्बा बताता है कि आप लोकल किराये बढ़ाएंगे तो रोजगारदाता अपने कर्मचारियों का यात्रा भत्ता बढ़ा देंगे। यानी रेल सब्सिडी का फायदा रोजगारदाता को मिलता है, कर्मचारी को नहीं। जो लोग सचमुच गरीब हैं वे काम के लिए लंबा सफर नहीं करते। वे तो अफने काम की जगह के आसपास ही गैरकानूनी ढंग से कोई झुग्गी डाल लेते हैं। विजय जगन्नाथन ने इस संबंध में इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित अपने एक लेख में कोलकाता का शानदार ब्यौरा दिया है। दिल्ली की 80 फीसदी कॉलोनियां इसी प्रक्रिया में बसी ह , बाद में इन्हें कानूनी शक्ल दे दी गई। बहरहाल, लोकल ट्रेन वाले बड़े शहरों में गरीबी उतनी ज्यादा नहीं है, लिहाजा यहां तो सब्सिडी की वैसे भी कोई वजह नहीं बनती। इसके अलावा शहर दिनोंदिन पहले से ज्यादा भीड़ भरे और प्रदूषित होते जा रहे हैं। लोकल ट्रेनों के लिए दी जाने वाली सब्सिडी भीड़ और प्रदूषण बढ़ाने में मददगार बढ़ाने में मददगार बनती है। मुंबई में हर साल 4000 लोग खचाखच भरी ट्रेनों से गिरकर या उनसे कुचलकर मारे जाते हैं। अफसोस कि लोकल ट्रेन सब्सिडी इस तरह की मौतों को और बढ़ाने वाली साबित हो रही है।

पिछले एक दशक में रेलवे ने माल भाड़ा बढ़ाया है लेकिन यात्री किराये नहीं बढ़ाए। हमारे यहां भाड़े और किराए का अनुपात संसार में सबसे ज्यादा है। यानी यात्री किराये सस्ते रखने के लिए निर्यात समेत सारे सामानों पर एक परोक्ष कर लगाया जा रहा है। विश्व बाजार में हमारा सामान महंगा होने और निर्यात घटने की एक वजह यह भी है। ब्रिटिश राज ने अलग रेलवे बजट की व्यवस्था इसलिए बनाई थी क्योंकि सरकार आमदनी का एक बड़ा हिस्सा रेलवे से आता था। लेकिन आज रेल की आमदनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन जैसी एक तेल कंपनी से भी कम है। गठबंधन सरकारों के मौजूदा दौर में रेल मंत्रालय मजबूत गठबंधन सहयोगियों को रिझाने का जरिया बन गया है। रेलमंत्री कमोबेश वित्तमंत्री जैसे ही तामझाम के साथ रेल बजट पेश करता है। यह एक ऐसा विशेषाधिकार है, जो संसार में अन्य किसी भी रेलवे को हासिल नहीं है। यह भी विचित्र है कि अपने यहां रेलवे को नौकरियां और ठेके बांटने का जरिया समझा जाता ह। रेलमंत्री अपने पसंद के इलाकों में नई-नई ट्रेने चलाते हैं, भले ही ये इलाके रेलवे की प्राथमिकता में बहुत नीचे हों। यही नहीं, इस ओवरस्टाफ संगठन में और ज्यादा नियुक्तियों को जायज ठहराने के लिए वे नए क्षेत्रीय मुख्यालय भी बना देते हैं।

सरकारी धन के इस निर्मम दुरुपयोग को कैसे रोका जाए? इससे पूरी तरह छुटकारा पाना राजनीतिक दृष्टि से असंभव है। लेकिन टेलीकॉम सेक्टर की तरह रेलवे को कारपोरेशन में बदलकर एक बीच का रास्ता निकाला जा सकता है। आदर्श स्थिति यह होगी कि रेलवे को आपस में होड़ करने वाली कई कंपनियों में तोड़ दिया जाए। इससे एकाधिकार का मामला कमजोर पड़ेगा और विभिन्न रेल कंपनियों को अलग अलग विचार आजमा कर देखने का हौसला मिलेगा। कुछ लोगों की राय है कि कारपोरेशन भी कोई रामबाण नुस्खा नहीं है- कई मंत्री सरकारी कॉरपोरेशनों को अपनी मुट्ठी में रखने के लिए ही जाने जाते हैं। फिर भी कानून इनके बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों की उपस्थिति जरूरी बनाता है, जो इनके निकृष्टतम दुरुपयोग पर रोक लगा सकते हैं।

आगे बढ़ने का रास्ता

आदर्श स्थिति में इन रेलवे कॉरपोरेशनों के शेयर पूरी तरह या आंशिक रूप से जनता को बेच दिए जाने चाहिए। ऐसा होने पर संस्थागत और आम निवेशक लगातार इन्हें अपने सवालों के दायरे में रखेंगे। इसके बाद भी वित्तमंत्री कुछ क्षेत्रों या रेल संचालन के किसी विशेष पक्ष को सरकारी सहायता देना चाहते हैं तो यह काम वे कॉरपोरेशनों के जरिए कर सकते हैं। लेकिन इस सीमित हस्तक्षेप को छोड़कर शेष सभी मामलों में रेल कॉरपोरेशनों को स्वतंत्र वाणिज्यिक निकायों की तरह बस और हवाई जहाज जैसे बाकी यातायात साधनों के साथ होड़ में उतरने देना चाहिए। यह होड़ हमें किसी सरकारी मदद या अनचाही छत्रछाया के बगैर भी बेहतर और सुरक्षित यातायात सुविधा उपलब्ध कराएगी। आगे बढ़ने का रास्ता यही है।

- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर
साभारः नवभारत टाइम्स