बदलाव की बेचैनी

जब भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का झंडा अन्ना हजारे के हाथों से अरविंद केजरीवाल के पास आया तो इसमें एक नया जोश देखने को मिला। पिछले कुछ हफ्तों में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खुलासे सामने आए। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई सफल होती है या नहीं, लेकिन यह अपने पीछे एक बड़ी उपलब्धि छोड़ रही है। इसने मध्य वर्ग को जगा दिया है और शशि कुमार की कहानी इसे साबित करती है।

शशि कुमार से मेरी मुलाकात दस साल पहले हुई थी। 22 साल के इस नौजवान ने हाल ही में गुड़गांव में एक कॉल सेंटर में नौकरी शुरू की थी। वह बिहार के एक गांव से आया था और उसके दोस्त यह नहीं जानते थे कि शशि और उसके परिवार को कई बार भूखे पेट ही सोना पड़ता था। उसके पिता ने किसी तरह दरभंगा में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम ढूंढ लिया था और गांव से निकल आए थे, लेकिन उसमें गुजारा न होने पर मां ने भी एक छोटे से स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। उनका बेटा हर सुबह मां की उंगली थामे स्कूल जाता। वह उसी स्कूल में अपनी मां की नजरों के सामने पला-बढ़ा। अपने बेटे को बिहार की इस अपमानजनक जिंदगी से बाहर निकालने के लिए उन्होंने उसे रातों में जग-जगकर पढ़ाया और उसे एक स्थानीय कॉलेज में दाखिला दिला दिया। कॉलेज खत्म होने पर उन्होंने उसे दिल्ली का रेलवे टिकट दिया। दस साल बाद शशि कुमार एक सफल नौजवान बन गया। एक भद्र और मेहनती नौजवान, जो मैनेजर की हैसियत तक पहुंच गया। उसने अपनी कंपनी के कर्मचारियों को अमेरिकी ग्राहकों से आत्मविश्वास के साथ अंग्रेजी बोलना सिखाया। वह एक निजी बैंक से लोन पर लिए दो बेडरूम वाले फ्लैट में रहने लगा। उसने एक कार भी रख ली और अपनी बेटी को एक निजी स्कूल में पढ़ाने लगा। जीवन की संभावनाओं ने उसकी जिंदगी बदल दी। वह भारतीय समाज के सबसे तेजी से बढ़ते नए मध्य वर्ग का एक उत्पाद है।

क्या उसके पिता कभी ग्रामीण बिहार में ऐसी जिंदगी के बारे में सोच भी सकते थे? वह अब भी अपने मालिक के हाथों दबे कुचले जा रहे होते। पिता की मौत के बाद उसकी मां गुड़गांव में साथ ही रहने लगी। उसकी मां ने कहा, मैं नहीं जानती कि उसने यह सब कैसे किया। मैंने तो पाई-पाई जोड़कर उसे दिल्ली का रेलवे टिकट खरीद कर दिया था। बाकी सब उसने खुद किया। शशि कुमार की कहानी 1991 के उस दौर में ले जाती है जब भारत ने आर्थिक उदारवाद के लिए अपने रास्ते खोले थे और दूरसंचार क्षेत्र में आर्थिक सुधारों ने ही किसी अमेरिकी कंपनी के लिए यह संभव किया कि वह अपना काम भारत से आउटसोर्स कर सके। सूचना तकनीक के इंजीनियरों ने दिखाया कि वे तब उसकी आधी कीमत में सॉफ्टवेयर बना सकते हैं जब अमेरिका सोता है। अमेरिकी कंपनियों ने सुबह देखा कि आइटी सॉल्यूशन उनका इंतजार कर रहे हैं। धीरे-धीरे आउटसोर्सिग का धंधा अकाउंटेंट से लेकर वकीलों, वैज्ञानिकों और विज्ञापन पेशेवरों तक फैल गया और महानगरों में लाखों युवाओं को नौकरियां मिलीं।

पिछले साल गुड़गांव के रास्ते पर एक मेट्रो स्टेशन पर मैं शशि कुमार से फिर मिला। वह अपने दोस्तों के साथ था। वे सभी मध्यवर्गीय थे, जो बाजार तो रोजाना जाकर उसमें अपनी भागीदारी करते हैं, लेकिन चुनाव में मतदान कर शायद ही किसी ने भागीदारी की हो, जैसे चुनाव गांव-देहात की चीज हों। ट्रेन आई और हम उसमें चढ़ गए। एक नौजवान ने मेरे लिए सीट छोड़ दी। मैं यह सोचकर खुश हुआ कि अब भी बुजुर्गो के लिए लोगों के दिलों में जगह बची है। शशि ने कहा, मुझे राजनीति से नफरत है। यह मुझे बिहार की याद दिला देती है। उसके एक दोस्त ने कहा, लेकिन अन्नाजी ने अपने धर्म केंद्रित नेतृत्व से हमें जगा दिया। राजनीतिक क्रांति के लिए नैतिक क्रांति जरूरी है। मैं उतरने के लिए खड़ा हुआ, लेकिन हमने आने वाले शनिवार को सिंधिया हाउस के पास वाले कॉफी कैफे डे पर मिलने की योजना बनाई। अन्ना ने राजनीति को भी जगा दिया। याद नहीं आता कि कभी इतने सारे नेता जेल गए हों। इसका थोड़ा सा श्रेय तो अन्ना को जाता ही है, जिन्होंने सरकार पर लोकपाल लाने का दबाव डाला। हाल के दिनों में इस आंदोलन के साथ भी कुछ अप्रिय हुआ, लेकिन अब तक मध्य वर्ग जाग चुका था। भारत में यह मध्य वर्ग आबादी का एक तिहाई या चौथाई है। यह स्कूटर पर चलने वाला मध्य वर्ग है, न कि कार में, यह और बात है कि यह बनना वैसा ही चाहता है। यानी देश की बड़ी आबादी बेहतरी चाहती है। इतिहास में पहली बार मध्य वर्ग सम्मानजनक जीवन का सपना देख रहा है।

भारत का यह उभरता मध्य वर्ग दुनिया के तेजी से उभरते मध्य वर्ग का ही हिस्सा है। अपेक्षाएं पूरी न हो पाने से उपजे असंतोष के आधार पर ही यह मध्य वर्ग फल-फूल रहा है। दक्षिण कोरिया और ताइवान में इसी मध्य वर्ग ने तानाशाही सरकारें गिराईं। चीन में हजारों लोग बेहतर सार्वजनिक सेवाओं की मांग कर रहे हैं। दूसरे उभरते हुए देशों में अच्छे स्कूल, साफ पानी और अच्छे अस्पतालों की मांग हो रही है, लेकिन यूरोप और उत्तरी अमेरिका में आर्थिक संकट के चलते मध्य वर्ग का स्तर गिरा है। इसमें कोई दोराय नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मध्य वर्ग का आक्रोश वैश्विक है। जल्दी ही शशि कुमार और उसके दोस्त आ गए। मैंने उन्हें कैप्यूकिनो जैसी चीजें ऑर्डर करते सुना। मुझे यह देख हैरानी हुई कि मध्य वर्ग में आने के बाद कैसे उसकी आदतें बदल जाती हैं। इनमें से कई ने कुछ साल पहले तक कॉफी देखी भी न होगी। ये 1991 के बाद बड़े हुए हैं, जिन्होंने कभी बिना घूस के फोन या गैस का कनेक्शन नहीं लिया। यह भी भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी अधीरता को दिखाता है। इस हफ्ते वे उतने गर्ममिजाज नहीं दिख रहे थे।

भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन सही नहीं चल रहा था। उनमें से किसी एक ने कहा कि मैंने प्रतिज्ञा ली है कि मैं किसी को घूस नहीं दूंगा। उसने कहा कि यदि हर कोई ऐसे ही सोचने लगे तो इससे धर्म क्रांति आएगी और राजनीतिक बदलाव खुद आ जाएगा। शशि ने मुझसे पूछा कि हमें क्या करना चाहिए। वे मेरी तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखने लगे। मुझे यह नैतिक भार पसंद नहीं आया। मैंने कहा, तुम्हें राजनीति से जुड़ना चाहिए। शशि ने कहा, लेकिन हमारी नौकरियां और परिवार हैं। मैंने कहा, अपने पड़ोस में हर हफ्ते एक घंटा काम करो। उसे भ्रष्टाचार मुक्त बनाओ और तुम्हें तुम्हारा राजनीतिक धर्म मिल जाएगा। हमारे बीच एक चुप्पी पसर गई। मैंने पूछा, तो अब अगली बार तुम लोग मतदान करोगे? उनमें से एक ने हां में सिर हिलाया। मुझे लगा कि दुनियाभर में अन्याय हो रहा है, लेकिन शशि और उसके दोस्तों जैसे युवा इस पूर्वाग्रह को तोड़ते हैं कि मध्य वर्ग सिर्फ अपने बारे में सोचता है।

गुरचरण दास
(लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
साभारः दैनिक जागरण

गुरचरण दास

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