शहरों में हों और भी अधिक झुग्गी बस्तियां

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एक आदर्श शहर के लिए क्या-क्या जरूरी सुविधाएं हो सकती हैं? 24 घंटे बिजली और पानी? स्वच्छ वातावरण, कार, साइकिल और पैदल चलने वालों के लिए पर्याप्त चौड़ी सड़कें? शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं, खेल के मैदान, संग्रहालय, आदि? राजनीतिक व्यवस्था में अधिक दिलचस्पी लेने वाले शहर के लिए एक मेयर या महापौर की भी आवश्यकता बता सकते हैं, जिसके पास कर लगाने और प्रशासन के सभी जरूरी अधिकार हों।

ऐसे शहर निश्चित रूप से होने चाहिएं, लेकिन इसके साथ एक सच्चाई यह भी है कि अब तक ये शहर गरीबों को एक सम्माननीय जगह देने में नाकामयाब रहे हैं। शहर को लाचार गरीबों के समुद्र में समृद्ध लोगों का एक टापू भर नहीं होना चाहिए। यहां गरीबों के लिए भी गरीबी और गांव की लाचारी के दलदल से बाहर निकलने के लिए प्रचुर अवसर मौजूद होने चाहिएं।

इन बातों से एक निष्कर्ष जो निकलता है और जो शायद कई लोगों को पहली बार हजम ना हो, वह यह है कि शहरों में ढेर सारी झुग्गी बस्तियां होनी चाहिएं। ये झुग्गी बस्तियां गरीबों के लिए समृद्धि के अवसरों से भरे शहर में प्रवेश करने के लिए एक दरवाजे का काम करती हैं। शहरों में जमीन के करोड़ों रुपये चल रहे भाव को देखा जाए, तो गरीब यहां कभी भी जमीन-जायदाद नहीं खरीद सकते हैं। जब शहरों में अभी तक मूलभूत सुविधाओं की ही व्यवस्था नहीं हो पाई हैं, तो गरीबों के लिए बड़े पैमाने पर आवासीय सुविधा उपलब्ध करा पाने की बात सोचना भी दिवा स्वप्न है। यही कारण है कि ये गरीब सरकारी जमीन पर यहां-वहां मलिन बस्तियां बसा लेते हैं। ये मलिन बस्तियां हालांकि बहुतों को रास नहीं आती हैं। लेकिन इन मलिन बस्तियों को देखकर एक निष्कर्ष यह तो जरूर निकाला जा सकता है कि यदि ये गरीब ऐसे सुविधाहीन मलिन बस्तियों में रहना कबूल कर लेते हैं, तो अनुमान लगाया जा सकता है कि गांव में कैसे हालात होंगे, जिसे छोड़कर ये गरीब ऐसी मैली-कुचैली जगहों पर भी रहना स्वीकार कर लेते हैं।

कई लोग कोलकाता की झुग्गी बस्तियों को देखकर कह सकते हैं कि यह तो नरक है। इसी के साथ वे नक्सलबाड़ी में धान से लहलहाते हरे-भरे खेतों और यहां फैली हरियाली को देखकर निहाल हो सकते हैं। फिर भी समृद्ध लोगों को नहीं दिखाई पड़ने वाले एक सच का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां के हालात कितने भयानक होंगे कि यहीं से 1967 में नक्सलियों का विद्रोह फूटा। नक्सलबाड़ी के हालात से मुक्ति पाने के लिए कई गरीब ग्रामीणों ने कोलकाता मे नरक जैसी इन्हीं झुग्गी बस्तियों में शरण ली।

कुछ आशावादी लोगों का मानना है कि गांव को ही समृद्ध बनाने की कोशिश की जाए। उनकी इस सोच को पलायनवाद ही कहा जा सकता है। भारत में 16 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। भारत के 125 करोड़ लोगों में इसे बांटा जाए, तो हर एक के हिस्से एक एकड़ का सिर्फ आठवां हिस्सा ही आएगा। यही नहीं शहरी आबादी आज की 30 फीसदी से दोगुणी होकर 60 फीसदी हो जाए, तो भी गांव में हर एक व्यक्ति के हिस्से इस बंटवारे में सिर्फ एक तिहाई हेक्टयर जमीन ही आएगा। यह विचार वस्तुतः निरंतर गरीबी में बने रहने का नुस्खा है और ऐसी व्यवस्था में कितनी भी सबसिडी दे दी जाए, समाज में समृद्धि नहीं आ सकती। गांव के गरीब लोगों को यह पता है, इसलिए वे शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं। शहरी अमीर लोग इसे समझ ही नहीं पाते। वे चाहते हैं कि गांव के लोग कुछ भी करें बस शहर में नहीं आएं।

कुछ लोगों का मानना है कि शहर की झुग्गी-बस्तियों में लोग नरक का जीवन जी रहे हैं। यह सतही दृष्टि है। मुम्बई की धारावी की गिनती दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गियों में होती है। यहां सिर्फ 175 हेक्टेयर क्षेत्र में 6 लाख आबादी ठुसी हुई है। लेकिन नरक का जीवन तो दूर, धारावी मुम्बई का सबसे बड़ा औद्योगिक केंद्र है। यहां कपड़े की सभी मिलों के बंद हो जाने के बावजूद औद्योगिक गतिविधि बंद नहीं हुई। धारावी में एक कमरे में चलने वाली 15,000 फैक्टरियां हैं, जो हर साल 60 करोड़ डॉलर के सामान और सेवाओं का उत्पादन करती हैं।

धारावी की स्थिति पर सबसे अच्छी तरह से रोशनी डालती है झुग्गी बस्तियों के लिए काम करने वाली गैरसरकारी संस्था ‘स्पार्क’ (एसपीएआरसी)। "यहां आप अनेक प्रकार की औद्योगिक गतिविधियां देख सकते हैं - चाहे वह इडली बनाने का काम हो, या वह मिट्टी के बर्तन बनाने का काम हो या चमड़े का काम हो, यहां तक कि हवाई जहाजों में इस्तेमाल होने वाले बर्तन बनाने का काम हो। धारावी में सबके लिए जगह है और हमेशा नौकरी उपलब्ध है। एक ओर यहां आपको हर माह 300 रुपये की मामूली तनख्वाह कमाने वाले मजदूर मिल जाएंगे, तो 3 लाख हर माह कमाने वाले कारोबारी भी। हमारी जानकारी में धारावी के 21 बच्चे आज मेडीकल कॉलेज में पढ़ रहे हैं और 40 से अधिक बच्चे इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहे हैं। धारावी मे अमीरों और गरीबों के बीच कोई भेदभाव नहीं है और अधिकतर लोगों का अपना रोजगार है। यहां एक ओर गरीबों की मेहनत का पसीना है, तो कारोबारियों का दम-खम भी है।"

यह नारकीय जीवन की कथा नहीं है, बल्कि एक प्रेरणादायी कहानी है, जिसमें लोगों ने मेहनत और लगन से शहर में फैले अवसर का दोहन किया। यह एक अलग बात है कि सरकार यहां मूलभूत सुविधा उपलब्ध करा पाने में नाकाम है। लेकिन सरकार सिर्फ इन झुग्गियों मे ही नहीं, हर जगह मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करा पाने में नाकाम है।

चार्ल्स डिकेंस ने 19वीं शताब्दी में लंदन की झुग्गियों की हृदयविदारक तस्वीर प्रस्तुत की थी। इसी तरह अमेरिकी लेखक भी न्यूयार्क की झुग्गी बस्तियों का रोना रोया करते थे। लेकिन ये लेखक इन झुग्गी बस्तियों में काम कर रहे जज्बे को नहीं देख पाए, जिसने मलिन बस्तियों को महंगे रियल एस्टेट में बदल दिया। भारत में भी कई लोग यहां की झुग्गी बस्तियों को लेकर इसी प्रकार की गलती कर रहे हैं।

कुछ लोग चाहते हैं कि यहां शहरों में फैली झुग्गी बस्तियों को बुल्डोजर से ढहा दिया जाए, और गरीबों को गांव वापस लौटने का हुक्म सुना दिया जाए। लेकिन मैं स्पार्क की इस राय का समर्थन करुंगा कि झुग्गियों का पुनर्विकास झुग्गीवासियों की सहमति से लोकतांत्रिक तरीके से किया जाए।

सरकार गरीबी दूर करने के लिए बहुत कुछ नहीं कर पाई है, लेकिन झुग्गी बस्तियों ने यह काम किया है। भूमि सुधार गरीबों को भूमि का आवंटन करने में बुरी तरह नाकाम रहा। लेकिन सिर्फ झुग्गी बस्तियों को कानूनी मान्यता देकर सरकार ने करोड़ों गरीबों को जमीन आवंटित कर दी है। यह सच है कि एक समर्थ और परोपकारी सरकार भूमि का आवंटन बेहतर तरीके से कर सकती है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि सरकार ना तो कभी पूर्णतः समर्थ होती है और न ही कभी परोपकारी। इसलिए यह तरीका गरीबों को जमीन का मालिक बनाने का कम से कम एक कारगर तरीका तो है ही।

अर्थशास्त्री हर्नांडो डि सोटो ने कहा है कि गरीबों के लिए असली समस्या इस गैर मान्यता प्राप्त झुग्गियों में जमीन पर उनका कानूनी मालिकाना हक का अभाव है। कानूनी हक न होने के कारण उन्हें यह डर सताता रहता है कि कभी उनके बनाए ढांचे को गिरा दिया जाएंगे। इसके अलावा वे जमीन गिरवी रखकर ऋण भी नहीं ले सकते। लेकिन लोकतांत्रिक भारत के साथ एक अच्छी बात यह है कि सरकार बहुत कम ही झुग्गी बस्तियों को खाली कराती है साथ ही हर चुनाव से पहले प्रायः कई झुग्गी बस्तियों को मान्य कर दिया जाता है। इस तरीके से गरीबों को किसी भी अन्य औपचारिक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की तुलना में अधिक भूमि का आवंटन किया गया है।

मैं मानता हूं कि झुग्गी बस्तियों के कई लोगों को काम की जगह से बहुत दूर बसा दिया गया है और कई बार झुग्गी बस्तियों पर माफिया ताकतों का नियंत्रण होता है। फिर भी ये झुग्गी बस्तियां उत्पादकता, सामाजिक गतिशीलता और गरीबी उन्मूलन के लिए एक प्रेरणा केंद्र हैं।

निश्चित रूप से हमें बेहतर सरकार और बेहतर शहर के लिए कई मूलभूत सुधार करने हैं। निश्चित रूप से शहरों में बेहतर सड़क, बिजली और पानी की आपूर्ति चाहिए। लेकिन यदि शहर को सामाजिक गतिशीलता में कोई भूमिका निभानी है, तो हमें धारावी की तरह ढेर सारी झुग्गी बस्तियां भी चाहिएं। ये बेहतर और उन्नत झुग्गी बस्तियां हो सकती हैं, लेकिन आखिर होंगी झुग्गी बस्तियां ही।

- स्वामीनाथन अय्यर