जुगाड़ भारत का सबसे अहम संसाधन है

लोग कई बार मुझसे ये पूछते हैं कि वाकई जुगाड़ है क्या? ग्लोबल मैनेजमेंट विशेषज्ञ भारत के तेजी से हो रहे आर्थिक विकास का श्रेय जुगाड़ को देते हैं। लेगाटम इंस्टीच्यूट के एक ताजा सर्वे में भारतीय कारोबारियों में 81 फीसदी ने ये कहा कि उनकी कामयाबी में जुगाड़ ने मुख्य भूमिका निभाई। कई साल पहले, नए-नए प्रयोग करने वाले पंजाबियों ने सिंचाई में इस्तेमाल होने वाले डीजल पंप को स्टील के ढांचे में जोड़ा। इसमें पहिए लगाए गए और एक नया वाहन तैयार हुआ, जिसे जुगाड़ का नाम दिया गया। यह काफी सस्ता साधन था, लेकिन इसे वाहन कानूनों के तहत मान्यता नहीं मिली थी। एक अंतराल के बाद, जुगाड़ का इस्तेमाल उन सभी नए उपायों के लिए होने लगा जो स्थानीय बाधाओं को दूर करने के लिए लोगों ने खुद ईजाद किए। 

पश्चिम में, वैज्ञानिक खर्चीले साधनों के जरिए नई खोज करते हैं। जबकि भारत में हर घरेलू महिला, किसान, वाहन चालक, कारोबारी और उद्योगपति नई खोज कर डालता है। इसके लिए आर एंड डी के भारी भरकम बजट की जरूरत नहीं पड़ती, खोज के लिए तो बस कल्पना और सृजनात्मकता की जरूरत होती है। अनिल अंबानी ने एक बार कहा था कि रिलायंस ने आविष्कारों ( invention) की बदौलत नहीं बल्कि नई खोजों (innovation) की बदौलत ही कामयाबी हासिल की है। मैनेजमेंट गुरुओं के शब्दों में जुगाड़ का एक अवतार है मितव्ययी इंजीनियरिंग (frugal engineering), जिसकी मिसाल है दुनिया की सबसे सस्ती कार - टाटा नैनो। भारत की टेलीकॉम कंपनियां एक रुपये प्रति मिनट की कॉल दर की सुविधा देती हैं, जो दुनिया में सबसे सस्ती दर है। नारायण हृदयालय और शंकर नेत्रालय दुनिया में सबसे सस्ता हर्ट और आई ट्रीटमेंट देते हैं। भारत में पेटेंट दवाओं की रिवर्स इंजीनियरिंग भी मितव्ययी इंजीनियरिंग का ही नमूना है। कुछ मैनेजमेंट विशेषज्ञ जुगाड़ के खतरों से आगाह भी करते हैं क्योंकि यहां कानूनी या गैरकानूनी ढंग से अपना काम निकालने को ही अहमियत दी जाती है। उनके मुताबिक धोखाधड़ी और चालबाजी को मौलिक रचनात्मकता मानने का भ्रम नहीं पालना चाहिए। मैं इससे असहमत हूं।

कुछ-एक अपवादों को छोड़ दें तो अनैतिक क्रियाकलापों की सृजनात्मकता और मितव्ययी इंजीनियरिंग की सृजनात्मकता में कोई मूलभूत अंतर नहीं है। सृजनात्मकता का इस्तेमाल अनैतिक फायदे के लिए होगा या किसी और रूप में होगा यह राजनैतिक-आर्थिक तंत्र की ओर से मिलने वाले प्रोत्साहन और बढ़ावे से ही तय होता है। उदाहरण के तौर पर अवैध ड्रग की तस्करी करने वाले हवाला बाजार का उपयोग धन के लेन-देन के लिए करते हैं। जबकि दूसरी ओर ये जुगाड़ भी है जिसके जरिए गरीब प्रवासी अपने देश में पैसे भेज पाते हैं, जो कि किसी भी बैंकिंग सिस्टम से ज्यादा सस्ता है। ज्यादातर देशों में हवाला तब तक वैध था, जब तक कि आधुनिक सरकारों ने इसे गैरकानूनी घोषित नहीं कर दिया।

धीरूभाई अंबानी जुगाड़ के मास्टर थे। लाइसेंस-परमिट राज में उनके लिए वैध तरीकों से आगे बढ़ पाना नामुमकिन था, ऐसे में उन्होंने तंत्र में व्याप्त निराशा (सिनिसिज्म) और भ्रष्टाचार का दोहन किया। उन्होंने लाभकर आयात इनटाइटलमेंट्स हासिल करने के लिए कबाड़ का निर्यात किया। उन्होंने लाइसेंस से कहीं ज्यादा मात्रा में औद्योगिक क्षमता का विस्तार किया। उन्होंने स्पेयर पार्ट्स के तौर पर बड़ी टेक्सटाइल मशीनों का आयात किया। उन्होंने बदला मार्केट में अवैध तरीके से छापे गए फेक रिलायंस शेयर उतारे। उन्होंने नियमों को तोड़-मरोड़कर पोलिएस्टर आयात किया और टेलीकॉम लाइसेंस हासिल किए। वो ये सब पूंजीवादी व्यवस्था के साथ एक तरह का याराना बना कर हासिल कर पाए। हालांकि जब लाइसेंस परमिट राज की जगह ज्यादा खुली और नियंत्रणमुक्त अर्थव्यवस्था ने ली, तब भी धीरूभाई अंबानी ने उसी जुगाड़ का इस्तेमाल करते हुए आश्चर्यजनक ढंग से अपनी उत्पादकता बढ़ाई और वैश्विक ब्रांड बन गए। जामनगर में उनके विशाल रिफाइनरी कॉम्पलैक्स में प्रसिद्ध सिंगापुर रिफाइनरिज की तुलना में कहीं ज्यादा मुनाफा हुआ। उन्होंने पोस्टकार्ड से भी सस्ती टेलीफोन कॉल्स के अपने सपने को यथार्थ में बदल दिया।

धीरूभाई अंबानी ने ये साबित कर दिया कि विश्व स्तरीय उत्पादन और औद्योगिक चालबाजी जुगाड़ नामक सिक्के के दो पहलू हैं। अगर सरकार नियंत्रण और अत्यधिक कर के जरिए अड़चनें पैदा करेगी तो जुगाड़ के जरिए उन बाधाओं को पार किया जाएगा। लेकिन अगर मुक्त बाजार में इन बाधाओं से निजात मिल जाती है तो उद्योग जगत के सामने मुख्य चुनौती गुणवत्ता और कीमत पर काबू रखने की होगी, ऐसे में जुगाड़ का मु्ख्य ध्येय उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार के साथ ही कीमतें कम करना रह जाएगा। जो अंततः आपको वर्ल्ड क्लास बना देता है। जुगाड़ अनैतिक है। अगर कानून दमनकारी हों, तो जुगाड़ कानून के दायरे से बाहर काम करता है। फिर भी इस अनैतिक जुगाड़ ने भारतीय कारोबारियों को 1970 के दशक में जिंदा रखा, जबकि 97.75 फीसदी के आय कर और 3.5 फीसदी के संपत्ति कर का मजबूत कानूनी दायरा था। ईमानदार कारोबारियों के लिए टैक्स चुकाने का सीधा मतलब दीवालिया हो जाना था। लेकिन जुगाड़-टैक्स बचाने के लिए अपनाई गई युक्तियों ने भारतीय कारोबारियों को बचाए रखा, और जब उन्मादी समाजवादी आर्थिक नीतियों से मुक्ति मिली तो उसी कारोबार का खूब विकास भी किया।

समाजवादी राजनीतिज्ञ खुद को बड़े दिलवाला जीनियस मानते थे, और ये भी समझते थे कि उन्हें लालची मारवाड़ियों की तुलना में ज्यादा समझ थी कि क्या उत्पादन होना चाहिए। नोबेल पुरस्कार विजेता विद्वान हाएक (Hayek) ने इसे घातक मिथ्या अहंकार की संज्ञा दी है। भारत के पास तेल या तांबा के प्रचुर प्राकृतिक संसाधन भले न हों, लेकिन इसके पास जुगाड़ है, जो कहीं ज्यादा मूल्यवान है। तेल जैसे प्राकृतिक संसाधन अक्सर एक अभिशाप बन जाते हैं- वे सरकार को निरंकुश या भ्रष्ट बना देते हैं। लेकिन जुगाड़ सरकार को भ्रष्ट और निरंकुश नीतियों से निजात दिलाने में सहायक होते हैं। माना गया था कि समाजवादी योजना से भारतीय संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल होगा। लेकिन इसने भारतीय उद्योंगों के हर क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों और नवीन खोजों को कोई अहमियत नहीं दी। पंचवर्षीय योजनाओं का मकसद आर्थिक संसाधनों, खनिज संसाधनों (कोयला, तेल) और प्रशासनिक संसाधनों का सर्वोत्तम इस्तेमाल करना था लेकिन इसने सभी संसाधनों में सबसे अहम ‘‘उद्योगों और जुगाड़’’ का सर्वनाश कर दिया। आर्थिक सुधारों के जरिए उद्योग जगत को पाबंदियों से मुक्ति मिली है और जुगाड़ की अहमियत को पूरे विश्व ने मान्यता दी है। शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचों में भी सरकारी योजनाओं की स्थिति भयावह है। यहां भी समाजवादी नियंत्रण की जगह जुगाड़ को आजमाने की जरूरत है, लेकिन काश राजनीतिज्ञ और समाजवादी विचारक इसकी अनुमति देने की सोच भी पाते।

- स्वामीनाथन अय्यर पूर्व प्रकाशित, वर्ष 2011

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