बीस साल बाद का भारत

(आर्थिक खुलेपन, जिसकी शुरुआत 1991 में हुई, के ज़रिये भले ही भारत में समृद्धि आई, लेकिन इसके लिए राजनीतिक जमीन तैयार नहीं हो पाई)

केंद्र सरकार ने हाल ही मे देश का सलाना आर्थिक बजट पेश किया। इसके साथ ही नई आर्थिक नीति को अपनाए हुए लगभग 20 साल पूरे हो गए, जब भारत ने अपनी उन अधिकतर पुरानी आर्थिक नीतियों का त्याग कर दिया था, जिसने 1991 के शुरुआती महीनों में भारत को कंगाली की कगार पर ला खड़ा किया था।

उस वर्ष नाटकीय रूप से उदारीकरण की नीतियों को अपनाने और 1990 के दशक के आखिरी सालों में किए गए कुछ नीतिगत बदलावों को कुछ मायनों में जबदरस्त सफलता मिली-- भारतीय अर्थव्यवस्था में पहले की तुलना में काफी अधिक स्थायित्व आया और यह पहले से अधिक समृद्ध भी हुआ। लेकिन पिछले छह सालों में आर्थिक सुधार को आगे बढ़ाने में मिली असफलता और पिछले सुधारों की कुछ खामियों को देखने से यह समझा जा सकता है कि सुधार के लिए राजनीतिक जमीन तैयार क्यों नहीं हो पाई।

सुधार की गुणवत्ता के बारे में आप चाहे जो कहें, भारत ने 1991 के बाद एक लम्बा सफर तय किया है। इससे पहले सरकारी फिजूलखर्ची, अप्रतिस्पर्धी और अत्यधिक संरक्षित अर्थव्यवस्था, ऊंचा कर, अत्यधिक महंगी विनिमय दर और अत्यधिक तेजी से मुद्रा के देश से बाहर निकल जाने के कारण सरकार 15 दिनों के भीतर अंतर्राष्ट्रीय कर्ज को चुकता करने के मामले में दीवालिया हो गई थी। इस स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने शुल्कों में कटौती की, औद्योगिक लाइसेंस की नीतियों का त्याग किया और अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के लिए खोल दिया। सरकार हालांकि आज भी कुछ उसी तरह की समस्याओं से जूझ रही है-उदाहरण के लिए अत्यधिक बजटीय घाटा, चालू खाते का घाटा-फिर भी देश की आर्थिक स्थिति पहले से काफी बेहतर है और इसका श्रेय सुधारवादी कदमों को जाता है।

इन सुधारों का लाभ सिर्फ अर्थव्यवस्था के स्तर पर ही नहीं हुआ है, बल्कि एक गरीब के घर में भी इसका लाभ दिखाई पड़ रहा है। औसतन एक डॉलर की आय 1991 के बाद बढ़कर लगभग तीन डॉलर हो गई है। खान-पान में सुधार हुआ और अधिक प्रोटीन का सेवन किया जाने लगा। मानव विकास संकेतक में मौजूदा सदी के पहले दशक में 1990 के दशक की तुलना में अधिक तेजी से सुधार हुआ है। बुनियादी उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ रही है। अब गरीब समुदायों में भी मोबाईल फोन, घड़ियां और पंखे आम तौर पर देखे जाने लगे हैं।

फिर भी 1991 के उस तथाकथित बिग बैंग और उसके बाद के सुधारों के बाद भी काफी कुछ करने के लिए बाकी रह गया है। पिछले कुछ सालों में खास तौर से कांग्रेस पार्टी की अगुआई वाली मनमोहन सिंह की सरकार में उदारीकरण का वह जज़्बा नहीं दिखा, जिन्होंने 1991-93 के दौरान देश वित्त मंत्री के रूप में अधिकतर क्रांतिकारी सुधारों को पहली बार लागू करने में मदद की थी। लेकिन 2004 में कांग्रेस पार्टी की अगुआई वाली सरकार के सत्ता में आने के बाद से दूसरी पीढ़ी के कई महत्वपूर्ण सुधारों, जैसे एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर, को लागू करने की दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है।

खास तौर से श्री सिंह ने भारत के श्रम कानून को उदार बनाने के दिशा में कुछ नहीं किया, जो कि रोजगार बढ़ाने की राह में सबसे बड़ी बाधा है। 1947 में भारत की आजादी के बाद से बनाए गए अनेक श्रम कानूनों के कारण कम्पनियों के लिए इच्छानुसार कामगारों को नौकरी पर रखना और नौकरी से निकालना कठिन हो गया है। इन कानूनों के कारण कम्पनियां श्रम के सस्ता होने के बावजूद पूंजीगत वस्तु या मशीनों को तरजीह देती हैं। इसलिए कम्पनियों का मुनाफा बढ़ने के बावजूद कम्पनियों के कामगारों की संख्या में वृद्धि नहीं हुई है।

इन सब बातों के बीच सरकार बुनियादी सार्वजनिक सेवाएं भी उपलब्ध नहीं करा पा रही हैं। नागरिकों को स्कूल और अस्पताल जाने का अवसर देने और यहां तक कि पेयजल उपलब्ध करा पाने के मामले में भी देश की सरकार का रिकार्ड अच्छा नहीं है। कुछ मामलों में सरकार कानून और व्यवस्था का भी भरोसा नहीं दिला सकती। इन सब बातों से पुरानी शिकायत और भी मजबूत हो जाती है कि सरकार आर्थिक मोर्चे पर तो काफी कुछ कर रही है, लेकिन सुशासन के मोर्चे पर कुछ नहीं कर रही है। इसलिए आगे की प्राथमिकता तय करते वक्त आर्थिक सुधार और शासन व्यवस्था में सुधार दोनों को समान महत्व दिया जाना चाहिए।

एक बड़ी समस्या यह है कि सुधार की शुरुआती विफलताओं से ऐसी राजनीतिक स्थिति उत्पन्न हो रही है, जिससे और अधिक उदारीकरण की राह पर आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा है। सबसे बड़ी राजनीतिक-आर्थिक पहेली और सर्वाधिक गंभीर चुनौती यह है कि शुरुआती सुधार ने आगे के सुधारों के लिए राजनीतिक जमीन तैयार नहीं की। मतदाता अभी भी उन उम्मीदवारों को मत देते हैं, जो बड़े-बड़े कल्याणकारी कार्यों के वादे करते हैं या अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप की बात करते हैं।

सुधारवादी नेताओं को चुनाव में मत क्यों नहीं मिलता है, यह श्रम बाजार को देखकर सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। सुधार के कारण भले ही किसी क्षेत्र में आज फोन और हर प्रकार की उपभोक्ता वस्तुएं मौजूद हैं, लेकिन वहां निरंतर रोजगार उपलब्ध नहीं हो पाया है। कर्मचारियों की बहाली के कारोबार से जुड़ी कम्पनी टीमलीज सर्विसेज के मनीष सभरवाल कहते हैं कि पिछले दो दशकों में सारे सकारात्मक बदलावों के बावजूद एक संख्या जस की तस बनी हुई है- 93 फीसदी भारतीय कामगार, जिनकी संख्या आज लगभग 50 करोड़ है, आज भी असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, यानी, संगठित क्षेत्र से बाहर हैं और उनका नियोक्ताओं से कोई कॉण्ट्रैक्ट नहीं होता है।

इस तरह आधुनिक रोजगार अवसरों की कमी और सार्वजनिक सेवाओं की बदहाल स्थिति के कारण करोड़ों भारतीयों के जीवन स्तर में उस तरह का सुधार नहीं हो रहा है, जो दूसरे अधिकतर एशियाई देशों के लोगों के जीवन में हुआ है। बेरोजगार और अर्द्ध-बेरोजगार भारतीय अभी भी अमानवीय और गरिमा रहित जीवन जी रहे हैं। 1991 के बिगबैंग की तारीफ को देखिए और सोचिए कि इसमें उन लोगों के लिए क्या है?

लोगों की बढ़ती आकांक्षा और उसे जल्दी से पूरा करने में सरकारी अक्षमता के कारण भारतीय राजनीति में गलत प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलता है। राजनीतिज्ञ खुशी से इसका नाजायज लाभ उठाते हैं। और वे सुधारवादी कदमों से समस्या को जड़ से दूर करने के लिए सबके सहयोग की अपील करने की बजाए अनुदारवादी खर्चों और सब्सिडी देकर मामले को तात्कालिक रूप से निपटाने में अधिक सुविधा महसूस करते हैं।

इसके आधार पर उन कदमों को समझा जा सकता है, जिसके कारण सुधारवादी विकास के बावजूद भारत वापस पीछे की ओर चला गया है। इन प्रतिगामी कदमों में श्री सिंह के प्रस्तावित एनटाइटेलमेंट भी हैं, जबकि खुद उन्हीं ने 1990 के दशक में सुधारवादी कदमों की अगुआई की थी। इसका सबसे प्रासंगिक उदाहरण है उनकी सरकार द्वारा 2005 में शुरू की गई ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, जिसमें गांवों के गरीबों को अनिवार्य तौर पर वेतन दिया जाता है, चाहे उनके करने के लिए कोई काम हो या नहीं हों।

वर्ष 2010 में सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित किया, जिसमें विद्यार्थियों के दाखिला और उनको स्कूलों में बनाए रखने पर विचार किए बगैर सरकारी शिक्षकों को अधिक ताकत दी गई। इधर पिछले दो सालों से सरकार भोजन का अधिकार अधिनियम पर विचार कर रही है, जिसके कारण मौजूदा सब्सिडी खर्च कई गुना बढ़ जाएगा। उल्लेखनीय है कि सब्सिडी पर अभी ही हर साल 500 अरब रुपये खर्च हो रहे हैं। राज्य को कर के रूप में अधिक राशि हासिल नहीं होती है। ऐसे में इन सभी काय्रक्रमों का सीमा से अधिक विस्तार करने से राज्य की वित्तीय स्थिति गड़बड़ा सकती है।

क्या ये एन्टाइटलमेंट भारत में उदारीकरण के बाद की स्थिति को प्रभावित करेंगे? 1991 के बाद के पहले दशक में हमने देखा कि आम लोग जीविका के निम्नतम जद्दोजहद से ऊपर उठे और निजी खपत में इजाफा हुआ। दूसरे दशक में स्थिति थोड़ी और बेहतर हुई और परिवार स्तर पर भविष्य में निवेश होने लगा, जैसे, लोगों ने शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाए। तीसरा दशक हमारे ऊपर है। यदि सुधार को लेकर कायम राजनीतिक जड़ता को तोड़ा नहीं गया, तो इस दशक में वे सकारात्मक विकास नहीं हो पाएंगे, जो पहले के दो दशकों में हुए हैं।

बेशक ऐसा हो सकता है कि समृद्धि बढ़ने से मतदाताओं को एंटाइटलमेंट से अलग हटकर सोचने की प्रेरणा मिलेगी-वे ऐसे नेता की खोज कर सकते हैं, जो अवसरों में बढ़ोतरी कर और बेहतर आधारभूत संरचना खड़ा कर अधिक सुरक्षित भविष्य दे सकें। राज्यों के स्तर पर इसकी शुरुआत हो भी चुकी है। पिछले नवंबर में देश के सबसे पिछड़े राज्य बिहार में मतदाताओं ने नितीश कुमार को दोबारा चुना। वे एक ऐसे नेता के रूप में सामने आए, जिन्होंने शासन में सुधार किया और निवेशकों को भी राज्य में आकर्षित किया। गुजरात में भी नरेंद्र मोदी को आर्थिक मोर्चे पर मिली शानदार सफलता का राजनीतिक लाभ मिला।

अगर यह इसी तरह से चलता रहा, तो राष्ट्रीय राजनीति में भी बदलाव आ सकता है। लेकिन भारत को अभी भी उस राष्ट्रीय स्तर के एक नेता का इंतजार है, जो दूसरी पीढ़ी के सुधार को आगे बढ़ाने के महत्व को समझता हो।

- निरंजन राजाध्यक्ष

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