दर्द सहने की क्षमता ही महिलाओं की सबसे बड़ी दुश्मन

आदि काल से ही महिलाओं को उनकी दर्द सहने की अदभुत क्षमता के कारण सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन दर्द सहने की यह क्षमता ही कभी-कभी उनके लिए मुसीबत का सबब बन जाती है और उन्हें अपनी जान से हाथ भी धोना पड़ जाता है। हार्ट अटैक के मामले में तो यह अदभुत क्षमता और ज्यादा खतरनाक साबित होती है। जी हां, अमेरिका में हुए एक शोध में इस बात का खुलासा हुआ है कि हार्ट अटैक के कारण महिलाओं की मृत्यु की प्रतिशतता पुरूषों की मृत्यु की प्रतिशतता से कहीं ज्यादा (लगभग ४१ फीसदी) होती है। इसका कारण महिलाओं में दर्द सहने की जबरदस्त क्षमता का होना ही होता है।

हार्ट अटैक होने पर पुरूषों की तुलना में महिलाओं के मरने की आशंका कहीं ज्यादा होती है। प्रतिष्ठित अमेरिकी मेडिकल पत्रिका जनरल आफ दी अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, हार्ट अटैक के दौरान सीने में उठने वाले दर्द को महिलाएं आसानी से सह जाती हैं और चिकित्सक के पास तब तक नहीं जाती जब तक कि स्थिति असहनीय स्तर पर नहीं पहुंच जाती। जबकि पुरूष दर्द बर्दास्त करने की अपेक्षाकृत कम क्षमता के कारण सीने में उठने वाले दर्द की स्थिति में शीघ्र ही डाक्टर के पास पहुंच जाते हैं। जल्दी चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध हो जाने के कारण हार्ट अटैक के मामले में अधिकांश पुरूष रोगियों को बचा लिया जाता है। जबकि महिलाएं अपेक्षाकृत देर से अस्पताल पहुंचने के कारण तुलनात्मक रूप से ज्यादा मौत की शिकार होती हैं। जवान व स्वस्थ महिलाओं के मामले में तो स्थिति और भी खतरनाक है। चूंकि जवान व स्वस्थ महिलाओं में दर्द सहने की क्षमता वृद्ध अथवा कमजोर महिलाओं की तुलना में ज्यादा होता है इसलिए उन्हें हार्ट अटैक का पता और देर से चलता है।

जरनल के मुताबिक सीने में दर्द को हार्ट अटैक का सबसे प्रमुख लक्षण माना जाता है। लेकिन महिलाओं में इसकी शिकायत नहीं मिलने की वहज से इन्हें देरी से अस्पताल लाकर इलाज शुरू करने की वजह से मौत होने की आशंका ज्यादा बढ़ जाती है। शोध में बताया गया है कि हार्ट अटैक होने पर सीने में दर्द की शिकायत के साथ मात्र ३०.७ प्रतिशत महिलाएं ही अस्पताल में दाखिल हुईं। इसके उलट दर्द की शिकायत साथ अस्पताल में भर्ती होने वाले पुरुषों की प्रतिशतता ४२ फीसद रही। अमेरिका में १९९४-२००६ के बीच हार्ट अटैक होने पर अस्पताल में दाखिल हुए लगभग १२ लाख मरीजों के बीच किए गए इस शोध में पाया गया कि इनमें से १४.६ फीसदी महिलाओं की मौत हो गई जबकि इस दौरान केवल १०.३ प्रतिशत पुरूषों ने ही दम तोड़ा। महिला व पुरूष रोगियों की मौत की प्रतिशतता के बीच के इस अंतर का एक बड़ा कारण अस्पताल में भर्ती होने के समय का अंतराल था।

शोध के अनुसार, कम उम्र में दिल की बीमारी वाली महिलाओं में मरने का खतरा कहीं ज्यादा है। दर्द नहीं होने की वजह से इन्हें काफी देर से अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। समय पर ठीक इलाज नहीं मिलने की वजह से ये महिलाएं अपने हमउम्र पुरूषों से पहले मर रहीं है। हालांकि बढ़ती उम्र के साथ ही सीने में दर्द और मरने की संभावनाओं में फर्क कम होने लगता है।

इस शोध को करने वाले वाटसन क्लीनिक एंड लेकलैंड रीजनल मेडिकल सेंटर के डा. जान कौन्टों का कहना है कि सीने में दर्द नहीं होने पर भी अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों के इलाज में थोड़ी कम आक्रामकता देखी गई है। पुरूष रोगियों की आक्रामकता अधिक जबकि महिला रोगियों में आक्रामकता अपेक्षाकृत कम देखने को मिलती है। आक्रामकता के आधार पर डाक्टर भी पुरूष रोगियों को चिकित्सा में वरीयता देते हैं। यही वजह है कि दर्द की शिकायत वाले मरीजों के जीने की संभावना बिना दर्द वाले मरीजों से कहीं ज्यादा होती है।' डा. जॉन का कहना है कि हार्ट अटैक से संबंधित संगठनों को जवान महिलाओं में इसके खतरे के बारे में जागरूक करने की शुरुआत करनी चाहिए। शोध में हार्ट अटैक के कारण अस्पताल में भर्ती होने वाले कुल १२ लाख रोगियों को शामिल किया गया। भर्ती रोगियों में से १४.६ प्रतिशत महिलाओं की मौत हुई जबकि इस दौरान १०.३ प्रतिशत पुरूषों ने ही दम तोड़ा।

- अविनाश चंद्र

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