कमेन्टरी - गुरचरण दास

गुरचरण दास

इस पेज पर गुरचरण दास के लेख दिये गये हैं। उनके लेख विभिन्न भारतीय एवं विदेशी शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। इसके अलावा उन्होने कई बेस्टसेलर किताबें भी लिखी हैं।

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एक समय था जब मैं विश्वास करता था कि मैं एक वैश्विक नागरिक हूं और इस पर गर्व अनुभव करता था कि घास की एक पत्ती बहुत कुछ दूसरी पत्ती की तरह ही होती है। लेकिन अब मैं पाता हूं कि इस धरती पर घास की प्रत्येक पत्ती का अपना एक विशिष्ट स्थान है, जहां से वह अपना जीवन और ताकत पाती है। ऐसे ही किसी भी व्यक्ति की जड़ उस जमीन में होती है जहां से वह अपने जीवन और उससे संबंधित धारणा-विश्वास को अर्जित करता है। जब कोई अपने अतीत की तलाश करता है तो उन जड़ों को मजबूत करने में
Published on 30 Dec 2014 - 20:07
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही हमारे शहरों को पुनर्जीवित करने वाले महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की शुरुआत ‘स्मार्ट सिटी’ के बैनर तले करने वाले हैं। हालांकि, भारतीय शहर स्मार्ट तब बनेंगे जब इन्हें उन वास्तविक परिस्थितियों को केंद्र में रखकर बनाया जाएगा, जिनमें भारतीय काम करते हैं और उन्हें लालची राज्य सरकारों के चंगुल से छुड़ाकर स्वायत्तता दी जाएगी। जब तक शहरों में सीधे चुने गए ऐसे मेयर नहीं होंगे, जिन्हें शहर के लिए पैसा जुटाने की आज़ादी हो और म्यूनिसिपल कमिश्नर जिनके मातहत हों, तब तक शहरी
Published on 16 Dec 2014 - 18:53
बहुत से भारतीयों की धारणा अभी भी यही है कि बाजार धनी लोगों को और अधिक धनी तथा गरीबों को और अधिक गरीब बनाता है तथा यह भ्रष्टïचार एवं क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा देता है। वास्तव में यह एक गलत धारणा है। वास्तविकता यही है कि पिछले दो दशकों में व्यापक तौर पर समृद्धि बढ़ी है और तकरीबन 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले हैं। बावजूद इसके लोग अभी भी बाजार पर अविश्वास करते हैं। आंशिक तौर पर इसके लिए आर्थिक सुधारकों को दोष दिया जा सकता है, जो प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषताओं अथवा धारणा को ब्रिटेन
Published on 25 Nov 2014 - 18:10

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