गुरचरण दास

इस पेज पर गुरचरण दास के लेख दिये गये हैं। उनके लेख विभिन्न भारतीय एवं विदेशी शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। इसके अलावा उन्होने कई बेस्टसेलर किताबें भी लिखी हैं।

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जब भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का झंडा अन्ना हजारे के हाथों से अरविंद केजरीवाल के पास आया तो इसमें एक नया जोश देखने को मिला। पिछले कुछ हफ्तों में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खुलासे सामने आए। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई सफल होती है या नहीं, लेकिन यह अपने पीछे एक बड़ी उपलब्धि छोड़ रही है। इसने मध्य वर्ग को जगा दिया है और शशि कुमार की कहानी इसे साबित करती है।

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केवल भारतीयों के बीच ही नहीं, पूरे विश्व में इस बात के खूब हल्ले है कि भारत एक महाशक्ति बन रहा है। हर दिन पाश्चात्य मीडिया में कोई न कोई खबर दिखाई पड़ती है, जिसमें भारत को भविष्य की महाशक्ति के रूप में दर्शाया जाता है। जाहिर है, ये बातें एक ऐसे देश को मीठी ही लगेंगी जिसे बीसवीं सदी में हताश राष्ट्र बताया जाता था। इस हताशा का मुख्य कारण हमारा खराब आर्थिक प्रदर्शन था, किंतु सुधारों की वजह से अब भारत की अवस्था बदल गई है और आज भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।

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मेरे मत में भूमंडलीकरण या कंवर्जेस का विरोध करना पागलपन है। सिएटल में विरोध का जो प्रदर्शन हुआ वह पागलपन था। विरोध करनेवालों में कई श्रमिक संगठनवादी थे जो अपने बाजार की रक्षा कर रहे थे। विरोध करनेवालों की कोशिश है कि भारत के उत्पादन उनके यहां न पहुंचे। लेकिन विश्व व्यापार संगठन का प्रयास है कि सब आगे बढ़े। विश्व व्यापार से गरीब और अमीर दोनों को समान लाभ पहुंचे। इसलिए स्वदेशी के नाम पर संरक्षण चाहनेवालों की एक ही कोशिश है कि वे अपने समाज और देश को बंद रखना चाहते हैं क्योंकि ऐसे लोगों के विशेष हित होते हैं। भारत के श्रमिक संगठनों और वामपंथियों ने भी देश को विश्व व्

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मेरे भूमंडलीकरण के संबंध में साफ विचार हैं। अर्थशास्त्र में एक पुरानी बात बतलाई जाती है । यदि व्यापार और पूंजी निवेश के आधार पर गरीब देश का संबंध अमीर देश के साथ स्थापित हो जाता है तो कालांतर में दोनों देशों का जीवन स्तर समान हो जाता है । इसे ‘थ्योरम आफ कंवर्जेंस’कहा जाता है। यह एडम स्मिथ का विचार है। 20वी सदी के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पाल सैमुअलसन ने  इस सिद्धांत को सिद्ध भी कर दिया था।

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2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के चक्कर में पंद्रह महीने जेल में बिताकर लौटे पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा कुछ हफ्ते पूर्व जब चेन्नई पहुंचे तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। उन्मादी भीड़ उस शख्स के लिए आतिशबाजी कर रही थी, जो तमिलनाडु चुनाव में अपनी पार्टी की हार के लिए काफी हद तक जिम्मेदार था। जिसने दुनिया की नजरों में भारत की छवि खराब कर दी और केंद्र सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर दिया। इसके अगले ही हफ्ते राजा जब अपने निर्वाचन क्षेत्र नीलगिरिस व गृहनगर पेरंबलूर पहुंचे तो उनका और भी जबरदस्त स्वागत किया गया। अपने देश और अपनी पार्टी को इतना अधिक नुकसान पहुंचाने पर उन्हें दंडित करने के

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वॉशिंगटन डीसी में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु एक सच बात कह गए। उन्होंने वहां उपस्थित अपने श्रोताओं से कहा कि उनकी सरकार की निर्णय क्षमता पंगु हो चुकी है और २०१४ के चुनावों तक किसी तरह के सुधारों की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। अलबत्ता, बाद में उन्होंने इस बयान का खंडन किया, क्योंकि इससे उन्हीं की सरकार की फजीहत हो रही थी, लेकिन सच्चाई तो यही है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा, जो भारत में पिछले दो सालों से नहीं कहा जा रहा था। वॉशिंगटन में बसु के श्रोता हैरान थे कि भारत जैसा जीवंत लोकतंत्र, जो एक उभरती हुई आर्थिक ताकत है और जिसकी सिविल सोसायटी ऊर्जावान है, की स

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लोकपाल बिल कुछ और समय के लिए टल गया है और अन्ना हजारे की टीम ने एक और आंदोलन करने की बात कही है। लोकायुक्त के मसले और लोकपाल को कौन हटा सकता है, लोकपाल से सीबीआई का रिपोर्टिंग संबंध कैसा होगा, जैसे बिंदुओं पर अब भी राजनीतिक दलों में सामंजस्य नहीं है। लेकिन वास्तव में ये सभी बहसें अर्थहीन हैं। वास्तविक समस्या है न्याय प्रक्रिया में होने वाला विलंब। यदि सीबीआई पर लोकपाल का नियंत्रण हो, तब भी अदालतों पर तो उसका कोई नियंत्रण नहीं होगा। निचली अदालतों में अनेक कारणों और अनेक तरीकों से अदालती मामलों को लंबित किया जाता है। यह एक बड़ी समस्या है। जैसा कि एक पुरानी कहावत भी है : देर

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संप्रग सरकार के मंत्रियों के लिए कुछ सुझाव हैं, जिन्होंने विश्व में भारत की साख को मिट्टी में मिला दिया है। ढाई साल पहले नौ फीसदी की भारत की विकास दर को दिसंबर 11 की तिमाही में 6.1 के स्तर पर लाने के दौरान बहुत कुछ घट गया है। विकास दर में एक प्रतिशत की गिरावट का मतलब है करीब 15 लाख लोगों की रोजगार से छुट्टी। इसमें हैरत की बात नहीं है कि संप्रग सरकार के कार्यकाल में देश ने बेहद तकलीफ और पीड़ा झेली है। भ्रष्टाचार का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है, किंतु असल त्रासदी है कानून के शासन में गिरावट। कभी भारत की ताकत रहा कानून का शासन अब पतन की ओर अग्रसर है। इस सरकार ने वोडाफ

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टाम पामर ने कई लेखों की एक अनूठी श्रृंखला तैयार की है जिसमें पूंजीवाद के नैतिक आयाम के बारे में श्रेष्ठ चिंतन को संकलित किया गया है। मुझे इस बात की खुशी है कि इस प्रस्तावना के जरिये मुझे इस बहस में योगदान करने के लिए आमंत्रित किया गया।

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पिछले लगभग एक माह की अवधि में हमने एक अद्भुत तमाशा देखा, जिसमें भारत के जनतंत्र की जीत हो सकती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 24 नवंबर को सरकार ने एक साहसी और परिवर्तनकारी आर्थिक सुधार की घोषणा करते हुए रिटेल में 51 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दी। इसके बाद देशभर में राजनीतिक फलक पर तूफान-सा उठ खड़ा हुआ और अंतत: सरकार को इस सुधार को स्थगित करना पड़ा।

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