गुरचरण दास
इस पेज पर गुरचरण दास के लेख दिये गये हैं। उनके लेख विभिन्न भारतीय एवं विदेशी शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। इसके अलावा उन्होने कई बेस्टसेलर किताबें भी लिखी हैं।
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पूंजीवाद से पहले लोकतंत्र
अप्रैल 8, 2011 - 12:58भ्रष्टाचार की दुर्गंध बहुत तेजी से फैलती है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की बेटी कनिमोझी पर सीबीआई द्वारा जल्द ही केस दायर करने की खबर के साथ ही लगता है कि अब शिकंजा कसा जाने लगा है। डीएमके की पीआर मशीन 13 अप्रैल को तमिलनाडु में होने वाले चुनाव से पहले ‘ईमानदार झूठ’ का प्रसार करने के लिए कमर कस चुकी है।
डीएमके और एआईएडीएमके दोनों को तकरीबन एक तिहाई मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है। डीएमके की जूनियर पार्टनर कांग्रेस का नियंत्रण लगभग 12 से 15 फीसदी वोटों पर है और एआईएडीएमके के सहयोगी विजयकांत की मुट्ठी में लगभग 9 फीसदी वोट हैं। एआईएडीएमके को एंटी इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) का फायदा हो सकता है, लेकिन मुकाबला नजदीकी होगा और पूरी संभावना है कि तमिलनाडु में गठबंधन सरकार बने। लेकिन हमारे लिए यह चिंतनीय होना चाहिए कि राजनीतिक नैतिकता को चुनौती देने के लिए भ्रष्टाचार का एक अन्य स्वरूप तेजी से उभर रहा है और बहुत संभव है कि वह उत्तरप्रदेश जैसे अन्य राज्यों को एक वायरस की तरह अपनी चपेट में ले ले।
पर्यावरण की शत्रु नहीं है तीव्र विकास दर
मार्च 28, 2011 - 14:07चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने पिछले दिनों कहा कि उनके देश में अगले पांच साल के लिए वार्षिक संवृद्धि दर का लक्ष्य घटाकर सात प्रतिशत कर दिया गया है। हमें तीव्र आर्थिक संवृद्धि के लिए अपने पर्यावरण का बलिदान नहीं करना चाहिए। उन्होंने सरकार से सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि से ध्यान हटाकर संवृद्धि की गुणवत्ता और लाभ पर केंद्रित करने को कहा। वेन का बयान चीन और भारत की आर्थिक संवृद्धि का वैश्विक पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर पश्चिमी जगत की चिंताओं के मद्देनजर आया है। पिछले साल चीन की संवृद्धि दर 10.3 प्रतिशत थी, जो इस साल 9 प्रतिशत रह गई है। यद्यपि वह अपने देश के नागरिकों से मुखातिब थे, फिर भी उनका संदेश पश्चिम के आलोचकों पर लक्षित था।
सरकार की साख बहाली के उपाय
मार्च 8, 2011 - 12:43प्रिय प्रधानमंत्री जी, आज आपकी सरकार की विश्वसनीयता दांव पर लगी हुई है। भ्रष्टाचार, नीति-निर्धारण में विचलन और एक पंगु शासन ने देश चलाने की संप्रग सरकार की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आप ऐसा आभास देते हैं जैसे आप पद पर तो हैं, लेकिन ताकत आपके पास नहीं। फिर आपको क्या करना चाहिए? मेरे विचार से इस सवाल का उत्तार काफी कुछ उन संकेतों में निहित है जो पिछले दिनों कुल मिलाकर निराशाजनक प्रेस कांफ्रेंस में आपने दिए। सरकार को अपनी ताकत वाले क्षेत्रों का इस्तेमाल करना चाहिए और अपना इकबाल नए सिरे से स्थापित करना चाहिए।
छोटे मसलों से बनती सरकारें
फरवरी 3, 2011 - 15:23क्या भारतीय मतदाता सरकार बदलने का फैसला बड़े मुद्दों के आधार पर करता है? जी नहीं। उसका उनसे कोई लेना-देना नहीं होता। वह सड़क, पानी, सामान्य प्रशासन जैसी उन बातों के आधार पर सत्ता बदलता है जो उसके दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं।
रसूकदार भी बने दंड के भागी
जनवरी 20, 2011 - 11:382जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर लोगों के मन में जो गुस्सा है, अगर वह बेकार चला जाए तो यह बहुत शर्मनाक होगा। ऐसा न हो, यह सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका यही है कि दोषियों को फौरन से पेशतर कैदखाने की सलाखों के पीछे भेज दिया जाए। यदि हम ऐसा कर पाने में कामयाब साबित होते हैं तो हम अपने प्रशासनिक तंत्र में भी विश्वास कायम रख पाएंगे।
माइक्रोफाइनेंस को बुरा ना माने
जनवरी 4, 2011 - 12:07हमारे देश में एक अद्भुत घटना घट रही है। तीन करोड़ गरीब महिलाओं ने छोटा-मोटा कारोबार शुरू करने के लिए थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ऋण लिए हैं।
अमेरिका की स्वतंत्रता और भारत का धर्म
दिसम्बर 2, 2010 - 12:46ताकत हासिल कर लेना एक बात है और उसका इस्तेमाल करना दूसरी। पिछले दिनों जब दिल्ली में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की भेंट हुई तो यह दो निराश नेताओं की भेंट थी। ओबामा जहां अमेरिका में मध्यावधि चुनावों में नाटकीय हार से हैरान थे, वहीं मनमोहन सिंह एक के बाद एक हो रहे घोटालों के खुलासों से परेशान थे।
आईपीएल विरोध का अर्थ पूंजीवाद विरोध नहीं
मई 7, 2010 - 18:17आईपीएल छह हफ्तों तक चली नॉन स्टॉप पार्टी की तरह था। भारत के लाखों-करोड़ों लोगों के लिए आईपीएल की जादुई रातें रोजमर्रा की जिंदगी में राहत देने वाली थीं। सट्टा बाजार भी इससे अछूता नहीं रहा। ललित मोदी के आईपीएल कमिश्नर पद पर बने रहने के कयासों की कीमत बीते शनिवार ही एक के बदले साढ़े पांच रुपए थी।
बीटी बैंगन की दिल तोड़ने वाली कहानी
मार्च 9, 2010 - 17:44
बीटी बैंगन की दिल तोड़ने वाली कहानी एक उद्यमी के जीवन की अनिश्चितताओं के साथ-साथ हर मोड़ पर पेश आने वाली त्रासदियों को प्रतिबिंबित करती है। यह सभी लोकतंत्रों के लिए ऐसा संस्थागत तं
बिजनेस की ही सामाजिक जिम्मेदारी क्यों?
फरवरी 16, 2010 - 16:55हाल ही में दिल्ली में एक दोपहर भोज के दौरान गुलाबी साड़ी पहने एक महिला ने मुझे घेर लिया। वह मुझे कारपोरेट की सामाजिक जिम्मेदारी पर धाराप्रवाह भाषण देने लगीं। मैंने अपने आप से पूछा कि आखिर क्यों कोई डॉक्टरों, वकीलों, पत्रकारों को सामाजिक जिम्मेदारी पर भाषण नहीं देता? बिजनेस के लोगों के खिलाफ ही यह आक्रोश क्यों? सही है कि भारत में आर्थिक सुधारों की सफलता के बाद पूंजीवाद के प्रति हमारा शत्रु भाव कुछ कम हुआ है। लोग यह तो मानते हैं कि बाजार व्यवस्था से समृद्धि आई है, लेकिन पूंजीवाद को नैतिक व्यवस्था वे अब भी नहीं मानते।
