गुरचरण दास

इस पेज पर गुरचरण दास के लेख दिये गये हैं। उनके लेख विभिन्न भारतीय एवं विदेशी शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। इसके अलावा उन्होने कई बेस्टसेलर किताबें भी लिखी हैं।

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सभी हैं कानून के अधीन

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सितंबर की उस तपती हुई दोपहर को जब मुख्य और जिला सत्र न्यायाधीश एस कुमारगुरु ने निर्णय सुनाना शुरू किया, तब धर्मपुरी (तमिलनाडु) के उस खचाखच भरे कोर्टरूम में खामोशी पसरी हुई थी। न्यायाधीश ने 3.30 बजे निर्णय सुनाना प्रारंभ किया था, लेकिन यह प्रक्रिया लगभग एक घंटे तक जारी रही, क्योंकि उन्हें उन 215 सरकारी अधिकारियों के नाम पढ़कर सुनाने थे, जिन्हें दोषी ठहराया गया था। उन 12 अधिकार

इलाज से बेहतर है रोकथाम

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धूल दब गई है और कुछ हद तक शांति कायम हो गई है। दिल्ली को फतह कर अन्ना हजारे अपने गांव लौट गए हैं। अगले तूफान से पहले उन्हें अपनी बढ़त को और मजबूत करना चाहिए। वह अपने सहयोगियों के साथ मंथन कर रहे हैं ताकि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक परिणामोन्मुख, दीर्घकालीन एजेंडे को आगे बढ़ा सकें। इस बीच, मैं टीम अन्ना को भ्रष्टाचार के कुछ प्राथमिक घटकों से अवगत कराना चाहता हूं। यह देखना अहम है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कौन से कदम कारगर साबित हो सकते हैं और कौन से नहीं। यह एक तरह से भ्रष्टाचार से लड़ने की नियमावली है। मजबूत लोकपाल अच्छा विचार है, किंतु यह प्रभावी होना चाहिए। लोकपाल तभी सफल हो सकता है जब यह कुछ चुनिंदा मामलों को ही हाथ में ले। इसे अपना ध्यान बड़ी मछलियों पर केंद्रित करना चाहिए और छोटी मछलियां लोकायुक्त, सतर्कता आयुक्त और अन्य एजेंसियों के जिम्मे छोड़ देनी चाहिए।

पंथनिरपेक्ष समाज का हो सृजन

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मैं जन्म से हिंदू हूं और आम मध्यवर्गीय माहौल में पला-बढ़ा। मैं अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ा। मेरे दादा-दादी आर्यसमाज से जुड़े थे। हालांकि मेरे पिता ने दूसरा रास्ता अपनाया। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान वह एक गुरु के प्रभाव में आ गए जिन्होंने ध्यान के माध्यम से भगवान से सीधे साक्षात्कार की संभावना के बारे में बताया। गुरु एक राधास्वामी संत थे, जो कबीर, नानक, मीराबाई, बुल्ले शाह और भक्ति व सूफी संप्रदाय के अन्य संत-कवियों की रचनाएं उद्द्धृत किया करते थे।

प्रशासनिक सुधारों की है आवश्यकता

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अन्ना हजारे ने देश के लिए एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है, लेकिन असल चुनौती अब शुरू होती है। तेरह दिनों के अनशन के बाद उन्होंने सरकार को तो अपनी अधिकतर मांगों के समक्ष झुकने को विवश कर दिया, लेकिन यदि अब वे अपनी राष्ट्रचेता की भूमिका में बरकरार रहना चाहते हैं, तो उन्हें फूंक-फूंककर कदम रखने होंगे।

लोकपाल बिल ने देश की उम्मीदें जगा दी हैं, लेकिन मुझे लगता है कि बड़े पैमाने पर प्रशासनिक सुधारों के बिना लोकपाल बेअसर ही साबित होगा। टीम अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का अगला एजेंडा यही होना चाहिए।

स्वतंत्रता दिवस पर मन हताश

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अब तक किसी भी स्वतंत्रता दिवस से पहले भारत का मूड इतना विषादग्रस्त नहीं रहा है। विडंबना है कि पिछला एक दशक भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे सुनहरा काल रहा है। देश विस्मयकारी रूपांतरण के दौर से गुजर रहा है। दशकों से देश प्रगति के पथ पर जा रहा है। देश का प्रत्येक नागरिक तो इस संपन्नता में भागीदारी नहीं कर सका, किंतु काफी बड़ी संख्या में भारतीयों ने महसूस किया कि उनका जीवन उनके माता-पिता के जीवन से बेहतर है और उनके बच्चे उनसे भी बेहतर जीवन जिएंगे। पश्चिम में बुझती आकांक्षाओं के विपरीत हमारी महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही हैं। उदाहरण के लिए, जो लोग पहले पैदल चलते थे अब साइकिल की सवारी कर रहे हैं, जिनके पास साइकिल थी वे अब मोटरसाइकिल खरीद रहे हैं और जिनके पास मोटरसाइकिल थी, अब कार में घूम रहे हैं। अगर अब सरकार देश के सभी नागरिकों को अच्छे स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और सुशासन उपलब्ध करा सके तो देश के सभी तबकों का उद्धार हो जाएगा। किंतु रोजमर्रा की घटनाएं इस शानदार तस्वीर को मुंह चिढ़ा रही हैं।

मंदिर सम्पदा ने व्यावसायिक विरासत याद करायी

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केरल के श्रीपद्मनाभ मंदिर से अकूत संपदा का प्राप्त होना दुनियाभर के लिए विस्मय का कारण बन गया है। इस संपदा का मूल्य एक लाख करोड़ रुपए आंका गया है, जबकि मंदिर का एक तहखाना खोला जाना अब भी बाकी है। इसके साथ ही श्रीपद्मनाभ मंदिर संपदा के मामले में तिरुपति सहित दुनिया के किसी भी अन्य धर्मस्थल से आगे निकल गया है। यदि कलात्मक महत्व के आधार पर मंदिर की संपदा का आकलन किया जाए तो यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। कुछ पश्चिमियों के दिमाग में इस संपदा ने वैसा ही जादू जगाया है, जैसा कभी गोलकुंडा के खजाने ने जगाया था। इसी खजाने की खोज में क्रिस्टोफर कोलंबस भारत को ढूंढ़ने निकला था, लेकिन भूलवश अमेरिका पहुंच गया था। कुछ अन्य लोगों के लिए यह संपदा एक गुत्थी बन गई है। श्रीपद्मनाभ मंदिर की संपत्ति का आखिर क्या अर्थ निकाला जाए? यह संपत्ति किसकी है? यह मंदिर तक कैसे पहुंची? और अब इसका क्या किया जाना चाहिए?

भ्रष्टाचार की पहेली को समझिए

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नेताओं को समझना होगा कि भारत का नया मध्यवर्ग आत्मसम्मान के लिए लड़ने को तैयार है. वह अपने गुस्से को खुद जाहिर कर रहा है. जन भावना का दबाव राजनीतिक व्यवस्था व नेताओं को अस्थिर कर देगा या फ़िर एक वास्तविक राजनीतिक सुधार की नींव रखेगा.

एक साल पहले किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि कई मंत्री, राजनेता, वरिष्ठ अधिकारी और सीइओ तिहाड़ जेल में होंगे और सुनवाई का सामना कर रहे होंगे. भारत में भ्रष्टाचार अब कोई नयी खबर नहीं है, यह आम प्रतिक्रिया अप्रत्याशित और एक पहेली की तरह है. यदि ऐसा है तो फ़िर घूसखोरी के खिलाफ़ अंतहीन आंदोलन क्यों हो रहे हैं? दरअसल, आज खुद के प्रति आश्वस्त और जिज्ञासु नया मध्यवर्ग तेजी से उभर रहा है. इस मध्यवर्ग ने आत्मसम्मान और गरिमा हासिल की है और अब इसे मीडिया और राजनेताओं के द्वारा भी गंभीरता से लिया जा रहा है. अनुमान है कि मध्यवर्ग 2020 तक भारत की आबादी का 50 प्रतिशत तक हो जायेगा. तब हमारी राजनीति भी बदल जायेगी. हम आज जिन घटनाओं से रूबरू हो रहे हैं, वे आने वाले बड़े बदलाव के ट्रेलर मात्र हैं.

मुनाफाखोरी का उपचार है आधुनिक रीटेल

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कभी-कभी मैं खुद से पूछता हूं कि मुझे एक किलो आलू के 12 रुपये क्यों चुकाने चाहिए, जबकि किसानों को इसमें से सिर्फ तीन या चार रुपये ही मिलते हैं? आलू लंबी यात्रा करके मुझ तक पहुंचते हैं। किसान से मंडी और वहां से दुकानदार की लंबी श्रृंखला है। वितरण श्रृंखला के प्रत्येक चरण में व्यापारी मेरे 12 रुपयों का कुछ हिस्सा अपने पास रख लेते हैं। किसानों को जो मिलता है और ग्राहक जो भुगतान करते हैं उसमें 8-9 रुपयों का अंतर बहुत बड़ा है। अध्ययनों से पता चलता है कि शेष विश्व के मुकाबले भारत में यह अंतर सबसे अधिक इसलिए है, क्योंकि यहां बिचौलियों की संख्या सबसे अधिक है। अमेरिकी किसानों को उपभोक्ता मूल्य का लगभग आधा मिल जाता है। मेरे मामले में अमेरिकी किसान को छह रुपये प्रति किलो मिलते। वस्तुत: यह अंतर माल और मौसम पर भी निर्भर करता है, किंतु कृषि अर्थशास्त्रियों के अध्ययन के अनुसार विकसित देशों में किसान इसलिए अधिक हिस्सा प्राप्त कर पाते हैं, क्योंकि वहां वितरण श्रृंखला अधिक छोटी और कुशल है।

काले धन का अर्थशास्त्र

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काले धन का जवाब है वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)। भाजपा शासित प्रदेश जीएसटी का रास्ता रोक कर काले धन पर अंकुश न लगाने के सबसे बड़े दोषी हैं। इस तरह वे काले धन की महामारी को फैलने में सहयोग प्रदान कर रहे है। देश भर में बाबा रामदेव के प्रति जबरदस्त श्रद्धा है। उन्होंने योग के प्रति जागरूकता पैदा कर करोड़ों लोगों को स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित किया, किंतु एक क्षेत्र विशेष में ठोस उपलब्धियों का यह मतलब नहीं कि वह काले धन के विशेषज्ञ हो गए है। उनकी मंशा तो अच्छी है, किंतु वह काले धन के अर्थशास्त्र को नहीं समझते। न तो रामदेव और न ही भाजपा यह समझती है कि भारतीयों द्वारा विदेशी बैंकों में जमा किए गए काले धन से कहीं बड़ी मात्रा में काला धन भारत में मौजूद है। इसलिए देश की पहली प्राथमिकता देश के अंदर काले धन पर रोक लगाने की होनी चाहिए और इसका सर्वश्रेष्ठ उपाय है जीएसटी लागू करना। जीएसटी व्यापारियों और नागरिकों के नकद व्यवहार पर रोक लगाता है, क्योंकि इसमें कर के भुगतान पर प्रोत्साहन है।

मुक्त बाजार नैतिक व्यवहार को प्रेरित करता है

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भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।

हम लोगों ने कई सालों में आर्थिक सुधार की धीमी वृद्धि देखी है जिस दौरान हमने कुछ नुकसानदेह समाजवादी संस्थाओं को विखण्डित किया है। फिर भी एक विशाल कार्य-सूची है जिसे पूरा किये बिना हम खुद को एक सख्त पूंजीवादी लोकतंत्र नही कह सकते। और तो और, यह भी देखा जा सकता है कि चुनाव के दौरान नेता आज भी एक उदार आर्थिक सुधार के मंच पर प्रचार करने से कतराते हैं। उन्हे लगता है कि पूंजिवादी संस्थाओं का समर्थन राजनीतिक विफलता का रास्ता है।