गुरचरण दास

इस पेज पर गुरचरण दास के लेख दिये गये हैं। उनके लेख विभिन्न भारतीय एवं विदेशी शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। इसके अलावा उन्होने कई बेस्टसेलर किताबें भी लिखी हैं।

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भूमंडलीकरण और विश्व व्यापार संगठन हमारे सबसे बड़े दोस्त ------ (1)

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मेरे भूमंडलीकरण के संबंध में साफ विचार हैं। अर्थशास्त्र में एक पुरानी बात बतलाई जाती है । यदि व्यापार और पूंजी निवेश के आधार पर गरीब देश का संबंध अमीर देश के साथ स्थापित हो जाता है तो कालांतर में दोनों देशों का जीवन स्तर समान हो जाता है । इसे ‘थ्योरम आफ कंवर्जेंस’कहा जाता है। यह एडम स्मिथ का विचार है। 20वी सदी के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पाल सैमुअलसन ने &nb

कायदे-कायदे की बात

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2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के चक्कर में पंद्रह महीने जेल में बिताकर लौटे पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा कुछ हफ्ते पूर्व जब चेन्नई पहुंचे तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। उन्मादी भीड़ उस शख्स के लिए आतिशबाजी कर रही थी, जो तमिलनाडु चुनाव में अपनी पार्टी की हार के लिए काफी हद तक जिम्मेदार था। जिसने दुनिया की नजरों में भारत की छवि खराब कर दी और केंद्र सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर दिया।

नाकामी व कामयाबी की दास्तां

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वॉशिंगटन डीसी में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु एक सच बात कह गए। उन्होंने वहां उपस्थित अपने श्रोताओं से कहा कि उनकी सरकार की निर्णय क्षमता पंगु हो चुकी है और २०१४ के चुनावों तक किसी तरह के सुधारों की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। अलबत्ता, बाद में उन्होंने इस बयान का खंडन किया, क्योंकि इससे उन्हीं की सरकार की फजीहत हो रही थी, लेकिन सच्चाई तो यही है कि उन्होंने ऐसा

'राजधर्म' और 'दंडनीति'

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लोकपाल बिल कुछ और समय के लिए टल गया है और अन्ना हजारे की टीम ने एक और आंदोलन करने की बात कही है। लोकायुक्त के मसले और लोकपाल को कौन हटा सकता है, लोकपाल से सीबीआई का रिपोर्टिंग संबंध कैसा होगा, जैसे बिंदुओं पर अब भी राजनीतिक दलों में सामंजस्य नहीं है। लेकिन वास्तव में ये सभी बहसें अर्थहीन हैं। वास्तविक समस्या है न्याय प्रक्रिया में होने वाला विलंब। यदि सीबीआई पर लोकपाल का नियं

हताश करने वाला माहौल

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संप्रग सरकार के मंत्रियों के लिए कुछ सुझाव हैं, जिन्होंने विश्व में भारत की साख को मिट्टी में मिला दिया है। ढाई साल पहले नौ फीसदी की भारत की विकास दर को दिसंबर 11 की तिमाही में 6.1 के स्तर पर लाने के दौरान बहुत कुछ घट गया है। विकास दर में एक प्रतिशत की गिरावट का मतलब है करीब 15 लाख लोगों की रोजगार से छुट्टी। इसमें हैरत की बात नहीं है कि संप्रग सरकार के कार्यकाल में देश ने बेह

पूंजीवाद का धर्म

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टाम पामर ने कई लेखों की एक अनूठी श्रृंखला तैयार की है जिसमें पूंजीवाद के नैतिक आयाम के बारे में श्रेष्ठ चिंतन को संकलित किया गया है। मुझे इस बात की खुशी है कि इस प्रस्तावना के जरिये मुझे इस बहस में योगदान करने के लिए आमंत्रित किया गया।

राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए

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पिछले लगभग एक माह की अवधि में हमने एक अद्भुत तमाशा देखा, जिसमें भारत के जनतंत्र की जीत हो सकती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 24 नवंबर को सरकार ने एक साहसी और परिवर्तनकारी आर्थिक सुधार की घोषणा करते हुए रिटेल में 51 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दी। इसके बाद देशभर में राजनीतिक फलक पर तूफान-सा उठ खड़ा हुआ और अंतत: सरकार को इस सुधार को स्थगित करना पड़ा।

नियमन से कायम हो संतुलन

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उत्तर प्रदेश में आगामी चुनाव के माहौल को देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी अस्पताल में आपातकालीन ऑपरेशन चल रहा हो। दोनों में ही दिमाग में तरह-तरह के ख्यालात आते है। विश्व आर्थिक व्यवस्था, जिसे पूंजीवाद कहा जाता है, बड़े संकट से जूझ रही है, किंतु उत्तर प्रदेश के लोगों का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। उन्हे तो बस इससे मतलब है कि लखनऊ में उन पर कौन शासन करेगा। अमेरिका और यूरोप, दोनों की मा

रतन टाटा की शानदार विरासत

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नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाले देश के प्रमुख औद्योगिक घराने टाटा ग्रुप से एक वर्ष के अंदर बदलाव की दूसरी बड़ी खबर आयी है 43 वर्षीय युवा सायरस मिस्त्री की डिप्टी चेयरमैन के पद पर नियुक्ति के रूप में. रतन टाटा द्वारा अध्यक्ष पद छोड़ने और कंपनी की कमान युवा हाथों में देने की 2010 में की गयी पहल के बाद से ही इस पर बहस छिड़ गयी थी.

सफल देश को चाहिए मजबूत सत्ता और समाज

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केवल भारतीयों के बीच ही नहीं, पूरे विश्व में इस बात के खूब हल्ले है कि भारत एक महाशक्ति बन रहा है। हर दिन पाश्चात्य मीडिया में कोई न कोई खबर दिखाई पड़ती है, जिसमें भारत को भविष्य की महाशक्ति के रूप में दर्शाया जाता है। जाहिर है, ये बातें एक ऐसे देश को मीठी ही लगेंगी जिसे बीसवीं सदी में हताश राष्ट्र बताया जाता था। इस हताशा का मुख्य कारण हमारा खराब आर्थिक प्रदर्शन था, किंतु सुध