गुरचरण दास

इस पेज पर गुरचरण दास के लेख दिये गये हैं। उनके लेख विभिन्न भारतीय एवं विदेशी शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। इसके अलावा उन्होने कई बेस्टसेलर किताबें भी लिखी हैं।

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पूंजीवाद का धर्म

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टाम पामर ने कई लेखों की एक अनूठी श्रृंखला तैयार की है जिसमें पूंजीवाद के नैतिक आयाम के बारे में श्रेष्ठ चिंतन को संकलित किया गया है। मुझे इस बात की खुशी है कि इस प्रस्तावना के जरिये मुझे इस बहस में योगदान करने के लिए आमंत्रित किया गया।

राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए

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पिछले लगभग एक माह की अवधि में हमने एक अद्भुत तमाशा देखा, जिसमें भारत के जनतंत्र की जीत हो सकती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 24 नवंबर को सरकार ने एक साहसी और परिवर्तनकारी आर्थिक सुधार की घोषणा करते हुए रिटेल में 51 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दी। इसके बाद देशभर में राजनीतिक फलक पर तूफान-सा उठ खड़ा हुआ और अंतत: सरकार को इस सुधार को स्थगित करना पड़ा।

नियमन से कायम हो संतुलन

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उत्तर प्रदेश में आगामी चुनाव के माहौल को देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी अस्पताल में आपातकालीन ऑपरेशन चल रहा हो। दोनों में ही दिमाग में तरह-तरह के ख्यालात आते है। विश्व आर्थिक व्यवस्था, जिसे पूंजीवाद कहा जाता है, बड़े संकट से जूझ रही है, किंतु उत्तर प्रदेश के लोगों का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। उन्हे तो बस इससे मतलब है कि लखनऊ में उन पर कौन शासन करेगा। अमेरिका और यूरोप, दोनों की मा

रतन टाटा की शानदार विरासत

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नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाले देश के प्रमुख औद्योगिक घराने टाटा ग्रुप से एक वर्ष के अंदर बदलाव की दूसरी बड़ी खबर आयी है 43 वर्षीय युवा सायरस मिस्त्री की डिप्टी चेयरमैन के पद पर नियुक्ति के रूप में. रतन टाटा द्वारा अध्यक्ष पद छोड़ने और कंपनी की कमान युवा हाथों में देने की 2010 में की गयी पहल के बाद से ही इस पर बहस छिड़ गयी थी.

सफल देश को चाहिए मजबूत सत्ता और समाज

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केवल भारतीयों के बीच ही नहीं, पूरे विश्व में इस बात के खूब हल्ले है कि भारत एक महाशक्ति बन रहा है। हर दिन पाश्चात्य मीडिया में कोई न कोई खबर दिखाई पड़ती है, जिसमें भारत को भविष्य की महाशक्ति के रूप में दर्शाया जाता है। जाहिर है, ये बातें एक ऐसे देश को मीठी ही लगेंगी जिसे बीसवीं सदी में हताश राष्ट्र बताया जाता था। इस हताशा का मुख्य कारण हमारा खराब आर्थिक प्रदर्शन था, किंतु सुध

माओवाद पर हो तगड़ा प्रहार

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छत्तीसगढ़  में 7 अक्टूबर को लैंडमाइन धमाके में माओवादी विद्रोहियों ने चार जवानों को मौत के घाट उतार दिया। फिर भी इस खबर ने लोगों का ध्यान नहीं खींचा। अखबारों में छोटी सी खबर छपी और अगले दिन गायब हो गई। इस खबर के साथ इतना तिरस्कारपूर्ण व्यवहार नहीं होता, अगर यह किसी जिहादी द्वारा किया गया आतंकी धमाका होता। भारतीय माओवाद को गंभीरता से नहीं लेते। इसको लेकर वे विभ्रम का शिका

सभी हैं कानून के अधीन

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सितंबर की उस तपती हुई दोपहर को जब मुख्य और जिला सत्र न्यायाधीश एस कुमारगुरु ने निर्णय सुनाना शुरू किया, तब धर्मपुरी (तमिलनाडु) के उस खचाखच भरे कोर्टरूम में खामोशी पसरी हुई थी। न्यायाधीश ने 3.30 बजे निर्णय सुनाना प्रारंभ किया था, लेकिन यह प्रक्रिया लगभग एक घंटे तक जारी रही, क्योंकि उन्हें उन 215 सरकारी अधिकारियों के नाम पढ़कर सुनाने थे, जिन्हें दोषी ठहराया गया था। उन 12 अधिकार

इलाज से बेहतर है रोकथाम

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धूल दब गई है और कुछ हद तक शांति कायम हो गई है। दिल्ली को फतह कर अन्ना हजारे अपने गांव लौट गए हैं। अगले तूफान से पहले उन्हें अपनी बढ़त को और मजबूत करना चाहिए। वह अपने सहयोगियों के साथ मंथन कर रहे हैं ताकि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक परिणामोन्मुख, दीर्घकालीन एजेंडे को आगे बढ़ा सकें। इस बीच, मैं टीम अन्ना को भ्रष्टाचार के कुछ प्राथमिक घटकों से अवगत कराना चाहता हूं। यह देखना अहम है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कौन से कदम कारगर साबित हो सकते हैं और कौन से नहीं। यह एक तरह से भ्रष्टाचार से लड़ने की नियमावली है। मजबूत लोकपाल अच्छा विचार है, किंतु यह प्रभावी होना चाहिए। लोकपाल तभी सफल हो सकता है जब यह कुछ चुनिंदा मामलों को ही हाथ में ले। इसे अपना ध्यान बड़ी मछलियों पर केंद्रित करना चाहिए और छोटी मछलियां लोकायुक्त, सतर्कता आयुक्त और अन्य एजेंसियों के जिम्मे छोड़ देनी चाहिए।

पंथनिरपेक्ष समाज का हो सृजन

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मैं जन्म से हिंदू हूं और आम मध्यवर्गीय माहौल में पला-बढ़ा। मैं अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ा। मेरे दादा-दादी आर्यसमाज से जुड़े थे। हालांकि मेरे पिता ने दूसरा रास्ता अपनाया। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान वह एक गुरु के प्रभाव में आ गए जिन्होंने ध्यान के माध्यम से भगवान से सीधे साक्षात्कार की संभावना के बारे में बताया। गुरु एक राधास्वामी संत थे, जो कबीर, नानक, मीराबाई, बुल्ले शाह और भक्ति व सूफी संप्रदाय के अन्य संत-कवियों की रचनाएं उद्द्धृत किया करते थे।

प्रशासनिक सुधारों की है आवश्यकता

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अन्ना हजारे ने देश के लिए एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है, लेकिन असल चुनौती अब शुरू होती है। तेरह दिनों के अनशन के बाद उन्होंने सरकार को तो अपनी अधिकतर मांगों के समक्ष झुकने को विवश कर दिया, लेकिन यदि अब वे अपनी राष्ट्रचेता की भूमिका में बरकरार रहना चाहते हैं, तो उन्हें फूंक-फूंककर कदम रखने होंगे।

लोकपाल बिल ने देश की उम्मीदें जगा दी हैं, लेकिन मुझे लगता है कि बड़े पैमाने पर प्रशासनिक सुधारों के बिना लोकपाल बेअसर ही साबित होगा। टीम अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का अगला एजेंडा यही होना चाहिए।