बाघों की सुरक्षा

उत्तराखंड के विश्व स्तरीय कार्बेट पार्क पर एक बार फिर शिकारियों की शिकंजा कसता जा रहा है। पिछले दस महीनों में बाघों के शिकार की घटनाएं निरंतर अंतराल पर सामने आई हैं। इतना नहीं नहीं, बल्कि बाघों की अन्य कारणों से मौत का सिलसिला भी जारी है। इस वर्ष अभी तक दस बाघों की मौत हो चुकी है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर वन विभाग समेत बाघों के संरक्षण में जुटी अन्य एजेंसियों की योजनाएं कारगर साबित क्यों नहीं हो रही हैं।

कार्बेट पार्क की यूपी व उत्तराखंड से लगी सीमा पर हाल ही में बाघों के शिकार के मामले सामने आए हैं। यह भी साफ हो गया है कि यह क्षेत्र बाघों के शिकार के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील हो गया है। यूं तो समय-समय पर उत्तर प्रदेश वन विभाग व उत्तराखंड वन विभाग के बीच अधिकारियों की बैठक में सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। इसके बावजूद हालात नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं। यदि कार्बेट पार्क जैसे संरक्षित क्षेत्र में ही बाघ सुरक्षित नहीं हैं तो फिर अन्य आरक्षित वन क्षेत्रों की स्थिति को समझा जा सकता है। जाहिर है बाघों का शिकार अथवा उनकी असमय मौत चिंता का विषय है। वन विभाग के अधिकारी इस चिंता को प्रदर्शित भी करते हैं, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात रहते हैं। हर बार बाघ के मारे जाने पर जांच कराई जाती है, कुछ लोगों के खिलाफ वन्यजीव अधिनियम में मुकदमे दर्ज किए जाते हैं। जांच के नतीजे और उनके सापेक्ष कार्यवाही हर बार यक्ष प्रश्न ही बना रहता है। स्थिति यह है कि बाघों के मारे जाने की जांच जिन अफसरों को सौंपी गई है, उनमें से अधिकतर के स्थानांतरण हो चुके हैं। ऐसे में जांच रिपोर्ट की केवल औपचारिकता ही पूरी हो रही है। दरअसल, बाघों के संरक्षण व राष्ट्रीय पार्को की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारी व जवाबदेही का अभाव है। कहने को तो वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए अनेक एजेंसियां काम कर रही है, लेकिन धरातल पर स्थिति क्या है, इसका अंदाजा लगातार हो रही बाघों की मौत से लगाया जा सकता है।

 

साभारः दैनिक जागरण

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