सोची समझी रणनीति का परिणाम है रेत का अवैध खनन

भवन निर्माण कार्य के लिए रेत एक जरूरी अव्यव है। कंक्रीट के निर्माण के लिए रेत, गिट्टी और सीमेंट की आवश्यकता पड़ती है। देश में रेत खनन के लिए लाइसेंस और पर्यावरण के नाम पर तैयार किए गए बॉटलनेक के कारण वैध तरीके से काम करना अत्यंत कठिन हो गया है। जिसका पूरा फायदा रेत माफिया उठाते हैं और देश भर रे रीवर बेल्ट में अवैध व मनमाने तरीके से खनन करते हैं। 
 
रेत वर्षा जल को रीवर बेड्स में रोक कर रखने में मदद करते हैं। जरूरत से ज्यादा खनन से इस प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ता है। आदर्श स्थिति में खनन पर्यावरण के हितों को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए, किंतु केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण के नाम पर रेत के निष्कर्षण के नियम को इतना मुश्किल बना दिया गया है कि वैध तरीके से ऐसा करना अत्यंत मुश्किल हो गया है। बाकी कसर नौकरशाही ने पूरा कर दिया है। फलस्वरुप भवन निर्माण के लिए रेत की कृत्रिम कमी पैदा हो गई है। इस कृत्रिम कमी ने रेत की कीमतों में भारी उछाल पैदा कर दी है जिससे रेत माफिया को इस कार्य में जबरदस्त फायदा दिखने लगा है।  
 
वैध माइनिंग लाइसेंस जारी करने के काम को नेताओं और अधिकारियों द्वारा जानबूझकर कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है, जिससे कीमतें और अधिक बढ़ जाती हैं और उसी अनुपात में लाभ कमाने के मौके भी। एक गैरसरकारी रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कुछ समय पूर्व तक रेत, रोड़ी और बोल्डर के खनन के लिए प्रतिवर्ष 2800-3000 लीज आवंटित किए जाते थे जो पिछले वर्ष तक घटकर 1900 तक रह गए हैं। बताया जाता है कि वर्ष 2013 तक प्रतापगढ़, जौनपुर, वाराणसी और बिजनौर इलाके में एक भी वैध खानें नहीं रह गई थीं। सारे पुराने लीज समाप्त हो गए थे और नए लीज जारी नहीं किए गए थे। अन्य राज्यों की स्थिति भी कमोवेश कुछ ऐसी ही है। ऐसी स्थिति में रेत की कृत्रिम कमी रेत माफिया को जन्म देती है जो व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाते हुए अथवा उन्हें साथ लेकर अवैध खनन कार्य को करते हैं। गैरसरकारी संगठनों की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेत के बड़े खनन क्षेत्रों में खनन संबंधी विस्तृत दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं, लेकिन छोटे खनन क्षेत्रों के बाबत फैसला लेने की जिम्मेदारी राज्यों पर छोड़ दी है। दुर्गाशक्ति नागपाल के साथ हुई घटना के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल द्वारा पर्यावरण एवं वन मंत्रालय अथवा स्टेट एन्वायरमेंट इंपैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी की अनुमति के बगैर इन छोटे खनन क्षेत्रों पर भी बैन लगा दिया गया। 
 
बाहर से देखने पर यह अच्छे नियत से प्रेरित कदम प्रतीत होता है, किंतु अवांछनीय तरीके से रेत की पैदा हुई कमी ने खनन के कार्य को और ज्यादा मुनाफा कमाने वाला बना दिया। स्टॉक मार्केट में सीमेंट की कीमतें गिर गई। अर्थव्यवस्था में और मंदी आ जाती यदि अवैध खनन राहत प्रदान नहीं करता। दुर्भाग्य की बात है कि आर्थिक विकास की घटती दौर के बीच निर्माण कार्य के लिए हमारे पास रेत नहीं हैं। निर्माण क्षेत्र में चीन की बराबरी के लिए हमें मौजूदा मात्रा से 10 गुना ज्यादा रेत चाहिए। विगत 5 साल में निर्माण क्षेत्र में 2 करोड़ नए रोजगार पैदा हुए हैं जबकि कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र में गिरावट दर्ज हुई है। ऐसी ही समस्या कोयला और लौह अयस्क के अथाह भंडार के साथ भी है। देश के भीतर इतने बड़े पैमाने पर मौजूदगी के बावजूद हमें विदेश से आयात को मजबूर होना पड़ता है। ऐसी ही स्थिति अब रेत के साथ भी पैदा हो सकती है। 
 
 
- अविनाश चंद्र
संपादक, आजादी.मी