सरकार को नागरिकों पर भरोसा क्यों नहीं?

कुछ दिनों पहले खबर थी कि केंद्र सरकार ने बजट में 2.80 लाख कर्मचारियों की भर्ती का प्रावधान किया है। यह प्रधानमंत्री के इस वादे के खिलाफ है कि उनके नेतृत्व में कम सरकार, अधिक शासन मूल मंत्र रहेगा। मैंने भोलेपन में इसका यह अर्थ लगाया कि यह मेरी, आपकी और आम नागरिकों की जिंदगी को अधिक आसान बना देगा, जो नियमों की भूल-भुलैया में से राह निकालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पिछले दशकों में अधिकांश भारत को चलाने वाली सुस्त और विशाल नौकरशाही में पर्किंसन्स लॉ (नौकरशाही की अनियंत्रित वृद्धि) के साथ नियम-कानून भी खरगोशों की तरह तेजी से बढ़ते चले गए।

मुझे तो वाकई उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी उलटा ही करेंगे। अपने चुनाव अभियानों में उन्होंने साबित कर दिया है कि किसी भी हालत में जीतने के लिए प्रतिबद्ध पेशेवरों की छोटी-सी टीम से बढ़कर कोई इतना अच्छा काम नहीं कर सकता। भारत का कोई भी व्यक्ति बड़ी खुशी से उन्हें बता सकता है कि रोज की जिंदगी में हमारी सबसे बड़ी परेशानी उन अधिकारियों की बहुत बड़ी संख्या है, जिनसे हमें हर चीज के लिए जूझना पड़ता है। इससे देरी होती है, जिससे भ्रष्टाचार जन्म लेता है। भ्रष्टाचार से ही हताशा और गुस्सा पैदा होता है। इस गुस्से से राष्ट्र की आत्मा का क्षय होता है। ज्यादातर भारतीयों के लिए व्यवस्था से लड़ने का मतलब है उस अड़ियल जूनियर अधिकारी से निपटना जो सरकार का चेहरा है। जो भी कारण हो लेकिन, वह दिए हुए काम में रुचि ही नहीं रखता और मदद करने से इनकार कर देता है। सरकारी काम में वह शाश्वत अड़ंगा है।

लेकिन रिपोर्ट ने जो कहा था वह और भी विचलित करने वाला है। सबसे ज्यादा नई भर्ती तो पुलिस, आयकर, कस्टम और एक्साइज विभागों में होगी। भर्ती वहां नहीं हो रही है, जहां मौलिक विचार जन्म लेते हैं, जो हमारी मौजूदा व्यवस्था को सरल बनाते हैं, सरकार के काम में सुधार लाते हैं बल्कि यह उन विभागों में हो रही है, जो कानून लागू करते हैं और हम पर निगरानी रखते हैं। आप शायद यह सोचकर चकरा जाएं कि ऐसे देश में स्वास्थ और शिक्षा विभागों में ज्यादा लोगों की जरूरत क्यों नहीं है, जहां आबादी बढ़ती जाती है और सुविधाए हमेशा जरूरत के मुताबिक नहीं होतीं। आप शायद सोचें कि हम वैज्ञानिक या अंतरिक्ष शोध अथवा ऐसी उभरती टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भर्ती क्यों नहीं करते, जिनका उपयोग हमारे शासन की गुणवत्ता सुधारने में किया जा सकता है। कारण सरल-सा है। अब तक जितनी भी सरकारें हुई हैं वे सब गलत काम करने वालों को पकड़ने में व्यस्त रही हैं। उन्होंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि लोग गलत काम करते ही क्यों हैं?

आमतौर पर कारण यह होता है कि सरकार प्राय: ऐसे निर्णय ले लेती है, जो अपने आप में गलत होते हैं। रोज की जिंदगी में इसके कई उदाहरण हैं। फिर भी सरकार ऐसे कानून बनाने पर जोर देती है, जिनके बारे में वह जानती है कि वे तोड़े जाएंगे। आसान-सा उदाहरण है शराबबंदी। इसके सामाजिक व नैतिक लाभ चाहे जो हों, हम सब जानते हैं कि ऐसे कानून केवल उन्हें लागू करने वालों को ही धनी बनाते हैं। आज की जनरेशन शायद नहीं जानती हो लेकिन, बरसों तक विदेशी सामान के भारत में प्रवेश पर रोक थी। नहीं, इससे कोई हम अधिक राष्ट्रवादी नहीं हो गए। इससे सिर्फ तस्कर रईस हो गए। बदले में वे राजनीतिक व्यवस्था को पैसा देते यह सुनिश्चित करने के लिए की कानून बना रहे और वे पैसा कमाते रहें। सौभाग्य से वैश्वीकरण ने उस कथा और तस्करी का अंत कर दिया।

जाहिर सा निष्कर्ष है : जितना आप नियम-कानून बनाएंगे, उतना आप अपराध को प्रोत्साहित करेंगे। बहुत समय पहले की बात नहीं है कि किसी जश्न पर धनी व्यक्ति को 97.75 फीसदी आयकर चुकाना पड़ता था। अपना हाथ दिल पर रखकर मुझे बताइए, क्या आप वाकई उन लोगों को दोष दे सकते हैं, जो उस मूर्खतापूर्ण कानून से बचने के लिए अपनी आमदनी छिपाते हैं या उसे अवैध रूप से देश से बाहर ले जाते हैं। जब आपके कानून तर्कसंगत हो तो नागरिक उनका पालन करते हैं। अन्यथा हर कोई उससे बचने की गली खोज लेता है। आप जीएएआर ले आइए। आप कानून को कड़ा और कड़ा करते जाएं लेकिन, उससे लोगों को रास्ता खोजकर बच निकलने से नहीं रोका जा सकता। जब करारोपण चोट पहुंचाने लगता है तो अरबपति दूसरे देश चले जाते हैं। बिज़नेस व उद्योग-धंधे यही करते हैं।

बेहतर होगा कि ऐसे सरल और अधिक तर्कसंगत कानून बनाए जाएं कि लोग उनका पालन करना चाहें। यह कर चोरों का राष्ट्र नहीं हैं। हम कभी थे भी नहीं। हमारी समस्याएं तब शुरू हुई जब हमारे कानून निर्माता लालची हो गए। जब आप खेती को कर दायरे से बाहर रखें और लाखों लोग बेरोजगार अथवा अपर्याप्त रोजगार में हो तो यह कहना विवेकसंगत नहीं है कि केवल 2 फीसदी भारतीय टैक्स देते हैं। असली संख्या एकत्र करें और उसमें से टैक्स न देने लायक कम उम्र और वृद्धों की संख्या निकाल दें। फिर रोजगार के वास्तविक आंकड़ों से मिलान करें तो आपको अहसास होगा कि आंकड़ें उतने खराब भी नहीं हैं। समस्या यह है कि हमें ऐसे आंकड़ें पसंद हैं, जो हमें पतनशील दिखाते हैं। हमें हमारे पर ही भरोसा नहीं है। सबसे खराब बात तो यह है कि हमारी पूरी व्यवस्था इसी धारणा पर काम करती है कि हम सब गलत काम करने वाले हैं, जब तक कि इसके विपरीत तथ्य सिद्ध न हो जाए। यहीं पर मोदी वास्तविक बदलाव ला सकते हैं, सरकार की मानसिकता में बदलाव लाकर।

यदि आप मुझे पूछें तो अपने करीब तीन वर्षों में मोदी ने सबसे महत्वपूर्ण बात यही की है कि उन्होंने भारत को बेहतरी के लिए बदलने की हमारी क्षमता में हमारा भरोसा बहाल किया है। अचानक नोटबंदी के बाद लाखों लोग अपने ही बैंक खाते से पैसा निकालने के लिए धैर्यपूर्वक लाइन में लगे रहे। वे नाखुश थे, कुंठित थे। यह वाकई इस तथ्य की पुष्टि है कि हमारे नागरिक कितने कानून का पालन करने वाले हैं।

मेरा मानना है कि कानून लागू करने वाले विभागों में लाखों लोगों को भर्ती करने की बजाय थोड़ी-सी वास्तविकता और थोड़ा-सा भरोसा काफी बेहतर नतीजे दे सकता है। यदि सरकार अपने नागरिकों के बारे में अच्छी राय रखती है तो नागरिक भी अपने बारे में अच्छा सोचेंगे। और यही एकमात्र रास्ता है, जिससे कोई राष्ट्र खुद को रूपांतरित कर सकता है।

 

- प्रीतीश नंदी, वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्मकार
साभारः भास्कर.कॉम

http://www.bhaskar.com/news/ABH-bhaskar-editorial-by-pritish-nandi-news-...

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