सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

अधिक जानकारी के लिये देखें : http://ccs.in/governance.asp

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- वन कानून में बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका

- याचिका में ट्रांजिट पास परमिट व्यवस्था खत्म करने की भी लगाई गई है गुहार

बहुत पुरानी बात है। गंगा तट पर बसी काशी नगरी को तब भी व्यापार, कला और कारीगरी के क्षेत्र में उत्कृष्ट मुकाम हासिल था। नगर से थोड़ी दूरी पर जुलाहों का एक दल निवास करता था। जुलाहों का मुख्य पेशा बांस की टोकरी आदि बनाना था। आमतौर पर उनके मकान कच्चे थे और बांस, मिट्टी और खपरैल आदि के ही बने थे। उनमें से सिर्फ दो-एक मकान ऐसे थे जो पक्के थे। इन पक्के मकानों में से एक मकान वृद्ध रामदीन का था। दरअसल, रामदीन अन्य जुलाहों की तरह बांस की टोकरी इत्यादि बनाने के स्थान पर रेशम के वस्त्र बनाया करता था। उसके बनाए हुए वस्त्रों की एक अलग खासियत थी। वस्त्र सदैव

शिक्षा का अधिकार क़ानून-२००९ लागू होने के बाद यह उम्मीद जताई गयी कि यह क़ानून प्राथमिक स्तर पर देश के गरीब से गरीब बच्चे की शिक्षा को सुनिश्चित करेगा। लेकिन अपने पेंचीदा प्रावधानों की वजह से आज यह क़ानून ही सवालों के घेरे में खड़ा हो गया है। इससे पहले की हम शिक्षा के अधिकार क़ानून की खामियों पर बात करें, हमे इस बात पर गौर करना होगा कि कोई भी क़ानून लाने का उद्देश्य क्या होता है?

ग्रामीण भारत में जल और जंगल दो सबसे ज्यादा मूल्यवान संसाधन हैं। लेकिन ये संसाधन इन इलाकों में रहने वाले लोगों के हाथ में नहीं हैं। ये राज्य के हाथ में हैं और राज्य ही इनका प्रबंधन करता है। जल और जंगल ग्रामीण समुदायों की बजाए देश की संपत्ति है। ये राष्ट्रीयकृत संसाधन हैं। इस राष्ट्रीयकरण ने ग्रामीणों को उनके बहुमूल्य आर्थिक संसाधन से वंचित कर दिया है। यह एक ऐतिहासिक अन्याय है। 
 

- बदले माहौल में सरकार को अंपायर की भूमिका में होना जरूरी मान रहे हैं केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा

कैबिनेट द्वारा अनुमोदित बाल मजदूरी पर प्रस्तावित अधिनियम को मीडिया बाल मजदूरी को बदावा देने वाला एक पिछडा कदम बता रही है। वास्तव में, यह अधिनियम बाल मजदूरी को लगभग पूरी तरह से प्रतिबंधित  करता है।