सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

अधिक जानकारी के लिये देखें : http://ccs.in/governance.asp

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देश में बढ़ते कालेधन (ब्लैक मनी), आतंकवादियों की फंडिंग और जाली करेंसी की समस्या के समाधान के लिए मोदी सरकार ने बीते 8 नवंबर 2016 की रात से 500 और 1000 रूपए के पुराने नोटों को बंद करने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के बाद से काले धन का मुद्दा लोकसभा चुनावों के बाद एक बार फिर से चर्चा का केंद्र बन गया है। तमाम विशेषज्ञ इसे कालेधन पर रोक लगाने के क्षेत्र में मोदी सरकार द्वारा उठाया गया मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं वहीं कुछ लोग इसके कारगर साबित होने पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर रहे हैं।
लेकिन हमें यह समझना होगा कि धन अंततः धन होता है। यह काला और सफेद

यद्यपि सन् 1991 से भारत में आर्थिक सुधारों की शुभारंभ और मुक्त बाजार के साथ भारतीयों के प्रेम प्रसंग को शुरू हुए दो दशक बीत चुके हैं, इसके बावजूद पूंजीवाद को भारत में अपना मुकाम पाने के लिए अबतक जद्दोजहद करना पड़ रहा है। अधिकांश लोगों की भांति भारतीय भी मानते हैं कि बाजार फलदायक तो है लेकिन नैतिक नहीं है। लेकिन मेरी राय इसके बिल्कुल उलट है। मेरा मानना है कि इंसान अनैतिक होता है और लोकतंत्र के तहत या राजतंत्र के तहत, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा पूंजीवादी समाज बुरा व्यवहार वही करता है। बाजार नामक संस्था अपने आप में अत्यंत नैतिक होती है, और

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भारत में बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाने वाले दीपावली के त्यौहार को मनाने के मुख्यतः दो कारण हैं। पहला कारण, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लंकापति रावण का संहार कर अयोध्या के राजा राम, भाई लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ अपने राज्य वापस लौटे थे। पुष्पक विमान से रात के अंधेरे में अयोध्या पहुंचे राम के स्वागत के लिए अयोध्यावासियों ने घर के बाहर दिए जलाए और रौशनी कर विमान को यथास्थान उतरने की राह दिखाई। कालांतर में यह उस घटना को याद करने और खुशी मनाने की परंपरा के तौर पर प्रचलित हुआ। दूसरा कारण, धन, सुख और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा अर्चना कर

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक सिंद्धांतों में 6 से 14 साल के सभी बच्चों के निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। किंतु अर्थाभाव और राजनीततिक उदासीनता के चलते इन सिद्धांतों पर अमल नहीं हो पाया। माननीय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया पर अंततः 2009 में माननीय डा. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम को लागू किया और 2010 में इसकी अधिसूचना जारी कर दी गई। हालांकि आरटीई एक्ट में कई त्रुटियां थीं और इस कानून का मकसद पूरा नहीं हो पाया।

आज देश में शिक्षा की दुर्दशा को लेकर दबी जुबान में बोलने का कोई फायदा नहीं है। दरअसल हालात बहुत बिगड़ गए हैं। दो टूक में कहें तो इसके लिए जिम्मेदार हैं स्कूल और शिक्षक जिनमें जिम्मेदारी का सर्वथा अभाव रहा है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था पर छिटपुट प्रहार करने से काम नहीं बनेगा। लेकिन भारत में शिक्षा माफिया और इनकी लॉबी इतनी मजबूत है कि इसे आड़े हाथों लेना बहुत कठिन है और नई शिक्षा नीति (एनईपी) के कर्णधार यह बखूबी जानते हैं और इससे इनकार भी नहीं कर सकते। ऐसे में शिक्षा क्षेत्र में जिम्मेदारी को लेकर जो आमूल परिवर्तन जरूरी हैउसके विरोध में मौजूदा

डेनमार्क की पहचान आमतौर पर यूरोप के खूबसूरत देश के तौर पर हैं लेकिन यहां की एक खासियत एक और है जिसे कम ही लोग जानते हैं। यहां दुनिया में सबसे तेजी से अदालती कार्रवाई पूरी होती है। डेनमार्क ही नहीं उसके पड़ोसी देश नॉर्वे और फिनलैंड की गिनती भी ऐसे ही देशों में होती है जहां तेजी से मुकदमों का निपटारा होता है।

फोर्ब्स की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया का सबसे बेहतरीन न्यायिक सिस्टम डेनमार्क का है जहां एक समय सीमा में केसों का निपटारा कर दिया जाता है। दूसरा नंबर नॉर्वे का है। नॉर्वे की

एक अप्रैल 2010 को ‘शिक्षा का अधिकार’ क़ानून 86वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि छह वर्ष से चौदह वर्ष तक के बच्चों की मुफ्त शिक्षा को सुनिश्चित किया जाये। इस क़ानून से शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की भी जवाबदेही तय हो गयी।

प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि सबको शिक्षा मुहैया कराने की दिशा में यह क़ानून परिवर्तनकारी साबित होगा। लेकिन आज शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू होने के छह साल बाद जब इसके

पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों ने प्रकृति और संस्कृति, कला और जीवन, सामरिक ललक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक शांति, जैव एवं सांस्कृतिक विविधता के बीच एक बेमिसाल तालमेल स्थापित किया है और इसे संरक्षित भी किया है। इन लोगों ने इस संतुलन की खूबी को संगीत, कला, स्थापत्य, अपनी सोच और ज्ञान प्रणाली, जीवन के आधारभूत रीति रिवाज से लेकर अपने कार्यों, मौसम और प्रकृति में संजोये रखा है।

पूर्वोत्तर अपनी भौगोलीय और पर्यावरणीय विविधता के कारण अलौकिक सुंदरता वाला क्षेत्र है। चारों तरफ हरे भरे जंगल,

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