सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

अधिक जानकारी के लिये देखें : http://ccs.in/governance.asp

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न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ और लम्बित मामलों की तुलना में जजों की संख्या में भारी कमी का हवाला देते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर पिछले दिनों एक कार्यक्रम में भावुक हो गये। उस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उपस्थित थे। एक खबर के मुताबिक़ भावुक होते हुए न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा कि निचली अदालतों में 3 करोड मामले लंबित हैं। मात्र बीस हजार जजों के कंधों पर दो करोंड़ मामलों की सुनवाई का दबाव है। लाखों लोग इसलिए जेलों में हैं क्योंकि जज उनके मामले ही नहीं सुन पा रहे हैं, लेकिन इसके लिए जजों को दोष न दीज

गत दिनों दिल्ली सरकार के नीतिगत फैसलों में परस्पर विरोधाभाष पैदा करतीं दो ख़बरें मीडिया में आईं। बीस अप्रैल को मीडिया में एक खबर आई कि ऑड-इवन के दौरान निजी टैक्सी कम्पनियों द्वारा सर्ज-प्राइसिंग अर्थात मांग और आपूर्ति के आधार पर कैब कम्पनियों द्वारा किराया तय किये जाने को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बहुत नाराज हैं। मुख्यमंत्री द्वारा इसे खुली लूट बताते हुए इसपर हमेशा के लिए प्रतिबन्ध लगाने की भी बात ख़बरों के माध्यम से सामने आई। इस खबर के ठीक दो दिन बाद एक दूसरी खबर यह आई कि दिल्ली सरकार ऐप आधारित प्रीमियम बस सेवा शुरू करने वाली है। दिल्ली सरकार

लातूर मे आज पानी की स्थिति इतनी भयानक है कि ट्रेन मे पानी भरकर उनकी प्यास बुझाई जा रही है। देश के कम से कम 9-10 राज्य अभूतपूर्व जल संकट से झूझ रहे हैं। मुंबई हाईकोर्ट पहले ही आईपीएल मैच जल संकट के कारण कहीं ओर कराने का आदेश दे चुका है। सूप्रीम कोर्ट भी इससे पहले केंद्र को पानी के मामले मे फटकार लगा चुका है। बुंदेलखंड और उसके आसपास के इलाकों से लोगो का पलायन जारी है। भारत की राजधानी दिल्ली भी इससे अछूती नहीं है। अभी कुछ दिनों पहले ही जाट आरक्षण के मुद्दे पर गरमाई राजनीति में जब दिल्ली का पानी बंद कर दिया गया तब सारी दिल्ली त्राहिमाम कर उठी। पं

मुक्त व्यापार ने अपना प्रभाव ब्रिटिश कालीन भारत में भी छोड़ा। अंग्रेजों ने प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने से पूर्व तक, सन 1914 तक, मुक्त बाजार-अर्थव्यवस्था को संचालित किया। सन 1914 में भारत, ब्रिटिश कपड़े की अपेक्षा, ब्रिटिश कपड़ा बनाने वाली मशीनों का सबसे बड़ा आयातक देश था। इस प्रकार भारत इंग्लैंड से आयातित मशीनों से उत्पादन कर कपड़े का बड़ा निर्माता बन रहा था।

- सेंटर फॉर सिविल सोसायटी ने महाराष्ट्र में तीन वर्षों तक चलाया 'स्किल वाउचर' पायलट प्रोजेक्ट
- कैरियर मेले का आयोजन कर 2000 युवाओं के कौशल विकास में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
- 3-4 माह के प्रशिक्षण के बाद युवाओं को अमेजन व एचडीएफसी बैंक सहित तमाम राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों में मिली नौकरी

आज से ठीक पांच साल पहले १ अप्रैल २०१० को 'शिक्षा का अधिकार' क़ानून ८६वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की गारंटी दी जाय। इस क़ानून के लागू होने के बाद शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की यह जवाबदेही तय हो गयी कि वो 6 से 14 साल के प्रत्येक बच्चे की शिक्षा सुनिश्चित कर सके। प्रथम दृष्टया जब इस  कानून और  इसके उद्देश्यों को देखते हैं तो बेहद आदर्श स्थिति नजर आती है। ऐसा लगता है कि सबको शिक्षा मुहैया कराने

वक्त के साथ-साथ तौर-तरीके बदलते हैं, जरूरते बदलती हैं और उन्हीं के मुताबिक कानून-कायदे भी। वक्त की वजह से पीछे छूट जाने वाले अतीत अथवा संग्रहालय का हिस्सा हो जाते हैं। उनके बारे में जानना व देखना अच्छा लगता है, लेकिन ऐसे पुरातन कानून जिनका अब मतलब नहीं रह गया है, फिर भी वे वजूद में हैं। उनके बारे में आप क्या कहेंगे?

किसी भी शब्द को लेकर समाज में एक ख़ास किस्म की सकारात्मक अथवा नकारात्मक अवधारणा का बन जाना कोई नई बात नही है. 'बाजार' अर्थात 'मार्केट' शब्द  भी इससे अछूता  नही  है। आमतौर  पर  यदि  आप  किसी भी व्यक्ति से  एक सवाल पूछें कि क्या देश में  बाजार के लिए आजाद एवं उदार माहौल होना चाहिए ? अथवा क्या बाजार पर बंदिशों की बजाय छूट का माहौल ज्यादा होना ठीक है ? आपको बहुतायत में जो जवाब मिलेगा वो 'नही' में होगा।

मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के आलोचक कहते हैं कि यह नितांत अनैतिक है क्योंकि यह लालच पर आधारित है। लालच- लाभ कमाने का भद्दा प्रेरक। क्या यह आलोचना वैध है? इस क्यों को समझना जरूरी है क्योंकि जन नैतिकता समाजवाद के कहीं बहुत नीचे दब गयी है। प्रतिदिन घोटाले होते हैं। चोरों (नेताओं) को आर्थिक स्वतंत्रता को अनैतिक कहने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।

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