सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

अधिक जानकारी के लिये देखें : http://ccs.in/governance.asp

इस पेज पर विभिन्न लेखकों के गवर्नेंस पर लिखे गये लेख दिये गये हैं। पुरा लेख पढ़ने के लिये उसके शीर्षक पर क्लिक करें। आप लेख पर अपनी टिप्पणीयां भी भेज सकते हैं।

भारत को ऐसे थिंक टैंकों की जरूरत है, जो असरकारी, कम खर्चीले और टिकाऊ नीतिगत समाधानों की खोज कर सके. -पार्थ जे शाह

जन कल्याण परियोजनाओं के मस्टर रोल के साथ काफी छेड़-छाड़ होता रहा है। कई बार अधिकतर ऐसे लोग जिनका मस्टर रोल में नाम होता है, वे वास्तव में काम पर मौजूद नहीं होते हैं और वास्तव में काम करने वाले कई लोगों का नाम मस्टर रोल में नहीं होता है। राजस्थान में अरुणा राय और उनके संगठन एमकेएसएस (मजदूर किसान शक्ति संगठन) ने इस मुद्दे पर काम करना शुरू किया। उनके कार्यकर्ता विभिन्न कार्यों के सरकारी मस्टर रोल की कॉपी लेते

निजी संपत्ति अधिकार एक व्यक्ति का वो अधिकार है जिससे वह जैसे भी चाहे अपनी संपत्ति का इस्तेमाल कर सकता है, बशर्ते वह दूसरे व्यक्ति के खिलाफ धोखाधड़ी या बल का प्रयोग न करे। संपत्ति अधिकार के महत्व पर जोर देने वाले पहले अर्थशास्त्री आस्ट्रिया के कार्ल मैगर थे। 1971 में एक लेख में मैगर ने यह कहा कि अधिकतर सामान की उपलब्ध मात्रा प्रत्येक व्यक्ति की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है। संभावित रूप से एक उपभोक्ता की रुचि दूसरे प्रत्येक उपभोक्ता से अपर्याप्त सामानों को प्राप्त करने के लिए किए जाने वाले संघर्ष में भिन्न होती है:

मुक्त बाजार लोक प्रशासन का उदाहरण: कूडा करकट की सफाई का काम।

समाजवादी इस काम को बडे ब्यूरो के माध्यम से करते हैं। वे हजारों झाडू लगाने वालों को बहाल करते हैं, सैकडों ट्रक और झाडू खरीदते हैं। यदि हम उनके ब्यूरो प्रमुख के कार्यों का परीक्षण करें तो देखते हैं कि ब्यूरो का अधिकतर समय इस कार्य की प्रक्रिया को पूरा करने में खर्च होता है, जैसे: ट्रक और झाडू की खरीदारी, भर्ती, अनुशासन, छुट्टियां, यूनियन एवं अन्य इसी तरह के कार्य। ब्यूरो की इस पूरी प्रक्रिया का परिणाम क्या निकला, यह देखने का उनके पास समय नहीं

ओलिवर वेंडेल होम्स ने लिखा है कि कराधान वह मूल्य है जिसे हम अपनी सभ्यता के लिए चुकाते हैं। लेकिन इसे यदि इस तरह से व्यक्त किया जाए कि कराधान हम वास्तव में सभ्यता के अभाव के लिए चुकाते हैं तो ज्यादा उचित होगा। यदि लोग अपनी, अपने परिवार और अपने आस-पास रह रहे जरूरतमंद लोगों की बेहतर देखभाल स्वयं करने लगें तो सरकार खुद-ब-खुद पीछे हट

भारत के लोग स्मार्ट और सृजनात्मक होते हैं. उन्होंने यह साबित किया है कि वे परिश्रमी और मितव्ययी होते हैं. भारत की धरती को कई तरह की नेमतें मिली हुई हैं, जिनमें एक अच्छी जलवायु और ढेर सारे प्राकृतिक संसाधन शामिल हैं. इस देश का लोकतंत्र शानदार है जिसकी जड़ें बेहद मजबूत हैं और यहां का शासन कानून-सम्मत है. लेकिन अब सवाल यह है कि आज़ादी के 53 साल बाद भी भारत एक बेहद गरीब देश क्यों है?

    यूँ तो अपना मकान हर किसी का सपना होता है। पर अपना मकान होने तक का सफर अधिकतर लोगों को किराये के मकान में रह कर ही तय करना पड़ता है। ऐसे में हर किसी को एक सस्ते मकान की तलाश रहती है। पर आलम यह है कि दिल्ली ही नहीं किसी भी महानगर में आज मकान किराये की दर आसमान छू रही है। परिणाम यह होता है कि अपने मकान का सपना साकार करने का सफर कुछ और ज्यादा लंबा हो जाता है। पर हम लोग यह नहीं सोचते कि आखिर किराया इतना अधिक क्यों है? दूसरे कई सामान की कीमत जब लगातार घटती जा रही है। तो मकानों का किराया ही क्यों बढ़े? इलेक्ट्रॉनिक सामानों जैसे टीवी, फ्रिज, मोबाइल फोन

    कई दिनों से पश्चिम बंगाल का सिंगूर और नंदीग्राम राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में छाया रहा। सिंगूर में ममता अनशन पर बैठी रहीं, पर राज्य सरकार को ममता नहीं आई। लेकिन नंदीग्राम में बुद्धदेव जी ने अपनी भूल स्वीकार कर ही ली। वे मान रहे हैं कि वहाँ स्थानीय प्रशासन स्तर पर भारी भूल हुई है। वो भूल क्या थी, स्पष्ट नहीं किया गया। कुछ साफ पता चले तो उसके निहितार्थों पर विचार किया जा सकता है।
    जब देश के अन्य राज्य उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण का फायदा दोनों हाथों से बटोरने में लगे हैं, तो ऐसे में बुद्धदेव बाबू शायद यह सोच रहे

    उदारीकरण और निजीकरण का नुस्खा हवाई यात्रा क्षेत्र में थोड़ा सुधार लाने में तो जरूर सफल हुआ है, पर हवाई अड्डा के विकास के दौर में पीछे छूट जाने के कारण न सिर्फ यात्रियों को घोर असुविधाओं का सामना करना पड़ता है, बल्कि यह नागरिक उड्डयन क्षेत्र को भी तेजी से विकास करने से रोक रहा है। देश में हवाई अड्डे का प्रबंधन कितना खराब चल रहा है, उसे राजीव की बातें सुन कर अच्छी तरह समझा जा सकता है। पेश है यहाँ उनका अनुभव उन्हीं की जुबानी।
    ''चेन्नई में इतना बड़ा एयरपोर्ट है, पर फ्लाइट के बारे में बताने वाला कोई नहीं है। वहाँ करीब दस

Pages