सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

अधिक जानकारी के लिये देखें : http://ccs.in/governance.asp

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दिल्ली राज्य में गरीबो  को समाज सुधार योजनाओं का लाभ सिंगल विंडो के ज़रिये पहुचाने के लिए 'मिशन कन्वरजेंस' या सामाजिक सुविधा संगम एक अनूठा और लाभदायक प्रयोग है. इस मिशन का उद्देश्य समुदायों के करीब जा कर वितरण बिन्दुओं को खड़ा करना है ताकि गरीब जनता विभिन्न सामाजिक योजनाओं का फल आसानी से उठा सके. एक सोसाइटी की तरह रजिस्टर्ड सामाजिक सुविधा संगम राज्य के तमाम विभागों, NGOs और नोडल एजेंसिओं के लिए एक सुविधा केंद्र की तरह है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के मुख्य सचिव के नेतृत्व में चलने वाले सामाजिक सुविधा संगम का लक्ष्य है सामाजिक चेन के सबसे निचले व्यक्ति तक

तकरीबन 20 साल पहले जब मैं ग्यारहवीं या बारहवीं का छात्र था, मैंने शोलपुर में होने जा रही स्कूली बच्चों की राज्यस्तरीय शतरंज स्पर्धा के लिए पात्रता हासिल कर ली। मैं पुणे की टीम का हिस्सा था और इस स्कूल चैंपियनशिप में भारत के तकरीबन हर इलाके के स्कूली छात्र भाग लेते थे। हालांकि वह स्कूली चेस का पहला ही साल था। जब हमारी चार सदस्यीय टीम स्पर्धा से एक दिन पहले ही पहुंच गई, तो हमें एक बड़े हॉल में ले जाया गया। हमें बताया गया कि रात को हमें यहीं पर सोना है। वहां पहुंचे अन्य एथलीट और खिलाड़ी भी इसी हॉल में हमारे साथ सोने वाले थे। सामान्य परिस्थितियों में उस हॉल में 60

ताकत हासिल कर लेना एक बात है और उसका इस्तेमाल करना दूसरी। पिछले दिनों जब दिल्ली में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की भेंट हुई तो यह दो निराश नेताओं की भेंट थी। ओबामा जहां अमेरिका में मध्यावधि चुनावों में नाटकीय हार से हैरान थे, वहीं मनमोहन सिंह एक के बाद एक हो रहे घोटालों के खुलासों से परेशान थे।

लगता है ये दोनों नेता उस बुनियाद को भूल गए, जिस पर उनके देशों के लोकतंत्र का निर्माण हुआ। जिस तरह स्वतंत्रता के विचार के बिना अमेरिका की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी तरह धर्म के बिना भारत को

बिहार में नीतीश कुमार की लहर चली है। उन्हें इस बार जीत पांच साल पहले के विधानसभा चुनाव और पिछले साल के लोकसभा चुनाव से भी बड़ी मिली है। पिछले साल भी उनके नेतृत्व वाले एनडीए को 171 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी। मगर अब आंकड़ा उसके पार चला गया है।

बेशक, विजेता के जयगान की परंपरा के तहत अब बिहार के चुनाव नतीजों को नीतीश कुमार और उनके गठबंधन के दावों के नजरिए से देखा जाएगा। और इसे विकास की जीत बताया जाएगा। जीत इतनी बड़ी है कि इस वक्त इस दावे को चुनौती देने की हिम्मत शायद ही कोई दिखा सके। लेकिन इस दावे को चुनौती दिए जाने की जरूरत

हाल ही में अमेरिका के ओहायो प्रांत के गवर्नर स्ट्रीकलैंड ने नौकरियों के सृजन के लिए उन कंपनियों के लिए आउटसोर्स पर प्रतिबंध लगा दिया जिन्हें सरकारी फंड्स के जरिए मदद नहीं पहुंचाई जाती है। ओहायो के गवर्नर के इस फैसले का भारत में काफी विरोध हुआ। हालांकि इस हो हल्ले का कोई फायदा नहीं मिला। गौर करने वाली बात ये भी है कि अमेरिका और अमेरिकी राज्यों में हमारी देसी आईटी कंपनियों का निर्यात सीमित मात्रा में ही होता है।

हाल ही में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि वे अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान इस फैसले पर अमेरिकी प्रशासन

मशहूर लेखिका और बुकर प्राइज़ विजेता अरुंधती रॉय का हाल ही में श्रीनगर में कश्मीर के ऊपर दिया हुआ बयान काफी विवादस्पद साबित हुआ. नाराज़ लोगों नें उन्हें देशद्रोह के अपराध में दण्डित करने की पुरजोर वकालत की. अरुंधती का विवादों में पड़ना कोई नयी बात नहीं है. देश से जुडे कई संवेदनशील मुद्दों पर अपने क्रन्तिकारी विचारों को प्रगट कर वो पहले भी घेरे में आ चुकी हैं.

ताज़ा विवाद में उन्होंने श्रीनगर में आयोजित कश्मीर की आज़ादी सम्बन्धी एक सेमिनार में कहा कि "कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं रहा. ये एक

‘किलर लाइन’ के नाम से कुख्यात ब्लू लाइन बसों का दिल्ली की सड़कों से हटाया जाना एक संवेदनशील मुद्दा है जिस पर अलग अलग किस्म की राय व्यक्त की जा रही हैं. जहां कई यह मानते हैं कि सैंकड़ों जानें ले चुकी इन बसों का दिल्ली की सड़कों से चले जाना ही अच्छा है, एक ऐसा वर्ग ये भी समझता है कि तेज़ रफ़्तार और समय से चलने वाली ब्लू लाइन बसें दिल्ली की लाइफ लाइन थीं और उन का चला जाना एक नुकसान है.

पर यहाँ हमें सार्वजनिक नीति के दोषों के बारे में भी सोचना चाहिए जिन की वजह से शहर में पब्लिक यातायात इतना त्रुटिपूर्ण है.

यूरोप और अमेरिका में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या कम होती जा रही है, भारत में यह बढ़ रही है

किसी भी बात को जटिल बनाना सरकारों का पसंदीदा शगल होता है। लेकिन लीक से हटकर सोचा जाए तो मुश्किल समस्या भी आसान हो सकती है। भारत में बड़ी संख्या में होने वाली दुर्घटनाओं को ही ले लीजिए। ये आए दिन होती हैं, क्योंकि एक तो भारतीय सड़कों पर ऐसे वाहन दौड़ते रहते हैं जिनका स्टेयरिंग ऐसे अकुशल ड्राइवरों के हाथ में होता है, जिनको यूरोप और अमेरिका में कभी भी लाइसेंस मिल ही नहीं सकता। सुरक्षा को लेकर वहां के जागरूक समाज

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