सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

अधिक जानकारी के लिये देखें : http://ccs.in/governance.asp

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चिदंबरम की ओपन बजट की पहल कामयाब हुई है, अब क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भारत को धमका नहीं सकतीं

कभी बजट प्रस्तावों को टॉप सीक्रेट रखने का चलन था। वित्त मंत्री महीनों पहले से बजट मामलों पर चुप्पी साध लेते थे। लेकिन अब समय बदल गया है। आज बजट प्रस्ताव अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियां बन जाते हैं। देश के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम दुनियां भर के देशों के सामने बजट की बानगी पेश कर रहे हैं। पहले उन्होंने देश को बजट प्रस्तावों की झलक दिखाई। अब वह ग्लोबल मंच पर भारत के आगामी बजट की झलकियां दिखा रहे हैं।

चिदंबरम का कहना है कि

गरीबों की मदद के नाम पर अमीरों को सब्सिडी बांटने की अनोखी मिसाल बन गया था सस्ता डीजल

डीजल के दाम बढ़ाने के निर्णय के पीछे गहराता वित्तीय संकट दिखता है। अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने भारत की रेटिंग घटा दी है क्योंकि सरकार का वित्तीय घाटा बढ़ रहा है। इसका प्रमुख कारण पेट्रोलियम सब्सिडी का बढ़ता बिल है। टैक्स वसूली से सरकार की आय कम हो और खर्च ज्यादा हो तो अंतर की पूर्ति के लिए सरकार को ऋण लेने होते हैं। साथ-साथ ब्याज को बोझ बढ़ता है। ऐसे में हाइवे और मेट्रो जैसे उत्पादक खर्चों के लिए सरकार के पास रकम कम बचती है।

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स्कूल से सीधे घर जाएं और अगर कहीं दूसरी जगह जा रहे हैं तो अपने माता-पिता को बताकर जाएं। महिला सुरक्षा के मामले में लगातार फजीहत झेल रही दिल्ली पुलिस के नाम से ऐसी तमाम नसीहतें देने वाले होर्रि्डग व बैनर दिल्ली विश्वविद्यालय के अग्रणी कॉलेजों और अन्य शिक्षा संस्थानों के बाहर पिछले दिनों दिखाई दिए। इन पर दिल्ली पुलिस का ईमेल और फोन नंबर भी लिखे हैं। इन नसीहत भरे पोस्टरों पर लोगों के आपत्ति उठाने के बाद दिल्ली पुलिस ने पूरे मामले से पल्ला झाड़ लिया। पुलिस कह रही है कि वह बता नहीं सकती कि ये बैनर किसने लगाए हैं। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी जानकारी होने से इन्कार कर

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बर्बादी से बचाने के लिए इसे कई कॉरपोरेशनों में तोड़कर उनके शेयर जनता को बेच दिए जाने चाहिए

दस साल बाद आखिरकार रेलवे का किराया बढ़ाया गया। यह बात और है कि सवारी गाड़ियों पर आने वाले 25 हजार करोड़ रुपए के घाटे में से मात्र 6600 करोड़ रुपयों की भरपाई ही इस वृद्धि से हो पाएगी। सरकारें रेल किरायों पर इतनी ज्यादा सब्सिडी इतने लंबे समय से आखिर क्यों देती आ रही हैं? अन्य किसी भी सब्सिडी की तुलन में रेल सब्सिडी का औचित्य सबसे कम है। न तो रेलों का ज्यादा इस्तेमाल गरीबों द्वारा किया जाता है, न ही इन्हें किसी अर्थ में अपरिहार्य माना जा सकता

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देशवासी हर नेता को भ्रष्ट मानते हैं। ऐसे में उदास होने की जरूरत नहीं है। हमें भ्रष्ट नेताओं में सही नीतियां बनाने वाले को समर्थन देना चाहिए। यदि घूस लेने वाले और गलत नीतियां बनाने वाले के बीच चयन करना हो तो मैं घूस लेने वाले को पसंद करूंगा। कारण यह कि घूस में लिया गया पैसा अर्थव्यवस्था में वापस प्रचलन में आ जाता है, लेकिन गलत नीतियों का प्रभाव दूरगामी और गहरा होता है। ऐसे में देश की आत्मा मरती है और देश अंदर से कमजोर हो जाता है। आम तौर पर माना जाता है कि भ्रष्टाचार का आर्थिक विकास पर दुष्प्रभाव पड़ता है। मसलन भ्रष्टाचार के चलते सड़क कमजोर बनाई जाती है, जिससे वह जल्दी टूट

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किंगफिशर के मालिक की सारी संपत्ति जब्त करके इसके कर्मचारियों और कर्जदाताओं में बांट दी जानी चाहिए

विजय माल्या ने किंगफिशर के कर्मचारियों को कई महीनों से तनख्वाह नहीं दी है और कई सप्लायरों तथा कर्जदाताओं की करोड़ों की अदायगी के नाम पर हाथ खड़े कर दिए हैं। लेकिन इस घोषित तंगहाली के बावजूद उन्होंने तिरुपति मंदिर को तीन किलो सोना दान किया है, जिसकी कीमत एक करोड़ रूपया है। बीते अगस्त में उन्होंने कर्नाटक स्थित कुक्के सुब्रमण्य मंदिर में 80 किलो सोने के पत्तर चढ़े दरवाजों का चढ़ावा दिया था। शायद वे मानते हैं कि जिन तरीकों से

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दिल्ली के निजी व महंगे स्कूलों द्वारा अब पड़ोस के आर्थिक रूप से कमजोर व पिछड़ी जाति के छात्रों को निशुल्क दाखिला देने से इंकार करना संभव नहीं हो सकेगा। जी हां, पड़ोस के निजी स्कूलों में मुफ्त दाखिले की चाह रखने वाले गरीब व पिछड़ी जाति के छात्रों के अभिभावकों को अब पर्याप्त जानकारी के अभाव में भ्रमित करना और नियम और शर्तों का हवाला देते हुए स्कूल में भर्ती करने में आनाकानी बरतना महंगा साबित होने वाला है। दिल्ली सरकार व शिक्षा निदेशालय द्वारा पहले से ही अपनाए गए कड़े रुख के क्रम में अब दिल्ली नगर निगम ने भी आस्तीनें चढ़ा ली हैं। यहां तक कि एमसीडी ने अपने अधीन क्षेत्रों में

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देश में इन दिनों बेवजह बात का बतंगड़ बनाने की एक परंपरा सी चल पड़ी है। किसी भी सुझाव, विचार अथवा प्रस्ताव के अच्छे बुरे पहलुओं पर विचार किए बगैर ही बेवजह उस पर विवाद पैदा कर दिया जाता है। मजे की बात यह है कि इस परंपरा का निर्वहन, केवल सत्तापक्ष द्वारा विपक्ष और विपक्ष द्वारा सत्तापक्ष की खिंचाई के लिए ही नहीं बल्की अपने लोगों की भर्त्सना के दौरान भी बखूबी किया जा रहा है। केंद्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री शशि थरूर द्वारा एंटी-रेप लॉ के मद्देनजर एक दिन पूर्व दिए गए सुझाव के संदर्भ में भी इसी परंपरा का निर्वहन देखने को मिल रहा है। स्वयं थरूर की पार्टी कांग्रेस के लोग ही उनके

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