सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

अधिक जानकारी के लिये देखें : http://ccs.in/governance.asp

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निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से निर्मित शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई एक्ट 2009) आने और वर्ष 2010 से लागू होने के 7 वर्ष पूरे हो चुके हैं। लेकिन इतनी बड़ी समयावधि बीत जाने के बाद भी तमाम समस्याएं अब भी बरकरार हैं। एक तरफ स्कूल आरटीई के प्रावधानों को अव्यवहारिक बताकर इसकी मुखालफत कर रहे हैं वहीं सरकार हर हाल में उन प्रावधानों को लागू कराना चाहती है। तय समय सीमा के भीतर प्रावधानों के लागू न किए जाने की दशा में स्कूलों पर तगड़े जुर्माने और उन्हें बंद करने का नियम है। गैर आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक आरटीई कानून आने के बाद स

इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी क्षेत्र में, चाहें वो सेवा का क्षेत्र हो अथवा उत्पादन का, जबतक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा वाली स्थिति नहीं होती है तबतक गुणवत्ता और पारदर्शिता दोनों का अभाव बना रहता है। प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ गुणवत्ता और पारदर्शिता के लिए मूल्यांकन का होना नितांत आवश्यक है। आज जब प्रश्न शिक्षा में गुणवत्ता का उठता है तो बहस को सरकारी बनाम निजी स्कूल की तरफ मोड़ देने का चलन है। यह मुद्दे से ध्यान भटकाने वाली स्थिति भर है। सवाल यह कभी नहीं होना चाहिए कि शिक्षा सरकारी हो या प्राइवेट?

लगातार कई बछिया देने के बाद आपकी गाय ने बछड़ा दिया है। आप खुश हैं कि चलो अब आपकी खेती की मुश्किलें दूर होंगी। आप चाहते हैं कि बछड़ा बड़ा होकर बैल बने और खेत जोतने के काम आए। लेकिन संभव है कि कोई सरकारी अधिकारी आपके पास आए और आपको बताए कि आप बछड़े को बैल नहीं बना सकते और आपको उसे सांड बनाना पड़ेगा। आपके कारण पूछने पर वह इसे प्रशासन द्वारा क्षेत्र के हित में लिया गया फैसला बता सकता है। इतना ही नहीं यदि आपने उसकी बात नहीं मानी तो यह भी संभव है कि वह उसे जब्त कर ले, या आप पर जुर्माना ठोंक दे। जी हां, दिल्ली में सन् 1940 में बना द मद्रास लाइवस्टॉक

भारतीय कानूनी व्यवस्था अब भी कई मामलों में दकियानूसी है। देश में अब भी सैकड़ों कानून हैं, जिनकी उपयोगिता खत्म हो गई है। लेकिन अब भी वे लागू हैं। यह और बात है कि कानून लागू करने वाली संस्थाएं इनका खुद भी इस्तेमाल नहीं करतीं। लेकिन अगर चाहें तो वे इन कानूनों के जरिए आम लोगों को परेशान कर सकती हैं। अगर वे ऐसा नहीं करती हैं तो  इसे उनका एहसान ही माना जाना चाहिए, एक ऐसा एहसान जो कभी भी बंद किया जा सकता है। पिछले दो सालों में मोदी सरकार ने करीब 11 सौ से अधिक ऐसे अप्रासंगिक और गैरजरूरी कानूनों को हटा दिया है। लेकिन अब भी देश में सैकड़ों कानून ऐ

क़ानून क्या है? इस बारे में ऑस्टिन का कथन है कि क़ानून संप्रभु की आज्ञा है। राज्य के सन्दर्भ में अगर बात करें तो राजतंत्र वाली व्यवस्था में राजा का आदेश ही क़ानून होता था। शासन की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी क़ानून की परिभाषा कमोबेस वही है। सवाल है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में क़ानून लोकहित के लिए हैं या लोकहितों को ही क़ानून के मापदंड पर रखकर देखना होगा?

प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- 'खोदा पहाड़ ,निकली चुहिया " सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।

9 नवंबर को पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी को बांटने वाली बर्लिन की दीवार को वहां के नागरिकों के द्वारा ढहाए जाने की घटना के 27 वर्ष पूरे हो गए। वर्ष 1989 में इसी दिन दो भागों में बंटा जर्मनी देश फिर से एक हो गया था। मार्क्सवादियों द्वारा साम्यवाद के जरिए स्वर्ग हासिल करने और पूंजीवादियों के चंगुल से श्रमिकों को आजादी दिलाने का सब्ज़बाग लोगों को ज्यादा दिनों तक फुसलाकर रखने में सफल नहीं रहा। बंदूक की नोंक पर थोपी गई स्वर्ग की इस परिकल्पना से ऊबरते हुए नागरिकों ने जो भी औजार दिखा उसी से न केवल दीवार ढहाई बल्कि साम्यवाद की नींव भी हिलाकर रख दी। प्रस्तु

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

देश में बढ़ते कालेधन (ब्लैक मनी), आतंकवादियों की फंडिंग और जाली करेंसी की समस्या के समाधान के लिए मोदी सरकार ने बीते 8 नवंबर 2016 की रात से 500 और 1000 रूपए के पुराने नोटों को बंद करने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के बाद से काले धन का मुद्दा लोकसभा चुनावों के बाद एक बार फिर से चर्चा का केंद्र बन गया है। तमाम विशेषज्ञ इसे कालेधन पर रोक लगाने के क्षेत्र में मोदी सरकार द्वारा उठाया गया मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं वहीं कुछ लोग इसके कारगर साबित होने पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर रहे हैं।

यद्यपि सन् 1991 से भारत में आर्थिक सुधारों की शुभारंभ और मुक्त बाजार के साथ भारतीयों के प्रेम प्रसंग को शुरू हुए दो दशक बीत चुके हैं, इसके बावजूद पूंजीवाद को भारत में अपना मुकाम पाने के लिए अबतक जद्दोजहद करना पड़ रहा है। अधिकांश लोगों की भांति भारतीय भी मानते हैं कि बाजार फलदायक तो है लेकिन नैतिक नहीं है। लेकिन मेरी राय इसके बिल्कुल उलट है। मेरा मानना है कि इंसान अनैतिक होता है और लोकतंत्र के तहत या राजतंत्र के तहत, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा पूंजीवादी समाज बुरा व्यवहार वही करता है। बाजार नामक संस्था अपने आप में अत्यंत नैतिक होती है, और

भारत में बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाने वाले दीपावली के त्यौहार को मनाने के मुख्यतः दो कारण हैं। पहला कारण, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लंकापति रावण का संहार कर अयोध्या के राजा राम, भाई लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ अपने राज्य वापस लौटे थे। पुष्पक विमान से रात के अंधेरे में अयोध्या पहुंचे राम के स्वागत के लिए अयोध्यावासियों ने घर के बाहर दिए जलाए और रौशनी कर विमान को यथास्थान उतरने की राह दिखाई। कालांतर में यह उस घटना को याद करने और खुशी मनाने की परंपरा के तौर पर प्रचलित हुआ। दूसरा कारण, धन, सुख और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा अर्चना कर धनार्

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