भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।
नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।
केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।
अधिक जानकारी के लिये देखें : http://ccs.in/governance.asp
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आर्थिक स्रोतों को खत्म करने पर पस्त होंगे माओवादी
जनवरी 24, 2012 - 13:47माओ ने कहा था – सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। इसका तात्पर्य यह था कि क्रांति सशस्त्र संघर्ष के जरिये ही हो सकती है। भारत के माओवादी अच्छी तरह जानते हैं कि सशस्त्र संघर्ष के लिए अस्त्र-शस्त्र और हथियार खरीदने के लिए जेब भरी होना जरूरी है। उसीतरह बंदूक चलानेवालों का पेट भरा होना चाहिए तभी वह डटकर संघर्ष कर सकते हैं इसलिए माओवादी हर वैध और अवैध तरीके से पैसा जुटाकर अपनी
खनन रॉयल्टी से जनजातियों को मिलेगा अधिक फायदा
नवंबर 3, 2011 - 23:19आखिरकार जमीन और जंगल के अन्यायपूर्ण राष्ट्रीयकरण की नीतियों में आंशिक सुधार का रास्ता तैयार हो रहा है। मंत्रियों के एक समूह ने एक खनन विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिसमें यह व्यवस्था की गयी है कि स्थानीय समूहों (आदिवासियों या ग्रामीणों) को कोयले के खनन से होने वाले लाभ में 26 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी और अन्य खनिजों के खनन के मामले में राज्य सरकार को पिछले साल दी गई रायल्टी के बराबर राशि ग्रामीणों को भी दी जाएगी।
विकास के आंकड़े बताते हैं माओवादी महिमामंडन की सच्चाई
सितंबर 29, 2011 - 12:49माओवादी उभार के विषय पर लिखी गई एक पुस्तक ‘हैलो बस्तर‘ के लोकार्पण के अवसर पर पुस्तक के लेखक राहुल पंडिता ने छोटे मोटे अधिकारियों और वन ठेकेदारों द्वारा जनजातियों के भारी शोषण पर रोशनी डाली। उन्होंने माओवादी विरोधी निगरानी बल सलवा जुडूम की निंदा की और कहा कि आदिवासियों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है सिवाय इसके कि वे माओवादियों के साथ मिलकर बंदूकें उठाएं और अपने हक के लिए लड़ें।
विकास की दोहरी गति
सितंबर 22, 2011 - 14:46यह बैठक उसी शहर में थी और उस रामलीला मैदान से ज्यादा दूर भी नहीं थी, जहां कुछ दिन पहले तक भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध में बाबूराव हजारे अनशन पर बैठे थे। उनके इस अनशन ने सरकार, संसद और खबरिया टेलीविजन चैनलों को हिला कर रख दिया। लेकिन एक पांच सितारा होटल के वातानुकूलित और शांत माहौल में कारोबारी शिक्षा के भविष्य पर चल रहा साक्षात्कार मानो किसी अलग ही दुनिया में था। ऐसी दुनिया, जो देश भर में मध्य वर्ग के प्रदर्शनों और इनसे छुटकारा पाने की राजनीतिक तबके की काल्पनिक कोशिशों से परे थी।
गुडग़ांव के व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र में कदम रखते ही अन्ना पक्ष और सरकार के बीच चल रही तनातनी तो और दूर की चीज होती, बशर्ते टेलीविजन चैनलों पर लगातार इसका प्रसारण नहीं हो रहा होता। इस शहर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और बढ़ती निजी पहल की टक्कर स्वेच्छा से सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की गैर मौजूदगी से होती है। भारत के विकास की दोहरी गति का यह सबसे बेहतरीन उदाहरण है।
प्रशासनिक सुधारों की है आवश्यकता
सितंबर 8, 2011 - 11:31अन्ना हजारे ने देश के लिए एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है, लेकिन असल चुनौती अब शुरू होती है। तेरह दिनों के अनशन के बाद उन्होंने सरकार को तो अपनी अधिकतर मांगों के समक्ष झुकने को विवश कर दिया, लेकिन यदि अब वे अपनी राष्ट्रचेता की भूमिका में बरकरार रहना चाहते हैं, तो उन्हें फूंक-फूंककर कदम रखने होंगे।
लोकपाल बिल ने देश की उम्मीदें जगा दी हैं, लेकिन मुझे लगता है कि बड़े पैमाने पर प्रशासनिक सुधारों के बिना लोकपाल बेअसर ही साबित होगा। टीम अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का अगला एजेंडा यही होना चाहिए।
भ्रष्टाचार को गिरफ्तार करो, उसके विरोधकर्ताओं को नहीं
सितंबर 6, 2011 - 13:3264 वर्ष पूर्व कांग्रेस पार्टी ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था जिसने अंग्रेजो के निर्दयी एवं दमनकारी शासन का पर्दाफाश किया. उसने हाल मे अपने साथ भी कुछ ऐसा ही किया. अन्ना हजारे के अनशन के दौरान कांग्रेस पार्टी ने जो-जो किया उस से उसने ये सिद्ध कर दिया है की वो खुद भी कितनी निर्दयी ,बेवकूफ एवं दमनकारी है. अन्ना हजारे को जेल में डालकर, उन्होंने ऐसे जन समर्थन की लहर पैदा कर दी है जिसने इस आंदोलन में हुयी पिछली गलतियों को छिपा दिया है.
नए भूमि अधिग्रहण कानून में बाजार की बाधा और वर्गीकरण को कम किया जाना चाहिए
अगस्त 30, 2011 - 12:41जमीन हमेशा ही विवादों का कारण रही है। शहरीकरण, गैर-कृषि कार्यों के लिए जमीन की बढ़ती मांग, छोटे जमीन मालिकों में कुशलता का अभाव व रोजगार की कमी से विवाद की वजह को समझा जा सकता है। पश्चिमी यूरोप, खास तौर पर ब्रिटेन और इससे भी बढ़कर इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति से पहले ही जमीन के बाजार को मुक्त कर दिया गया था और शिक्षा तथा तकनीकी कौशल की पहुंच बढ़ गई थी। हमने ऐसे सुधार नहीं लागू किए जो लोगों को कृषि कार्य से बाहर निकलने या कृषि में ही कुछ नया कर सकने में समर्थ बना सके।
व्यवस्था में परिवर्तन से डलेगा भ्रष्टाचार पर अंकुश
अगस्त 25, 2011 - 13:11भ्रष्टाचार को लेकर मध्य वर्ग और युवाओं में भारी आक्रोश है। इससे आज देश का एक बड़ा जनमानस प्रभावित और परेशान है. इसलिए भ्रष्टाचार को लेकर लड़ाई लड़ रही सिविल सोसाइटी की मांगों के प्रति सरकार का टकरावपूर्ण रवैया किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह सरकार की हठधर्मिता का परिचायक है. यह संसदीय लोक प्रक्रिया की दृष्टि से भी हटकर है. देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान ने यह अधिकार दिया है कि वह न केवल अपनी मांगें कर सकता है, बल्कि इससे संबंधित प्रस्ताव अथवा बिल सरकार के पास विचारार्थ प्रस्तुत कर सकता है. इस प्रस्ताव अथवा बिल को मानना या न मानना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और वह चाहे तो इसे संसद में रखे अथवा न रखे?
आर्थिक चमत्कार के 20 वर्ष
अगस्त 22, 2011 - 13:19आज से 20 वर्ष पूर्व 21 जून 1991 को नरसिम्हा राव ने एक ऐसे कमजोर और अल्पसंख्यक सरकार की बागडोर संभाली थी, जो गंभीर आर्थिक संकट से घिरी थी। इसके बावजूद उन्होंने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिसने न सिर्फ भारत को बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित किया। भारत 1991 में इतना गरीब था और यहां की शासन व्यवस्था इतनी बदहाल थी कि यह विदेशी सहायता के लिए आवश्यक शर्तों को भी पूरा नहीं कर पा रहा था। आज भारत एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरा है, जिसे संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद की सदस्यता के लिए अमेरिका का भी सहयोग मिल रहा है और यह जल्द ही आर्थिक विकास की गति में चीन को भी पीछे छोड़ देगा।
स्वतंत्रता दिवस पर मन हताश
अगस्त 16, 2011 - 13:53अब तक किसी भी स्वतंत्रता दिवस से पहले भारत का मूड इतना विषादग्रस्त नहीं रहा है। विडंबना है कि पिछला एक दशक भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे सुनहरा काल रहा है। देश विस्मयकारी रूपांतरण के दौर से गुजर रहा है। दशकों से देश प्रगति के पथ पर जा रहा है। देश का प्रत्येक नागरिक तो इस संपन्नता में भागीदारी नहीं कर सका, किंतु काफी बड़ी संख्या में भारतीयों ने महसूस किया कि उनका जीवन उनके माता-पिता के जीवन से बेहतर है और उनके बच्चे उनसे भी बेहतर जीवन जिएंगे। पश्चिम में बुझती आकांक्षाओं के विपरीत हमारी महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही हैं। उदाहरण के लिए, जो लोग पहले पैदल चलते थे अब साइकिल की सवारी कर रहे हैं, जिनके पास साइकिल थी वे अब मोटरसाइकिल खरीद रहे हैं और जिनके पास मोटरसाइकिल थी, अब कार में घूम रहे हैं। अगर अब सरकार देश के सभी नागरिकों को अच्छे स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और सुशासन उपलब्ध करा सके तो देश के सभी तबकों का उद्धार हो जाएगा। किंतु रोजमर्रा की घटनाएं इस शानदार तस्वीर को मुंह चिढ़ा रही हैं।
