सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

अधिक जानकारी के लिये देखें : http://ccs.in/governance.asp

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पुलिस दुराचरण के विरुद्ध लगातार शिकायतें मिलती रहती हैं। वर्ष 2007 में बनाए गए विभिन्न राज्यों के विकलांग पुलिस कानून में प्रावधान की गयी कमेटियों का आजतक गठन नहीं हुआ है व राजस्थान उनमें से एक है। यद्यपि इन कमेटियों के गठन से भी धरातल स्तर पर कोई लाभ नहीं होने वाला क्योंकि जांच के लिए पुलिस का ही सहारा लिया जाता है। आखिर कोई भी पेड़ अपनी शाखा को किस प्रकार काट सकता  है?

11 जुलाई, 1987 में विश्व की जनसंख्या ने 5 अरब के आंकड़े को पार किया था। तब संयुक्त राष्ट्र ने जनसंख्या वृद्धि को लेकर दुनिया भर में जागरूकता फैलाने के लिए यह दिवस मनाने का निर्णय लिया। तब से इस विशेष दिन को हर साल एक याद और परिवार नियोजन का संकल्प लेने के दिन के रूप में याद किया जाने लगा। इसी क्रम में बीते 11 जुलाई को भी दुनिया भर में 'विश्व जनसंख्या दिवस' मनाया गया। विभिन्न मंचों पर विशेषज्ञों, चिंतकों, नीति-निर्धारकों आदि ने बढ़ती जनसंख्या से जुड़ी समस्या और इसकी भयावहता से लोगों को अवगत कराते हुए अपनी चिंताएं प्रदर्शित की। विशेषज्ञों ने जन

भारत में फीस लेने वाले प्राइवेट स्कूलों को स्नेह और नापसंदगी दोनों समान रूप से प्राप्त है। बच्चों की शिक्षा के लिए एक तरफ तो ये स्कूल अभिभावकों के लिए काफी मूल्यवान हैं, वहीं दूसरी तरफ इन्हें या तो 'बच्चों के जीवन के साथ खेलने वाली शिक्षा की दुकानों (टीचिंग शॉप्स)' अथवा ऊंची फीस वसूलने वाले मुनाफाखोर संस्थाओं के तौर पर नापसंद भी किया जाता है। प्राइवेट स्कूलों की नैतिकता का प्रश्नचिन्ह होने के बावजूद देश में सभी प्रकार की प्राइवेट शिक्षा जैसे कि झुग्गी झोपड़ियों में चलने वाले प्राइवेट स्कूलों से लेकर कुलीन प्राइवेट स्कूलों के विस्तार के साथ एक

70000 वर्ष पूर्व शुरू हुई ‘संज्ञानात्मक क्रांति’ से मानव समाज की ‘ज्ञान यात्रा’ वैज्ञानिक क्रांति, औद्योगिक क्रांति, सूचना क्रांति जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों से गुजरती हुई आज के दौर में पहुँची हैं और शिक्षा इस लंबे मानव जीवन की सहचारिणी रही हैं। हालाँकि प्रारम्भ से ही शिक्षा ‘स्वतंत्र समाज’ का हिस्सा रही हैं लेकिन जबसे ‘राज्य-राष्ट्र’ के सिध्दान्त का उदय हुआ हैं; सभी देशों मे यह सरकारी व्यवस्था के एकाधिकार का शिकार बनकर रह गयी हैं। चूँकि किसी भी देश में उपलब्ध गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ही वहाँ के मानव संसाधन की गुणवत्ता निर्धारित करती हैं इसलिए शिक्षा

शिक्षा निदेशालय ने 22 मार्च 2013 को एक परिपत्र (सर्क्युलर) जारी कर अनधिकृत कॉलोनियों में संचालित होने वाले प्राइमरी स्कूलों व मिडिल स्कूलों के लिए भूमि की न्यूनतम सीमा की अनिवार्यता में ढील दी थी। वर्तमान में यह सीमा प्राइमरी स्कूलों के लिए 200 स्क्वायर यार्ड और मिडिल स्कूलों के लिए 700 स्क्वायर मीटर (857 स्क्वायर यार्ड) है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक है जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था का उद्देश्य सुशासन के लिए काम करना होता है। वह सुशासन जो प्रमुख रूप से आठ अव्यवों से मिलकर
तैयार होता है। ये अव्यव हैंः
विधि का शासन अर्थात rule of law
समानता एवं समावेशन अर्थात equity and inclusiveness
भागीदारी अर्थात participation
अनुक्रियता अर्थात responsiveness
बहुमत या मतैक्यता अर्थात consensus oriented
प्रभावशीलता व दक्षता अर्थात effectiveness and efficiency
पारदर्शिता अर्थात transparency

रिलायंस ने 1 सितंबर 2016 को अपनी दूरभाष सेवा ‘जियो’ का लोकार्पण किया। इसके तहत फोन पर निशुल्क बातचीत करने और ग्राहको के लिए 4 जी इंटरनेट डेटा प्लान उपलब्ध है। इस योजना का लाभ उठाने के लिए आवश्यक रिलायंस जियो का सिम हासिल करने के लिए पूरा देश उमड़ पड़ा और कतारबद्ध होकर खड़ा हो गया।

अध्यापकों की शैक्षणिक योग्यता और वेतन

शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून 2009 में शिक्षक होने के लिए बैचलर ऑफ एजुकेशन (बीएड) की योग्यता को अनिवार्य बना दिया गया है। इसके अतिरिक्त, पहले से ही अध्यापनरत समस्त अध्यापकों के लिए अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उतीर्ण करना भी अनिवार्य कर दिया गया है। राज्य सरकारों ने भी उक्त नियमों में रियायत नहीं दी और सभी निजी स्कूलों के अध्यापकों के लिए पांच वर्ष के भीतर टीईटी उतीर्ण करना आवश्यक कर दिया।

भारत में, सरकार 6 से 14 वर्ष आयुवर्ग के बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है। हमारे देश में शिक्षा नीति की संरचना इस प्रकार की गई है कि वह शिक्षा मयस्सर कराने के लिए मुख्य रूप से सरकार द्वारा संचालित किए जाने वाले स्कूलों पर केंद्रीत है। यकीनन, गैर सरकारी संस्थानों द्वारा संचालित स्कूलों को दोयम स्तर का दर्जा हासिल है। इसलिए, हमें अपने पर्यवेक्षण के दौरान सरकारी और निजी स्कूलों के प्रति नीतिगत दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर देखने को मिला। सरकारी स्कूलों के संबंद्ध में यह दृष्टिकोण जहां सहयोगी और सुविधा प्रदान करन

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