खुले बाजार की मूल अवधारणा

किसी भी शब्द को लेकर समाज में एक ख़ास किस्म की सकारात्मक अथवा नकारात्मक अवधारणा का बन जाना कोई नई बात नही है. 'बाजार' अर्थात 'मार्केट' शब्द  भी इससे अछूता  नही  है। आमतौर  पर  यदि  आप  किसी भी व्यक्ति से  एक सवाल पूछें कि क्या देश में  बाजार के लिए आजाद एवं उदार माहौल होना चाहिए ? अथवा क्या बाजार पर बंदिशों की बजाय छूट का माहौल ज्यादा होना ठीक है ? आपको बहुतायत में जो जवाब मिलेगा वो 'नही' में होगा।

संभव है कि जवाब देने वाला आपके सवाल को बेहद संदिग्ध नजर से देखते हुए 'पूंजीवादी' घोषित कर देगा। इसकी सम्भावना बहुत कम है कि खुले बाजार का विरोध करने वाला 'खुले बाजार' को लेकर कोई अध्ययन भी रखता हो और अपने अध्ययन  से जुड़े तथ्यों के आधार पर वो इस  विचार को खारिज कर रहा हो। ज्यादा संभावना इस बात की है कि जवाब देने वाला 'अध्ययन' की बजाय एक स्व-विकसित सुनी-सुनाई अवधारणा के आधार पर 'खुले बाजार' के विचार को खारिज कर रहा हो। दरअसल हमारे देश में 'मार्केट' शब्द को बेहद नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। समाजवादी विचारों के आकर्षण एवं कम्युनिस्टों के अतिशय दार्शनिकता वाले एवं व्यावहारिकता से परे आदर्शवाद ने 'बाजार' अथवा 'मार्केट' शब्द को एक नकारात्मक विकास के रूप में प्रस्तुत किया।

बाजार को लेकर बनाई गयी उनकी यह अवधारणा भारतीयता से परे है। जब वे कहते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है तो वे यह नही बता पाते कि आखिर क्यों व्यवहार में कृषि आम जन की जरूरतों को पूरा करने में लागातार नाकामयाब हुई है। दरअसल, भारत एक कृषि प्रधान देश होने की बजाय हमेशा ही एक बाजार प्रधान देश रहा है। हाँ, यह जरुर माना जा सकता है कि भारत का बाजार कृषि आधारित था और उसी बाजार पर समाज की निर्भरता थी। समाज खुद बाजार बनाता था, उसका संचालक था, उत्पादक था, विक्रेता था और स्वयं ही क्रेता भी था। उपभोग से उत्पादन तक पर समाज का अधिकार था। समाज अपने अनुकूल बाजार विकसित करने को स्वतंत्र भी था। अगर भारत बाजार के लिए अनुकूल देश नही होता तो भला बाजार करने वाले व्यापारियों का भारत आगमन होता ही क्यों ? वर्ष १६०० में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना बाजार के विकास के लिए हुई और वो कम्पनी भारत आई। निश्चित तौर पर एक कम्पनी भारत में इसलिए ही आई क्योंकी यहाँ बाजार के लिए सही माहौल था। हमारे यहाँ बाजार शब्द कोई नया शब्द नही था, बेशक हमारे बाजार का स्वरूप अलग हो सकता था। चूँकि हम एक बाजार प्रधान देश थे और बाजार को लेकर हमारी समझ भी अच्छी थी, लिहाजा दुनिया के बाजारों का आकर्षण भारत की तरफ होना स्वाभाविक था।

खैर, आज बाजार शब्द को लेकर समाज में एक ग़लतफ़हमी का भाव ये है कि बाजार का सीधा अर्थ पूँजी अथवा संसाधन पर चंद लोगों का नियन्त्रण होना. जबकि खुले बाजार का यह अर्थ बिलकुल भी नहीं है। खुले बाजार का अर्थ है कि बाजार समाज द्वारा अपने ढंग से विकसित किया जाय और उसे समाज ही संचालित करे। बाजार पर समाज के अतिरिक्त अगर सरकार का नियंत्रण होने लगता है तो बाजार का स्वरुप बिगड़ता है। सम्भवत: पिछले सत्तर वर्षों में बाजार पर सरकारी नियन्त्रण को मजबूत करने के समाजवादी एवं वामपंथी प्रयासों ने भी इस समस्या को ज्यादा जटिल किया है। जब भी सरकार अर्थात राज्य का बाजार में हस्तक्षेप बढ़ता है तो बाजार का खुलापन संकुचित होकर कुछ चंद लोगों के हाथों में जाने लगता है। एक नैसर्गिक अथवा स्व-स्फूर्त भाव से जो बाजार विकसित हो सकता था वो सरकारी नियन्त्रण में योजनाबद्ध ढंग से समाज के हाथों से निकलकर चंद लोगों, जो सरकार तक पहुँच रखते हैं, के हाथों में सिमट जाता है। हालांकि सरकार के नियन्त्रण से मुक्त जिस बाजार की बात हम कर रहे हैं, उसको लेकर भी एक नकारात्मक अवधारणा का बन जाना ही काम कर रहा है।

आम जनता में समाजिक विकास के लिए खुद से ज्यादा 'सरकार' के प्रति निर्भरता का जो सपना घर किये हुए है, वो कहीं न कहीं ज्यादा घातक साबित हो रहा है। यह एक बुरी धारणा  है कि सरकार अथवा राज्य ही सबकुछ करता है और उसके द्वारा किया गया कार्य ही वैध है। जबकि प्राचीन भारतीय परम्पराओं में राज्य को 'न्याय' और सुरक्षा' के अलावा कोई तीसरा कार्य जनता द्वारा नहीं दिया गया था। न्याय और सुरक्षा को छोड़ दिया जाय तो शिक्षा, स्वास्थ्य सहित आमजन के विकास से जुड़ी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के लिए समाज खुद आत्मनिर्भर था। लेकिन हर कार्य के लिए सरकार के प्रति निर्भरता ने राज्य के समाज में हस्तक्षेप को मजबूत किया है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो राज्य व्यक्ति से जुडी हर चीज तय करने लगेगा। राज्य का बुनियादी चरित्र है अत्यधिक अधिकार एवं शक्ति पर कब्जा करना। अंग्रेजी शासन ने सबसे पहला कार्य यही किया कि उसने लोगों की सरकार और राज्य पर निर्भरता बढ़ा दी और परिणामत: समाज खुद से ज्यादा सरकार पर निर्भर होता गया।

हर चीज जो समाज द्वारा स्थानीयता के आधार पर तय किया जा सकता है, को सरकारी कानूनों में बाँधकर जटिल कर देना राज्य की प्रवृति है, जो विकास को अवरुद्ध करने वाली प्रवृति है। उदाहरण के तौर पर देखें तो अपने देश में सैकड़ों ऐसे क़ानून हैं जो विकास में वाधक हैं। मसलन, अंग्रेजों के समय में बांस को पेड़ का दर्जा दिए जाने की वजह से देश में बहुत समय तक बांस काटना अवैध था (अभी भी यह क़ानून  खत्म न होने की वजह से पूरी तरह से समाधान नही मिला है)। चूँकि पूर्वोत्तर भारत में बांस बहुतायत पाया जाता है और भारत दुनिया का अग्रणी बांस उत्पादक है, लेकिन मात्र इस कानूनी अड़चन की वजह से हमे अगरबत्ती जैसी छोटी सी चीज बनाने के लिए भी बांस चीन से मंगाना पड़ता है। अगर इस क़ानूनी अडचन को हटाकर देखा जाय तो बांस एक स्थानीय समुदाय की अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता का मजबूत कारक बन सकता है। जहाँ बांस है वहां उस बांस के उपयोग से तमाम फर्नीचर से लगाये खादी उत्पाद बनाने वाले स्किल्ड लोग भी हैं। गौरतलब है कि यह स्किल उन्हें किसी सरकारी प्रशिक्षण से नही बल्कि परम्पराओं से मिली है। अगर उन लोगों को बांस का उपयोग करने की खुली छूट दे दी जाय तो वहां एक बाजार का विकास स्वत: हो जाएगा। हर हाथ काम और व्यक्ति की तरक्की के साथ-साथ लोकल इकॉनोमी भी सुदृढ़ होगी। लेकिन एक मामूली क़ानून की वजह से ऐसा नही हो पाता है। आश्चर्य जनक बात ये है कि इस क़ानून की वजह से बांस बिलकुल नही कटते होंगे ऐसा नही माना जा सकता है। कटते होंगे, बिकते भी होंगे लेकिन इसके लिए भ्रष्टाचार, रिश्वत आदि के रास्ते अपनाए जाते होंगे। बड़े और सक्षम लोग उस संसाधन का उपयोग गलत ढंग से कर ही लेते होंगे फिर ऐसा करने में क्या दिक्कत है कि उसका उपयोग सर्व-सुलभ कर दिया जाय ? इससे भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी और आम आदमी अपना बाजार खुद तैयार कर लेगा। मोदी सरकार द्वारा ऐसे कानूनों को चिन्हित करके और हटाने की कवायद शुरू की गयी है लेकिन इसे शीघ्रता से करना जरुरी है।

बाजार को लेकर एक सवाल और उठाया जाता है कि अगर बाजार को सरकारी नियन्त्रण से मुक्त कर दिया गया तो बाजार वाले मनमाना रेट आदि वसूलने लगेंगे। जबकि उदाहरण इसके भी खिलाफ जाते हैं। आप देखें तो जिन उत्पादों पर सरकार द्वारा कीमत न तय किये जाने का प्रावधान है वो उत्पाद लागातर सस्ते भी हुए हैं और गुणवत्ता के साथ सुलभ भी। मसलन, मोबाइल फोन और उसकी कॉल दर। साधारण सी बात है जिस उत्पाद की दुकाने जितनी अधिक होंगी उस उत्पाद में दुकानदारों के बीच कम्पटीशन भी अधिक होगा. जब कंपटीशन अधिक होगा तो गुणवत्ता बढ़ेगी और दाम घटेंगे। लेकिन जैसे ही सरकार ये सब चीजें तय करने लगती है, गुणवत्ता तो खराब होती ही है उपभोक्ता को असुविधा भी अधिक होती है। लिहाजा, बाजार को स्वतंत्र कर देने से उपभोक्ताओं के पास चयन का विकल्प बढेगा जो कि समाज के हित में है। इसी ढंग का बाजार भारत के प्राचीन समाज में रहा है। लेकिन आजादी के बाद से ही बाजार को लेकर जिस ढंग से नकारात्मकता फैलाई गयी और सरकार को जनता का भाग्य-विधाता साबित करने की कोशिश की गयी उसने 'बाजार' शब्द की मूल अवधारणा को ही नष्ट किया। सरकार के अत्यधिक हस्तक्षेप ने बाजार को समाज के हाथों से छीनकर चंद लोगों के हाथों में दिया जबकि 'खुले-बाजार' की स्थिति में ऐसा सम्भव नही था। हमे समझना चाहिए कि बाजार का अर्थ पूंजीपति की स्थापित की गयी कम्पनी से नही तय होता बल्कि उत्पादन और उपभोग में समाज की हिस्सेदारी से होता है। लेकिन इसके लिए जरुरी है कि बाजार के नियामकों में सरकार का न्यूनतम हस्तक्षेप हो। यही भारत के प्राचीन बाजार की परम्परा भी रही है। 

 

- आजादी.मी के लिए शिवानन्द द्विवेदी
(लेखक पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े हैं एवं वर्तमान में डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं)

शिवानंद दिवेदी