व्यंग्यः पेट्रोल की बढ़ती कीमतें और राष्ट्रगौरव की भावना

आम आदमी बहुत भोला होता है। मासूम होता है। उसे जो समझाओ, समझने लगता है। अब देखिए, विपक्ष ने समझाने की कोशिश कर डाली कि पेट्रोल-डीजल के दाम सरकार बढ़ा रही है और सरकार दाम कम नहीं करना चाहती है तो आम आदमी यही समझने लगा।

लेकिन पेट्रोल-डीजल के दाम पर जो चिंदी चोरी टाइप की हरकतें सरकार और आम लोगों की तरफ से हो रही हैं-वो देश का अपमान है। ये क्या बात हुई भला कि कभी 10 पैसे बढ़ा दिए, कभी 20 पैसे। और घटाने के बाद आई तो कभी 1 पैसे घटा दिए, कभी 5 पैसे। कानपुर के लोग दिनभर में 50-100 रुपए का तो सिर्फ गुटखा खाकर दीवारें लाल कर देते हैं, भिखारी आजकल 5 रुपए से कम लेना मन कर देता है और हम लोग हैं कि 10-20 पैसे को मुद्दा बना रहे हैं। इससे अच्छा तो मनमोहन सिंह का दौर था। पेट्रोल-डीजल के दाम जब बढ़े, दो-चार रुपए तो बढ़े ही। 

एक जमाने में पेट्रोल के दाम बढ़ना वो मुद्दा होता था, जो मरासु विपक्ष में नई जान फूंक देता था। इस मुद्दे पर विपक्ष हल्ला में ऐसा मारक किस्म का गुल्ला मिलाकर प्रदर्शन करता था कि सरकार के इंजन में भी गड़बड़ी हो जाती थी। लेकिन अब दो दिन दिन लोगों ने, विपक्ष ने टीवी चैनलों पर बाइट दी और फिर एसी कमरे में सो गए। गर्मी बहुत थी भइया। पेट्रोल-डीजल के दाम 10-15 दिन बढ़कर कम होने लगे और विरोध ठंडा हो गया।

मैं वास्तव में कंफ्यूज हूं। पेट्रोल के दाम बढ़ाने-घटाने का यह लेवल क्या देश का अपमान नहीं है। माना कि हम गरीब हैं लेकिन इतने गरीब भी नहीं कि पेट्रोल जैसे शानदार आइटम के दाम एक-एक पैसे घटाए-बढ़ाए जाएं।

खैर, जो हुआ, वो हुआ। इसमें अपन क्या कर सकते हैं? देश के मैंगो मैन की जेब में आम खाने लायक पैसे हों या नहीं! अपमान का घूंट निगलने लायक प्यास हमेशा रहती है। उन्हें आदत है। यह बेइज्जती भी झेल लेंगे। लेकिन, अपनी सरकार और पेट्रोल कंपनियों से अपील है कि ऐसी चिंदी चोरी वाली बढ़ोतरी न करें।

पेट्रोल की कीमत तो एक झटके में 500 रुपए प्रति लीटर या इससे भी ज्यादा कर देनी चाहिए। इसके कई लाभ हैं। संभवत: सरकार को यह लाभ न मालूम हों, इसलिए खाकसार बताना जरुरी समझता है।

पहला, एसी कमरे में बैठे-बैठे बाहर की मारक किस्म की गर्मी से त्रस्त मंत्री-संतरी जानते हैं कि देश को ‘इको फ्रेंडली’ होने की सख्त जरुरत है।

पेट्रोल के दाम बढ़ेंगे तो साइकिल चलानी पड़ेगी। साइकिल चलानी पड़ेगी तो साइकिल की बिक्री बढ़ेगी। इससे स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी योजनएं परवान चढ़ेंगी। रोजगार में वृद्धि होगी। क्योंकि साइकलों की संख्या बढ़ेगी तो हवा भरने वाले, पंक्चर लगाने वाले भी बढ़ेंगे। मुद्दा सिर्फ 'पकौड़े' के रोजगार से आगे बढ़ेगा।

साइकिलें ज्यादा बिकेंगी तो लोगों की सेहत बनेगी। फ्री में! वरना, आजकल अच्छे जिम का एक महीने का चार्ज 5-7 हजार रुपए से कम नहीं है। तो क्या हुआ अगर यूपी में टीपू की साइकिल पंक्चर हो गई। असल साइकिल हमेशा हिट थी और हिट रहेगी। पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए जाएं तो लोगों को साइकिल चलानी ही होगी। उनकी सेहत का ख्याल रखना सरकार का ही काम है। आरोग्य भारत को लागू करने से पहले पेट्रोल के दाम बढ़ाकर सरकार सेहत सुधारने की दिशा में उल्लेखनीय काम कर सकती है।

पेट्रोल की बढ़ी कीमतें देश को समाजवाद की तरफ लौटा सकती हैं। गाड़ी भले खूब बड़ी धर लो घर में लेकिन औकात नहीं पेट्रोल डलवाने की तो चलो बेट्टे तुम भी आम आदमी के साथ बस-वस, ऑटो-टेंपू में। बंदा समझ लेगा लू-लपट में जीने वाले का दर्द।

बाजार में पेट्रोल मग या पेट्रोल टिन के रुप में गिफ्ट पैक की नयी संभावनाओं के द्वार भी खोले जाने चाहिए। आशिक अपनी महबूबा को पेट्रोल मग गिफ्ट करेंगे तो कन्या का पूरा परिवार खुशी में झूम उठेगा। लड़के की साख बढ़ जाएगी।

दहेज के वक्त लग्जरी आइटम के रुप में भी पेट्रोल की संभावनाएं बनेंगी। फायदा यह होगा कि दहेज में आया पेट्रोल शादी के एक-दो साल मुहब्बत वाले पीरियड में खत्म हो लेगा। इसके बाद बवाल होता है तो ‘दहेज वापस दो’ टाइप झंझट नहीं रहेगा।

आजकल शादी, बर्थ-डे में बड़ा संकट रहता है कि क्या गिफ्ट दें तो लगातार महंगा होता पेट्रोल भविष्य में शादी पर नवविवाहित जोड़ों को तोहफे के तौर पर दिया जा सकता है।

सरकार घोड़ा एसोसिएशन को भी सपोर्ट कर सकती है। देश में घोड़ों का कोई माई-बाप नहीं है। घोड़ों के साथ गधों का भी नहीं है। लोग अपनी जरुरत के मुताबिक गधे-घोड़े पाल सकते हैं।

मोटर गाड़ियों ने तांगे खत्म कर दिए। बसंती टाइप की जुझारु लड़कियां भी तांगे के साथ खत्म हो लीं। पेट्रोल की बढ़ी कीमतों के साथ धन्नो और बसंती दोनों सड़कों पर दिखायी दे सकती हैं। यानी पेट्रोल की बढ़ी कीमतों का एक सिरा महिला सशक्तिकरण से जुड़ता है। महिलाओं का ध्यान रखना भी सरकार का काम है।

पेट्रोल की बढ़ी कीमतों से आत्महत्या की दर में कमी आ सकती है।

पेट्रोल की कीमतें 500-700 रुपए हो जाएं तो ऐरे गैर नत्थू खैरे टाइप के लोग तो अपनी गाड़ियां लेकर घर ही बैठेंगे, इससे पर्यावरण में सुधार होगा।

भुर्र भुर्र करते हुए दिन भर लड़कियों के घरों के चक्कर लगाने वाले छिछोरों की हरकतों पर लगाम लगेगी। बिना एंटी रोमियो स्कॉयड के अगर आप छिछोरेबाजी पर लगाम लगा सकें तो इससे बेहतर क्या हो सकता है।

इत्ते शानदार तर्कों को पढ़ने के बाद शायद सरकार के किसी मंत्री का कोई मेल आ गया हो। चलूं देखूं. माल मिले तो फेसबुक-ट्विटर-फ्यूटर हर जगह सरकार का गुणगान करुंगा। आखिर मेरा भी अपनी बाइक की टंकी फुल कराने का एक विराट सपना है।

- पीयूष पांडे (लेखक, वरिष्ठ टीवी पत्रकार और व्यंग्यकार हैं। उनके दो व्यंग्य संग्रह-छिछोरेबाजी का रिजोल्यूशन और धंधे मातरम प्रकाशित हो चुके हैं)
- फोटोः साभार अमूलडेयरी.कॉम

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