सशुल्क स्कूल व निशुल्क स्कूल : बढ़ रहे हैं दिक्कतोँ के दायरे

शिक्षा के लिए एक नई राष्ट्रीय नीति (नेशनल पॉलिसी) तैयार करने के लिए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हाल ही में एक कमिटी का गठन किया है। इस कमिटी को पहले दो वर्षोँ तक देश भर में इस विषय पर हुई मंत्रणा का लाभ मिलेगा। चूंकि वर्तमान दौर में शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता एक गम्भीर मुद्दा बन गया है, ऐसे में कमिटी से काफी उम्मीदेँ भी लगाई जा रही हैं।

शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए प्रत्येक चरण आवश्यक है लेकिन स्कूली शिक्षा की क्वालिटी में सुधार की प्रक्रिया सबसे अहम है। मगर यह कार्य इतना आसान नही होगा क्योंकि देश भर में 1.5 मिलियन से भी अधिक स्कूल हैं और 253 मिलियन छात्र उनमें नामांकित है। हालांकि निजी क्षेत्र के सिर्फ 25 फीसदी स्कूलोँ, जिन्हेँ आमतौर पर पब्लिक स्कूल कहा जाता है, में 40 फीसदी छात्रोँ का नामांकन होता है। यह संख्या लगातार बढ़ भी रही है। संसाधन सम्पन्न अभिभावकोँ के लिए महंगे स्कूल ही प्राथमिक पसंद हैं, क्योंकि वे तेजी से बढ़ रहे मध्यम वर्गीय ब्रिगेड में खुद को शामिल करने की होड़ में लगे हुए हैं। लेकिन एड्मिशन के बाद साल दर साल जैसे-जैसे फीस में वृद्धि होने लगती है तब उन्हेँ परेशानी महसूस होती है। समय-समय पर अभिभावकोँ के विरोध-प्रदर्शन और कुछ राज्योँ में स्कूल फीस में वृद्धि पर लगाम लगाने के प्रयास आदि इसी का नतीजा हैं।

दूसरी ओर निजी स्कूलोँ के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, क्योंकि उनके पास ग्राहकोँ की कमी नहीं है, इसलिए उनके कारोबार को कोई खतरा नहीं है। वास्तविकता यह है कि अगर अपवाद स्वरूप कुछ स्कूलोँ को अलग कर दिया जाए तो अधिकतर स्कूल लाभ में चल रहे हैं और अपनी सम्पत्ति में इजाफा कर रहे हैं। मगर पार्दर्शिता के लिए नियामक एजेंसियोँ द्वारा बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद सुधार देखने को नहीं मिलता है। आज भी बहुत से प्रतिष्ठित स्कूलोँ में शिक्षकोँ को वेतन आयोग की सिफारिशोँ के अनुरूप तनख्वाह नहीं मिलती है; मगर छात्रोँ के लिए फीस में नियमित रूप से वृद्धी होती है। जबकि मौजूदा नियमोँ के मुताबिक, स्कूल को लाभ कमाने का व्यवसाय नहीं माना जा सकता है। 

शिक्षा के अधिकार कानून के तहत 25 फीसदी गरीब तबके के बच्चोँ को दाखिला देने का नियम है, मगर अधिकतर स्कूल इसका पालन नहीं करते हैं। इससे निजी स्कूलोँ की चालाकी और नियामक एजेंसियोँ की लचरता स्पष्ट हो जाती है।

क्या इस अस्वीकार्य अव्यवस्था को ठीक करने का कोई तरीका नहीं है? क्या राज्योँ को शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाली प्रत्येक संस्था से यह उम्मीद करनी चाहिए कि वह अकेले आदर्श-शिक्षा को परोपकार का कार्य मानकर चले? प्राइवेट उद्यमी तब लाभ कमाने के अधिकार की मांग कर सकते हैं जब वे आय-कर देते हैं। मौजूदा समय में, वे लाभ तो कमा रहे हैं, लेकिन कर नहीं दे सकते हैं। ऐसे दौर में जब हर बच्चे को समान शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिल रहा है तब निजी स्कूलोँ को अपने शिक्षकोँ के वेतन में सौदेबाजी करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। इस सबके बावजूद जब राज्य सरकारेँ हर बच्चे को 14 साल की उम्र तक निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने की जिम्मेदारी अकेले उठा पाने में खुद को अक्षम बता चुकी हैं, ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थानोँ के उद्भव के लिए पर्याप्त वजह मिल जाती है। इतना ही नहीं, सरकारी स्कूलोँ की हालत इतनी खराब होती जा रही है कि तमाम स्कूलोँ को बंद करने या इनका मर्जर करने जैसे कदम उठाए जा चुके हैं। इसे सरकारी सिस्टम का फेलियर नहीं तो और क्या कहेंगे?

पिछले कुछ दशकोँ के दौरान राज्य सरकारोँ ने बड़े पैमाने पर पैरा‌-टीचर्स की नियुक्ति कर अपने ही स्कूलोँ की गुणवत्ता का स्तर गिराने में भरपूर योगदान दिया है। कम वेतन पर शिक्षकोँ की नियुक्ति कर सरकार भी वही कर रही है जो प्राइवेट स्कूल कर रहे हैं। जब 90 फीसदी से भी अधिक सरकारी स्कूल शिक्षा के अधिकार कानून के नियमोँ पर खरे नहीं उतरते हैं, तब प्राइवेट स्कूलोँ से नियमोँ के पालन की उम्मीद कैसे की जा सकती है? स्कूली शिक्षा के लिए सबसे जरूरी है निजी क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए एक स्पष्ट दिशानिर्देश तय करना और सरकारी क्षेत्र एवम् नियामक मशीनरी की प्रतिष्ठा वापस लाना। उच्च शिक्षा में किसी भी तरह का सुधार या जनसंख्यामक विविधता के लाभ हेतु किए जाने वाले प्रयासोँ की सफलता स्कूली शिक्षा की प्रतिष्ठा और इसकी गुणवत्ता पर ही निर्भर करती है। कहने का मतलब यह है कि, जो भी खामियाँ हैं उनका विरोध मजबूती के साथ किया जाना चाहिए। नई एजुकेशन पॉलिसी के जरिए यह मजबूती सामने आनी चाहिए।

- जे एस राजपूत (पूर्व निदेशक, एनसीईआरटी)
 

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