मुक्त बाजार का मंत्र

बहुत से भारतीयों की धारणा अभी भी यही है कि बाजार धनी लोगों को और अधिक धनी तथा गरीबों को और अधिक गरीब बनाता है तथा यह भ्रष्टïचार एवं क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा देता है। वास्तव में यह एक गलत धारणा है। वास्तविकता यही है कि पिछले दो दशकों में व्यापक तौर पर समृद्धि बढ़ी है और तकरीबन 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले हैं। बावजूद इसके लोग अभी भी बाजार पर अविश्वास करते हैं। आंशिक तौर पर इसके लिए आर्थिक सुधारकों को दोष दिया जा सकता है, जो प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषताओं अथवा धारणा को ब्रिटेन की मार्गरेट थैचर की तरह आम लोगों को नहीं बता सके। सौभाग्य से हमारे पास अब नरेंद्र मोदी जैसा श्रेष्ठ सेल्समैन उपलब्ध है जो हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बदलने में समर्थ है।
 
कुछ सप्ताह पूर्व जब सरकार ने डीजल के दामों को विनियंत्रित किया तो मोदी ने यह बताने का मौका खो दिया कि क्यों प्रतिस्पर्धी बाजार अधिक बेहतर है, जो कि राजनेताओं के बजाय बाजार द्वारा निर्धारित होता है। उन्हें लोगों को याद दिलाना चाहिए कि 1955 से 1991 के बीच समाजवादी अर्थव्यवस्था वाले अंधकारपूर्ण वर्षों, जिसे हम लाइसेंस राज के रूप में याद करते हैं, के समय हमारा जीवन नियंत्रित कीमतों द्वारा प्रभावित होता था। राजनीतिक तौर पर निर्धारित की गई कीमतें उत्पादकों को उनकी लागत निकालने की अनुमति नहीं देती थीं, जिससे अभाव की स्थिति बनी रहती थी और कालाबाजारी को बढ़ावा मिलता था।
 
मुझे अभी भी याद है कि मेरा पारिवारिक घर वर्षों तक अधूरा रहा, क्योंकि मेरे पिता सीमेंट की कुछ अतिरिक्त बोरियों के लिए नियंत्रणकर्ताओं को रिश्वत देने को तैयार नहीं हुए। इस राजनीतिक मूल्य व्यवस्था के कारण 1989 में शक्तिशाली सोवियत संघ भी ढह गया। कम्युनिस्ट सरकार का सभी फैक्ट्रियों और उत्पादन के अन्य साधनों पर स्वामित्व था। क्या उत्पादन किया जाना है, कितना उत्पादन होना है और कीमतें क्या होंगी, यह सभी कुछ सोवियत संघ के नौकरशाह तय करते थे, न कि बाजार। इसने लोगों को बर्बाद करने का काम किया। जिन चीजों की मांग थी उनकी कमी रहती थी और नौकरशाह जो निर्णय लेते थे उन्हीं का उत्पादन होता था। रूस की दुर्गति को देखते हुए दुनिया ने यही सीखा कि सरकार का काम बिजनेस नहीं है और उसे वृहद आर्थिक नीतियों के मामले में न्यूनतम हस्तक्षेप करना चाहिए। भ्रष्टïचार कीमतों में हेरफेर का अनिवार्य परिणाम है। इसके कारण डीजल में केरोसिन की मिलावट को बढ़ावा मिला। इस बारे में पूर्व सरकारी तेल समन्वय समिति ने एक चौंकाने वाला आंकड़े पेश करते हुए तकरीबन 40,000 करोड़ रुपये के घोटाले का अनुमान व्यक्त किया। जांच में यह बात भी सामने आई कि इस रैकेट का खुलासा करने वाले तमाम मुखबिरों को मौत के घाट उतार दिया गया।
 
खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से लोगों को एक रुपये प्रति किलो अनाज मुहैया कराने के लिए राष्ट्र को वास्तव में 3.65 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि आधा अनाज सड़ जाता है अथवा खराब हो जाता है, जिससे राष्ट्र को प्रति वर्ष 50,000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। बिजली के मामले में भी चोरी कीमत नियंत्रण का स्वाभाविक परिणाम है। इससे राज्य बिजली बोर्डों को वित्तीय नुकसान होता है। रेलवे को दूसरी श्रेणी के प्रति टिकट पर हर किलोमीटर के हिसाब से 24 पैसे का नुकसान होता है। यह तब है जबकि कुछ महीने पहले ही रेल किरायों में 15 फीसद की बढ़ोतरी की गई है। रेलवे को यात्री किराये से 26000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। यात्री किराये में होने वाले घाटे की भरपाई मॉल भाड़े में बढ़ोतरी से की जाती है। यही मुख्य वजह है जिस कारण भारतीय रेल अपना आधुनिकीकरण नहीं कर पा रही है और शेष दुनिया की तुलना में भारत पीछे है।
 
मोदी को चाहिए कि वह अपनी संवाद क्षमता के बल पर लोगों को समझाएं कि एक दक्ष और भ्रष्टïचारमुक्त अर्थव्यवस्था राजनेताओं को कीमतें निर्धारित करने की अनुमति नहीं देती। इससे उन्हें लोगों को यह समझाने में भी मदद मिलेगी कि जन धन योजना वाले खातों में नकदी धन हस्तांतरण बेहतर है और इस तरह गैस सिलेंडरों पर मिलने वाली सब्सिडी, पीडीएस खाद्यान्न और बिजली आदि के लिए चलाई जा रही योजनाओं में भ्रष्टïचार घटेगा। भ्रष्टïचार रोकने के मामले में लोकपाल के बजाय बाजार अधिक बेहतर काम कर सकता है। इस बात को अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे नहीं समझ सके। डीजल की कीमतों को विनियंत्रित करने के कुछ सप्ताह बाद ही सरकार ने कोयला खनन के लिए प्रतिस्पर्धी निविदा की घोषणा की। यह एक अच्छा निर्णय है। यह खुली निविदा उन्हीं तक सीमित है जो कोयले का उपयोग करते हैं, जैसे कि बिजली कंपनियां। इससे राज्यों को कई गुना अधिक राजस्व अर्जित होगा और कोयला बाजार अधिक प्रतिस्पर्धी होगा। इससे कोल इंडिया का एकाधिकार खत्म होगा, जो कि एक प्रमुख समस्या बन चुका है। एयरलाइंस, टेलीफोन और टेलीविजन में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने की जरूरत है ताकि विकल्पों की उपलब्धता बढ़े और अधिक स्वतंत्रता कायम हो। 
 
एक अन्य हास्यास्पद बात यह है कि भारतीय सोचते हैं कि वे अपने गौरवमयी लोकतंत्र के कारण आजाद हैं, लेकिन आर्थिक तौर पर वे अभी भी पराधीन हैं। मोदी बार-बार कहते हैं कि सरकार का काम बिजनेस नहीं शासन संचालन है, लेकिन वह अपने कड़े निर्णयों का प्रचार नहीं कर सकते, जो आगामी कुछ महीनों में अवश्यंभावी हैं। उन्हें समझना होगा कि सब्सिडी, मूल्य नियंत्रण और सरकारी एकाधिकार से विकृति पैदा हो रही है और इससे जरूरतमंद आम लोगों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। बाजार प्रतिस्पर्धा से कीमतें नियंत्रित होंगी, उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर होगी और आम आदमी की आजादी बढ़ेगी। दुनिया भर में उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि बिजनेस करने की स्वतंत्रता का उल्टा संबंध भ्रष्टïचार सूचकांक से है। इसका आशय यही है कि सर्वाधिक भ्रष्ट देश वह हैं जहां सरकारें बिजनेस पर नियंत्रण रखती हैं अथवा बाजार पर उनका बहुत अधिक हस्तक्षेप है।
 
2011 में दुनिया के 10 में से 7 सबसे कम भ्रष्ट देश बिजनेस फ्रीडम वाले देशों की सूची में शीर्ष 10 में शामिल थे। इनमें न्यूजीलैंड, सिंगापुर, डेनमार्क, कनाडा, स्वीडन और फिनलैंड शामिल हैं। 10 सर्वाधिक भ्रष्ट देश इस सूची में सबसे निचले पायदान पर हैं। भारत को इसमें बहुत ही खराब 167वां स्थान मिला और भ्रष्टïचार सूचकांक वाले देशों में भी भारत 95वें स्थान पर है। स्कैंडिनेवियाई देशों जहां से भारत ने लोकपाल की धारणा ली है, में सर्वाधिक बिजनेस स्वतंत्रता है और वे सबसे कम भ्रष्ट हैं। बावजूद इसके भारतीय सोचते हैं कि वे अपने गौरवपूर्ण लोकतंत्र के कारण आजाद हैं। अंत में प्रधानमंत्री मोदी का आकलन रोजगार निर्माण, महंगाई पर नियंत्रण और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने से होगा। बाजार व्यवस्था पूर्ण नहीं है, लेकिन किसी भी अन्य विकल्प से बेहतर है। यदि मोदी हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को बदलने में कामयाब हुए तो अभिलाषी भारत समाजवादी पाखंड की छाया से अंतत: मुक्त हो सकेगा और बाजारवादी व्यवस्था पर भरोसे की शुरुआत होगी।  
 
 
- गुरचरण दास
 (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
गुरचरण दास

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