पीएनबी घोटाला और फ्रेडरिक बास्तियात की भविष्यवाणी

मामा मेहुल चौकसी और भांजे नीरव मोदी की जोड़ी ने देश के सरकारी बैंकिंग सिस्टम की जड़ें हिला दी हैं। 11,600 करोड़ से ज्यादा का ये घोटाला आजकल देश में हर किसी की जुबान पर है। कोई इसे चटखारे लेकर बयान कर रहा है तो किसी ने इसे अपनी राजनीति चमकाने का हथियार बना लिया है। हैरत ये है कि कैसे फर्जी गारंटियों के दम पर बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से बैंकिग सिस्टम को भेद नीरव मोदी चूना लगाकर फरार हो गया। अपने आपको गर्व से देश का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक कहने वाला पंजाब नेशनल बैंक अब खिसयाए अंदाज में सफाई दे रहा है। पर क्या ये मुमकिन है कि आज हो रही है ऐसी घटनाओं को 168 साल पहले किसी शख्स ने भांप लिया था? जी हां उस शख्स का नाम था फ्रेडरिक बास्तियात।

महान फ्रांसीसी अर्थशास्त्री और पत्रकार फेडरिक बास्तियात ने सन 1850 में फ्रेंच भाषा में लिखी किताब ‘द लॉ’ में रेट सीकिंग यानि लाभ पहुंचाने वाले बिन्दुओं को विस्तार से बताया है। बास्तियात ने लिखा है कि सरकार जानबूझकर ऐसी योजना बनाती है जिससे एक वर्ग विशेष को लाभ पहुंचाया जाए। यहां गौर करने वाली बात ये है कि नीरव मोदी ने अपनी धोखाधड़ी का निशाना सरकारी बैंकों को बनाया है इसलिए सरकार के सुर धीमे हैं और वो रक्षात्मक मुद्रा में है लेकिन अगर ऐसा प्राइवेट बैंकों के साथ होता तो सरकार आक्रामक भूमिका में होती। यहां एक बात ये भी गौर करने वाली है कि प्राइवेट बैंकों में ऐसा ही शायद ही होता क्योंकि सरकारी और प्राइवेट बैंकों में काम का माहौल और काम करने का तरीका अलहदा है।

इस समय देश में पेट्रोल और डीजल के दाम अपने सर्वोच्च स्तर पर हैं। हर तरफ इसका शोर है। लोगों में गुस्सा है कि पेट्रोल डीजल के दाम क्यों बेइंतहा बढ़ते जा रहे हैं। अब जरा फेडरिक बास्तियात कि ‘द लॉ’ में लिखी इस बात पर गौर कीजिये। वो लिखते हैं कि “कानून सम्मत लूटखसोट को अनगिनत तरीके से अमल में लाया जाता है। इसके तहत अनगिनत योजनाएं लाई जाती हैं। जैसे मूल्य दर, नए कर और नई कर योजनाएं। बास्तियात की इस बात को अब मौजूदा नई टैक्स प्रणाली जीएसटी के नजरिये से देखिये। सरकार ने पुराने टैक्स सिस्टम को खत्म कर वस्तुओं पर टैक्स की चार नई दर बनाकर जीएसटी को पूरे देश मे लागू कर दिया है लेकिन इससे पेट्रोलियम उत्पादों और शराब को बाहर रखा है। जीएसटी जब कानून सम्मत है और सभी वस्तुओं पर लागू है तो पेट्रोलियम और शराब उत्पादों पर क्यों नहीं? वजह है राजस्व। केन्द्र और राज्य सरकारों का एक बड़ा हिस्सा उन दो उत्पादों पर लगे कई टैक्सों से मिलता है। सरकारों को डर है कि अगर इन्हें जीएसटी में शामिल कर लिया गया तो राजस्व के एक बड़े हिस्सें से उन्हें हाथ धोना पडेगा। सरकार अपनी तिजोरी भरती जा रही है, आवाम कष्ट में है उसे इससे कोई सरोकार नहीं।   

एक अच्छा अर्थशास्त्री वो होता है जो सरकार की नीतियों को आने वाले समय से पहले ही भांप लेता है। इस मामले में फेडरिक बिलकुल खरे उतरते हैं। फेडरिक बास्तियात ने ‘द लॉ’ में लिखा है कि जनता के दिमाग में यह धारणा होती है कि न्याय का समर्थन करना कानून की प्रवृति है और सबके लिए वह एक जैसा व्यवहार करता है। हम सभी की ये दृढ़ मान्यता होती है कि जो कुछ भी कानूनी है वह अवश्यभामी तौर पर न्यायसंगत है। लेकिन असल में ऐसा होता नहीं है। वो लिखते हैं कि राजनैतिक कृपा हासिल करने के लिए गुटबंदी करने की घटना वे स्वयं को लूटपाट का शिकार होने से बचाने के लिए राजनैतिक गतिविधियों से जुड़ने व संरक्षण प्राप्त करने की घटना के लिए इस्तेमाल की जाती है। मिसाल के तौर पर स्टील उत्पादक उद्योग स्टील की ऊंची कीमत के लिए लॉबिंग करते हैं जबकि स्टील का प्रयोग करने वाले उद्योग जैसे की ऑटोमोबाइल उद्योग आदि स्टील की ऊंची कीमतों के विरोध में लॉबिंग करेंगे।      

फेडरिक बास्तियात कहते हैं कि इंसान अन्य व्यक्तियों की योग्यताओं और उत्पादों पर नियंत्रण कर भी सुखी और आनंदित रह सकता है। यहीं से लूटखसोट वाली प्रवृति की शुरुआत होती है। वो कहते हैं व्यापारियों के राजनीतिक जोड़तोड़ के लिए धूर्तबाजी करने में ज्यादा समय और प्रयास व्यतीत किया जाता है। बास्तियात की ये बात कुछ साल पहले के उड्ड्यन जगत के एक नियम के लिए सटीक बैठती है। एविएशन इंडस्ट्री में जून 2016 पहले तक इंटरनेशनल रूट पर देश की वहीं एयरलाइंस उड़ान भर सकती थी जिसके पास पांच साल का अनुभव और 20 एयरक्राफ्ट हों। इस नियम को पांच-बीस (फाइव ट्वेंटी) के नियम से जाना जाता था। ये नियम ऐसा था कि कुछ अच्छी एयरलाइंस जोकि बेहतरीन काम कर रही है लेकिन पांच साल का विमान सेवा प्रदान करने का अनुभव नहीं है तो इंटरनेशनल रूट पर उड़ान सेवा शुरू नहीं कर सकतीं। आरोप लगता था कि ये नियम कुछ प्रभावशाली लोगों ने नई एयरलाइंस कंपनी को उड्डयन जगत में आने से रोकने के लिए बनवाया था। इस नियम का ज्यादा विरोध होने पर सरकार ने जून 2016 में पांच साल के अनुभव की बंदिश को हटा दिया। अब कोई भी एयरलाइंस जिसके पास बीस एयरक्राफ्ट है वो अंतरराष्ट्रीय रूट पर उड़ान भरने के लिए कुछ शर्तों के साथ आवेदन कर सकती है।

इस महीने की पांच तारीख को दिल्ली से सटे नोएडा में यूपी पुलिस के एक ट्रेनी सब इंस्पेक्टर ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर से एनकाउंटर के नाम पर दिन दहाड़े एक युवा जिम ट्रेनर को गोली मार दी। सब इंस्पेक्टर नया नया पुलिस में भर्ती हुआ था और ट्रेनिंग के दौरान ही उस पर प्रमोशन का भूत सवार हो गया। किसी असली अपराधी से टकराने की तो उसकी हिम्मत हुई नहीं लिहाजा एक बेकसूर नौजवान की गर्दन में गोली मार दी। नौजवान अब भी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। मीडिया में मामला उछला तो आला अफसर नींद से जागे और ट्रेनी सब इंस्पेक्टर समेत चार को निलंबित कर सब इंस्पेक्टर को जेल भेज मामले को रफा दफा किया गया।

इस बाबत फ्रेडरिक बास्तियात ने अपनी किताब में लिखा है कि “किसी निजी सेना को किसी दूसरे व्यक्ति की निजता, स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार मे हस्तक्षेप का कानूनी अधिकार नहीं हो सकता। ठीक उसी प्रकार किसी सामूहिक (सार्वजनिक अथवा सरकारी) सेना को अन्य व्यक्तियों की निजता, स्वतंत्रता और संपत्ति को क्षति पहुंचाने का कानूनी अधिकार नहीं दिया जा सकता।“

फ्रेडरिक बास्तियात को अर्थशास्त्री और पत्रकार के रूप में जाना जाता है लेकिन ‘द लॉ’ को पढ़ने के बाद मेरा मानना है कि बास्तियात दूरदर्शी भी थे। देश में किसानों की दुर्दशा एक बड़ी समस्या है। देश का पेट भरने वाला किसान आज भूखा मर रहा है। सूखे और कर्ज के मकड़जाल में वो इस कदर उलझा है कि उसे खुदकुशी ही आखिरी रास्ता नजर आता है। फ्रेडरिक बास्तियात इस समस्या पर द लॉ में लिखते हैं कि “जब हम समृद्ध होते हैं तो हमें सरकार को अपनी सफलता के लिए धन्यवाद देने की जरूरत नही पड़ती। किन्तु जब बदकिस्मती से कोई आपदा आ जाए जैसे हमारे किसानों पर ओले या पाले की मार पड़ जाए हमें किसी प्रकार के कर आरोपित करने के बारे मे सोचना भी नहीं चाहिए”। पर ऐसा नहीं है। मुसीबत के वक्त सरकार किसानों की मदद नही करती। उनके लिए योजनाएं बनती भी हैं तो वो कागजों पर ही मौजूद रहती हैं और किसान बेचारा थक हार कर सूली पर चढ़ जाता है।

फ्रेडरिक बास्तियात कहते हैं कि कानून लोगों को बड़ी ही चतुराई से भाईचारा, एकता, संगठन और संघ आदि मोहक नाम पर भटकाता है। यहां तक कि ये स्वयं को भी गलतफहमी में डाले रखता हैं। फ्रेडरिक की ये बात मौजूदा समय में चल रहे लव जेहाद, वर्ग विशेष पर जबरदस्ती वंदेमातरम गाने का दवाब डालने के नजरिये से समझी जा सकती हैं। बास्तियात कहते हैं चूंकि हम कानून से केवल न्याय की उम्मीद रखते हैं अत यह आरोप लगाया जाता है कि कि भाई चारे, एकता, संगठन और संघ आदि की भावना को स्वीकार नहीं करते और इस प्रकार हमारी ब्रांडिंग व्यक्तिवादी होने के तौर पर की जाती है।

फ्रेडरिक बास्तियात की ये किताब समाज का आइना है। किताब बताती है कि समाज में हो रही दिन प्रतिदिन की घटनाएं आम नहीं है। उनके तार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और कहीं ना कहीं किसी का हित साध रहे हैं। ऊपरी रूप से उन्हें कानून के ताने बाने में पिरो दिया जाता है जिससे उन्हें मानना सबका उत्तरदायित्व हो जाता है। बास्तियात की ये किताब कई भाषाओं के बाद अब हिन्दी में भी आम लोगों के लिए उपलब्ध है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के लिए इसे अविनाश चन्द्र ने देश के एक बड़े भूभाग में बोली जाने वाली आमजन की भाषा हिन्दी में प्रस्तुत किया है। किताब की भाषा सहज और सरल होने के कारण उसे आज के परिवेश से आसानी से जोड़ा और समझा जा सकता है।

- नवीन पाल (लेखकः वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)

नवीन पाल

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