बजट से पहले हलुआ

अभी बजट के गोपनीय दस्तावेजों की छपाई शुरू हुई, तो उससे ठीक पहले हलुआ बनाया गया। तस्वीर आई कि वित्त मंत्री कड़ाहे में अलट-पलट कर रहे हैं। आसपास कुछ सहयोगी खड़े हैं और मिठास के मारे मुस्करा रहे हैं।
 
मिठास की मारी मुस्कराहट उस मुस्कराहट से अलग होती है, जो मिठास से जिलाए जाने पर आती है। तस्वीर के कैप्शन से पता चलता है कि यह परंपरा का हिस्सा है। हर बजट के पहले जब दस्तावेजों की छपाई का मुहूरत हो, हलुआ बनता है, देश के वित्त मंत्री चखते हैं, स्टाफ में बंटता है। मिठास का स्तर क्या था, यह स्टाफ बता नहीं सकता, क्योंकि गोपनीयता के तहत, जब तक बजट नहीं आ जाता, वह किसी से बात नहीं कर सकता।
 
कल्पना कीजिए, दस्तावेज छप रहा है। हलुआ मुंह में घुल रहा है कि एक सज्जन की नजर टैक्स वाले पन्ने पर ठहर जाती है। शक्कर पर टैक्स डबल होने जा रहा है, मैदे-सूजी पर तिगुना प्रस्तावित है और घी डेढ़ गुने पर टिकाया गया है। सज्जन का मुंह जो है, खुला का खुला रह जाता है। जितना हलुआ घुला है, उसका स्वाद गायब हो गया है। दस्तावेज हाथ में हैं और घर पर बनने वाले हलुए की काल्पनिक तस्वीर में उन्हें घी गायब, सूजी जलती हुई और शक्कर आधी होती हुई दिख रही है। पत्नी क्रोध से फुंफकार रही है कि खुद तो हफ्ते भर गोपनीयता के खाते में बंद होकर हलुआ खाए गायब रहे, अब हमारा हलुआ गायब करके लौटे हो। सज्जन घबरा जाते हैं। बाकी स्टाफ उन्हें देखता है। चेतना लौटती है। सब हंसते हैं। दस्तावेज की छपाई चालू है। हंसी भी चालू है। हलुआ बंट रहा है।
 
वित्त मंत्री जो हलुआ चखकर निपटे हैं, जानते हैं कि भविष्य के हलुए का क्या होने वाला है। देश जानता है कि वित्त मंत्री बड़े दिलचस्प आदमी होते हैं। वह जब हाथ में ब्रीफकेस उठाए सदन में बजट पेश करने घुसते हैं, तो लोगों को लगता है कि पूरा भविष्य चला आ रहा है। उनके मुंह से आने वाले कल पर गाज गिरेगी। कुछ भले आदमी टीवी-अखबारों में बताना शुरू करेंगे कि रुपया आया कहां से और गया कहां। वित्त मंत्री की बीवी को आम आदमी मानकर उनसे पूछेंगे कि आपके चूल्हे का क्या हाल है? जनता इसमें कुछ खास समझ नहीं पाती। उसे जानना है-प्याज आया कहां और गया कहां? रोटी फूली कहां से और जली कहां? वित्त मंत्री के भाषण से उसकी थाली में क्या गिरा? पर उसे अंत तक पता नहीं चल पाता कि उसके पास थाली भी बची या नहीं।
 
हमारे एक अर्थशास्त्री विश्लेषक मित्र हैं। वह हर साल एक लंबा विश्लेषण लिखते हैं। टीवी पर तो खैर वह बोलते ही रहते हैं। बजट का वक्त आता है, तो वह महीने भर पहले से ज्यादा खाना-पीना शुरू कर देते हैं। उनका उत्सव जो ठहरा। इन्फ्रास्ट्रक्चर में,मैन्युफैक्चरिंग में, कॉरपोरेट धंधे में, विकास किधर जाना है-वह तमाम आंकड़े लिए, घात लगाए बैठे हैं। सलाहें तो खैर वह अपने कॉलमों में या टीवी की लंबी-ऊबाऊ भौं-भौं बहसों में हलुआ बनाने की तस्वीर छपने से काफी पहले देना शुरू कर देते हैं। हलुए की तस्वीर के बाद के अनुमानों पर उतर आते हैं। पहले वह समाजवादी सोच के लिए 'विकास दर की बलि' पर बोलते थे। अब सरकार बदल गई है। वह पैंतरा सोच रहे हैं। कॉरपोरेट का भला नहीं हुआ, तो बजट में 'सरकार अपनी छवि के विरुद्ध निराशाजनक' प्रतीत होगी और हो गया तो 'आम आदमी की बलि' पर बोलेंगे।
 
वह कहते हैं, विश्लेषक की बड़ी मुश्किल है। देश उससे उम्मीद लगाकर रखता है कि वह असलियत खोल देगा। अपेक्षाओं के इस भय से वह अधिक खाना-पीना शुरू कर देते हैं, ताकि ऊर्जा और साहस बना रहे। हालांकि आज तक, इतने बजट हो गए, जनता कभी उनके यहां आकर धरने पर नहीं बैठी कि बजट के पहले वित्त मंत्री को और बजट के बाद जनता को उन्होंने क्या दिया, इसे उजागर करो। असलियत यह है कि खाने-पीने से जुटाए साहस को वह बजट के बाद और ऊपर ले जाते हैं। वह बजट के बाद के महीने में और ज्यादा खाते-पीते हैं, क्योंकि उन्हें बजट के बाद के देश के हिसाब के लिए और ज्यादा ऊर्जा चाहिए।
 
मैंने एक बार उनसे पूछा, 'आपने बजट से एक महीने पहले और एक महीने बाद जो शराब पी, उस पर टैक्स का क्या हाल है?'
उन्होंने कहा, 'सच्चा आर्थिक विश्लेषक, कभी अपना बिल अदा नहीं करता। मैं देश के ध्यान में लगा रहता हूं, मेरे बिल का ध्यान देश रखेगा।'
मुश्किल यह है कि देश किस-किसका ध्यान रखे? केजरीवाल के मकान का, वाड्रा की जमीन का, मोदी की काशी का या सेंसेक्स की शाबाशी का?
 
देश हलुए की तस्वीर या ब्रीफकेस लाते वित्त मंत्री का चित्र देखते ही समझ जाता है कि सिर्फ चेहरा थोड़ा बदला हुआ है, बाकी एंगल वही है। हर फोटोग्राफर को आदत हो गई है-जैसे हिल स्टेशन पर फोटो लेने की एक जगह फिक्स होती है, हर वित्त मंत्री का फोटो भी फिक्स होता है। कुछ लोगों का कहना है कि ब्रीफकेस दरअसल खाली होता है और चूंकि वह फोटो में फिक्स हो गया है, इसलिए लाना पड़ता है। वर्ना कोई वित्त मंत्री उसका बोझ नहीं उठाना चाहता। कड़ाही और हलुआ भी फिक्स है। इतिहास गवाह है कि हर बजट के पहले के वित्त मंत्री के फोटो फिक्स थे और बजट के बाद भी। हर बजट, पहले से ज्यादा खराब ही आया और उस खराबी पर हर विश्लेषक पहले से ज्यादा ऊर्जावान ही नजर आया।
 
विश्लेषकों में यह ऊर्जा आती कहां से है? एक तो यह कह सकते हैं कि श्रेय उनके बिल अदा करने वालों को जाता है। दूसरा यह कि वे संत होते हैं। जिस चीज को बाकी लोग सिर्फ हलुआ मानते हैं, वह इनके हाथों 'प्रसाद' हो जाता है।
 
कल्पना कीजिए, हलुए की तस्वीर में विश्लेषक घुस जाए, तो कड़ाहे में अलट-पलट करते वित्त मंत्री क्या करेंगे? स्टाफ कितना मुस्कराएगा और हलुए का स्वाद कितना बदल जाएगा? क्या वह हलुआ जनता के लिए प्रसाद हो जाएगा?
 
प्रसाद श्रद्धा की चीज है। कड़वा हो, तो भी 'कृपा' की अनुभूति देता है।
क्या आप इस 'कृपा' के भरोसे कड़वा निगलना चाहेंगे?
बजट के फिक्स फोटो तक इंतजार कीजिए, विश्लेषक आपके साथ है।
 
 
- यशवंत व्यास
साभारः अमर उजाला.कॉम