क्योँ न गुणवत्ता के आधार पर तय हो निजी स्कूलोँ की फीस

निजी स्कूलोँ को उनके क्लासरूम के आकार के हिसाब से जज करने के बजाए उनके रिजल्ट के आधार पर क्योँ नही जज किया जा सकता है? हमारे लिए लाइब्रेरी के साइज के बारे में जानने के बजाए यह जानना जरूरी क्योँ नही हो सकता है कि बच्चोँ में पढ़ने का कौशल कितना है? हमारे लिए यह तय करना जरूरी क्योँ है कि एक गणित के अध्यापक की योग्यता क्या है, जबकि यह जानना जरूरी है कि उसके छात्र गणित में कितने कुशल हो रहे हैं? प्राइवेट स्कूलोँ को उनके यहाँ उपलब्ध संसाधनोँ और उनकी गुणवत्ता के आधार पर शुल्क लेने की अनुमति मिलनी चाहिए। और सरकार को फीस रीएम्बर्समेंट के पैसे सीधे गरीब बच्चोँ के अभिभावकोँ को कैश में भुगतान करना चाहिए।

“ नियमत: स्कूल की लाइब्रेरी का आकार 14मी गुणा 8मी होना चाहिए और यहाँ कम से कम 1,500 किताबोँ का संग्रह होना चाहिए।“ स्कूल के हेड यानि प्रमुख को महीने में एक बार स्टाफ के साथ मीटिंग करनी चाहिए और पूरे महीने के कार्योँ की समीक्षा के साथ-साथ छात्रोँ के विकास का आंकलन करना जरूरी है।"

“स्कूल के हेड के पास स्नातकोत्तर की डिग्रीके साथ-साथ शिक्षा क्षेत्र से सम्बंधित एक डिग्रीहोना जरूरी है। इतना ही नहीं, यह पद सम्भालने के लिए उसके पास कम से कम 8 वर्षोँ का शैक्षणिक अनुभव अथवा किसी मान्यता प्राप्त हाई स्कूल में 5 वर्षोँ का प्रशासनिक अनुभव होना भी अनिवार्य है।"

ये उन नियमोँ की कुछ बानगी भर हैं जो भारतीय स्कूलोँ के लिए सेंट्रल बोर्ड ऑफ एजुकेशन से मान्यता प्राप्त करने हेतु आवश्यक हैं। अब इन नियमोँ की समीक्षा करते हैं। पहले नियम के मुताबिक, हमारे लिए यह जरूरी नहीं है कि एक स्कूल की लाइब्रेरी में किस तरह की किताबेँ रखी जानी चाहिए, हमारे लिए सिर्फ लाइब्रेरी का आकार ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर हम उपर लिखे अंतिम नियम की बात करेँ तो इसके हिसाब से तो हमारे देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी अगर स्कूल खोलना चाहते तो वह अयोग्य साबित हो जाते। स्कूल चलाना क्या, वह तो बच्चोँ को पढ़ाभी नहीं पाते, क्योंकि उनके पास तो शिक्षा क्षेत्र से सम्बंधित कोई डिग्री ही नहीं थी। 

हम इन नियमोँ का मजाक बन सकते हैं, हम इनपर व्यंग्य कर सकते हैं लेकिन उन उद्यमियोँ के लिए यह कोई मजाक नही है जो स्कूल खोलना चाहते हैं। सीबीएसई सम्बद्धता की रूल बुक 89 पेज की है। एक स्कूल खोलने के लिए आपको 50 तरह के सरकारी मंजूरी की जरूरत होती है। स्कूल खोलने के आपको भूमि अधिग्रहण विभाग, अग्नि सुरक्षा विभाग, कर विभाग, स्थानीय निकाय, राज्य शिक्षा बोर्ड और सेंट्रल एजुकेशन बोर्ड सेतमाम तरह की अनुमतियाँ हासिल करनी होती हैं।जहाँ तक शिक्षा के क्षेत्र की बात है तो हमारे देश में आज भी लाइसेंस राज की समाप्ति नहीं हुई है।

ये नियम हमारे समाज की उस अजीब सनक को दर्शाते हैं जिसके लिए परिणाम से ज्यादा उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है। यह हमारे समाज की उस सोवियत-कालीन मानसिकता का परिचायक है जिसके अनुसार गुणवत्ता एक केंद्रीय सत्ता द्वारा सुनिश्चित की जा सकती है।  किया जा सकता है। वैसे हम सब सोवियत यूनियन के निकम्मे उत्पादोँ से भली-भांति परिचित हैं। और हम यह भी जानते हैं कि आज भी भारतीय स्कूलोँ और कॉलेजोँ से पढ-लिखकर निकले  बेजोजगार युवाओँ की पूरी फौज मौजूद है।
 

हालांकि समानांतर परिणामोँ के बारे में जान पाना कठिन नहीं है।
अत्यधिक नियम और माइक्रोमैनेजमेंट से अच्छे परिणाम सुनिश्चित नहीं किए जा सकते हैं। पीआईएसए (प्रोग्राम फॉर इंटरनैशनल स्टूडेंट असेसमेंट) और टीआईएमएसएस (ट्रेंड्स इन इंटरनैशनल मैथमेटिक्स एंड साइंस स्टडीज) जैसे वैश्विक टेस्ट, जो दुनिया भर के स्कूली छात्रोँ की प्रतिभा के लिए बेंचमार्क माने जाते हैं, में भारत बेहद निचले पायदान पर है। तो इनके आधार पर हमारे कथित बेहतरीन स्कूलोँ की प्रतिभा और गुणवत्ता का कुछ तो अंदाजा लग ही सकता है?

तो अब सवाल यह उठता है कि समाधान क्या है? तो जवाब यह है कि, यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है और न ही इस बारे में हमें कोई पीएचडी करने की जरूरत है और न ही शिक्षाविदोँ की कमिटी गठित कर वर्षोँ चर्चा करने और फिर कोई नतीजा निकालने की आवश्यकता है। इसका जवाब बेहद आसान है, हमेँ कोई विस्तृत दिशानिर्देशन जारी करने के बजाय सिर्फ उन संस्थानोँ को प्रोत्साहित करने की जरूरत है जो अच्छी सेवाएँ दे रही हैं। तकरीबन सभी कम्पनियाँ बेहतरीन सेवाएँ देने का प्रयास करती हैं, क्योंकि ऐसा नहीं किया तो वे जल्द ही अपने ग्राहक और कमाई से हाथ धो बैठेंगी। उदाहरण के तौर पर कोई बैंक अथवा टेलीकॉम कम्पनी, ये अपने सीईओ की नियुक्ति के लिए योग्यताओँ सम्बंधी कोई निश्चित विवरणपत्र जारी नहीं करती हैं। उनके ऑफिस के आकार अथवा मीटिंग को लेकर कोई दिशानिर्देश तय नहीं किया गया है। उन्हे जब जरूरत महसूस होती है तब मीटिंग करते हैं, जो कि एक महीने से भी कम अंतराल में हो ही जाती हैं। बावजूद इसके ये निजी संस्थान हमारे स्कूलोँ से बेहतर ढंग से काम कर रहे हैं। ये बदलाओँ को लेकर ज्यादा सतर्क हैं। जरूरत के समय ये तुरंत सक्रिय होते हैं, क्योंकि ऐसा नहीं किया तो उनसे सेवा का मौका छिन जाएगा।

हम अपने स्कूलोँ को भी इसी तरीके से क्योँ नहीं चलने दे सकते हैं? हमारे निजी स्कूलोँ की क्षमता का आंकलन उनके क्लासरूम के आकार के बजाय उनके छात्रोँ की प्रतिभा और रिजल्ट के आधार पर क्यूँ नहीं हो सकता? हम छात्रोँ की पाठन क्षमता के आंकलन के बजाय लाइब्रेरी के आकार को लेकर क्यूँ चिंतित होते हैं। हम किसी मैथ्स टीचर की न्यूनतम योग्यता सुनिश्चित करने के बजाय उसके छात्रोँ के परिणाम का आंकलन क्यूँ नहीं करते? अगर कोई स्कूल बेहतरीन शिक्षा देगा तो माता-पिता अपने बच्चोँ को स्वतः ही वहाँ भेजेंगे। अगर कोई स्कूल बेहतर परिणाम नहीं दिखाएगा तो छात्र वहाँ अधिक दिन नहीं टिकेंगे और अंततः वह स्कूल बंद हो जाएगा। सीबीएसई को इसे बंद कराने की जरूरत नहीं होगी, मार्केट स्वतः ही परिणाम सामने रख देगा।

हम यह समझ सकते हैं कि परिणाम आधारित पद्धति की कुछ समस्याएँ भी हैं। इसके लिए हमे परीक्षा प्रणाली में भी सुधार की जरूरत होगी, क्योंकि पद्धति के जरिए प्रतिभा का सही आंकलन सम्भव नहीं है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात, हमे सिर्फ साल के अंतिम रिजल्ट के आधार पर आंकलन करने के बजाय निरंतर सुधार के आधार पर निर्णय लेना होगा। कोई भी स्कूल सालोँ तक बेहतर परिणाम देकर अपनी प्रतिष्ठा बनाता है और फिर अच्छे स्टूडेंट उनकी ओर आकर्षित होते हैं और फिर बेहतरीन परिणाम सामने आते हैं। हमे यह पता लगाने का तरीका ढूंढना होगा कि साल-दर-साल बेहतरी के क्या नए उपाय किए गए हैं। इसके लिए सिर्फ प्रत्येक दो वर्ष में एक मानकीकृत टेस्ट का आयोजन करना होगा (कक्षा 3, कक्षा 5 व अन्य कक्षाओँ के लिए) और इसके आधार पर सुधारोँ का आंकलन करना होगा। अमेरिका के तमाम राज्य अपने स्तर पर इस तरह के मानकीकृत टेस्ट आयोजित करते हैं (उदाहरण के तौर पर, कैलिफोर्निया में स्टार टेस्ट), जिसके जरिए वे हर साल अपने बच्चोँ में हो रहे सुधार का आंकलन करते हैं। 

अंततः, बाजार-आधारित पद्धति में समाज के गरीब तबके को बाहर नहीं रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही निजी स्कूलोँ को उनकी गुणवत्ता और संसाधनोँ के खर्च के आधार पर ही लोगोँ से फीस वसूलने का अधिकार मिलना चाहिए। इसका समाधान यह है कि सरकार गरीब बच्चोँ की फीस का रीएम्बर्समेंट स्कूलोँ को देने के बजाय सीधे छात्रोँ के अभिभावकोँ को नकद के रूप में दे। शिक्षा के क्षेत्र में भारी-भरकम सरकारी नियमोँ के बजायबाजार आधारित अदृश्य हाथ बेहतर काम कर सकते हैं।
 

- अर्घ्य बनर्जी
लेखक द लेवलफील्ड स्कूल, सूरी, बीरभूम, पश्चिम बंगाल के संस्थापक हैं।
लेख, लेखक के व्यक्तिगत विचारोँ पर आधारित है।

http://www.financialexpress.com/education-2/why-private-schools-must-be-...

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