प्राइवेट अनएडेड स्कूलों में फीस रेग्युलेशन न्यायालय की अवमानना

अनएडेड प्राइवेट स्कूलों के फीस को रेग्युलेट करना दरअसल, टीएमए पई बनाम कर्नाटक सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 11 सदस्यीय खण्डपीठ के फैसले की अवज्ञा है। सरकार द्वारा अनएडेड प्राइवेट स्कूलों के फीस को रेग्युलेट करना, न केवल संविधान द्वारा उन्हें प्रदत्त संरक्षण का स्पष्ट उल्लंघन है बल्कि निष्प्रभावी और अबाध्यकारी भी है। निसा के माध्यम से हमने इस मुद्दे को उठाया है और बार-बार दोहराया भी है कि ऐसी कार्रवाई माननीय सर्वोच्च न्यायालय 11 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ के निर्णय का अपमान है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना करना है।

राज्यों के शिक्षा विभाग अपने शिक्षा संस्थान अधिनियम के अधीन समय-समय पर शुल्क के नियमन को जाँचते रहते हैं। यह उपक्रम एक ओर तो काफी हद तक स्वीकारयोग्य थी मगर एक कठोर शुल्क की व्यवस्था को स्वीकार्य नहीं किया जा सकता। कर्नाटक एजुकेशन एक्ट, 1983 को ध्यान में रखते हुए दिनांक 26/02/2004 को एसएलपी (सिविल) नम्बर 1265-67/1997 के दौरान माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि सरकारों को अपने विभिन्न प्रावधानों पर पुर्न-विचार टीएमए पई विरुद्ध कर्नाटक राज्य वाले मामले को ध्यान में रखते हुए करने की जरूरत है जिसका उल्लेख (2002) 8 SCC 481 में है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को यह निर्देश भी दिये कि वह चार महीने की अवधि में यह पुनर्विचार करे और आवेदक को यह अनुमति भी दे कि वे सरकार को अपने सुझाव दे व सरकार उन सुझावों को ध्यान में रखकर ही निर्णय ले।

इसी आधार पर एसोसिएटेड मैनेजमेण्ट्स ऑफ प्रायवेट स्कूल्स इन कर्नाटक (KAMS) ने 31 जून 2016 को अपने सुझाव दिये और धारा 48 जिसमें शुल्क का सन्दर्भ है और कहा गया है कि किसी भी मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्था की कार्यकारिणी परिषद ऩ तो कोई उगाही कर सकती है, न कोई शुल्क संग्रहित कर सकती है, न कोई प्रभार लगा सकती है, न चन्दा या कोई अन्य भुगतान किसी भी नाम से ले सकती है और न ही किसी दर पर या फिर या किसी भी ऐसे तरीके से जो प्राधिकृत हो, धन ले सकती है। यह धारा शैक्षणिक संस्था के प्रबंधन पर अनुचित प्रतिबन्ध लगाती है। टीएमए पई मामले में आए फैसले के अनुसार यह बात सामने रखी गई कि प्रबन्धन को उनके द्वारा प्रदान की जा रही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के आधार पर शुल्क निर्धारित करने की और उसे संग्रहित करने की स्वतन्त्रता दी जाये।

दरअसल, दी कर्नाटक एजुकेशनल इन्स्टीट्यूशन (क्लासिफिकेशन, रेगूलेशन एण्ड प्रिस्क्रिप्शन ऑफ  करिक्युला एट्सेट्रा के नियम 10(3)(b) व नियम 1995 के अनुसार, शिक्षण संस्थान कर्मचारियों के वेतन और गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने में होने वाले खर्च के अनुरुप फी तय कर सकते हैं। अतः संस्थान के प्रबंधन को उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर ट्यूशन फीस तय करने का अधिकार दे दिया गया।

हालांकि, कर्नाटक की राज्य सरकार ने "कर्नाटक एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन्स (रेग्यूलेशन ऑफ सरटेन फी एण्ड डोनेशन), रुल 1999 बनाया जो देखने में ही अनुचित, मनमानी पूर्ण, और माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून के विपरीत है। नियम 4 के अनुसार, करिक्युला नियम 1995 के नियम 10(2)(b)(ii) के अन्तर्गत निजी शैक्षणिक संस्थानों में अधिकतम ट्यूशन फी का निर्धारण आकस्मिक आवश्यकताओं और रखरखाव के खर्चे को छात्रों की कुल संख्या से विभाजित कर किया जा सकता है। नियम 1999 में वर्णित शब्द - "शिक्षा की गुणवत्ता" की व्याख्या महज एक अव्यव कि 'ट्यूशन फी का निर्धारण शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर की जाएगी लेकिन शुल्क संरचना छात्रों पर बोझ नहीं होना चाहिए' जैसे आधारहीन तथ्य पर की गई है। हम कानून के दायरे में और भारत के संविधान के अनुच्छेद- 19(1)(g), 26 & 30(1) के अन्तर्गत हमें प्राप्त मौलिक अधिकारों की उम्मीद करते हैं। हम कठोरता के साथ शुल्क के निर्धारण के विरुद्ध हैं और हम केवल नियमन को स्वीकार करते हैं।

जैसा कि आपको ज्ञात ही है कि ज्यादातर संगठन ऐसे सदस्यों से बने हैं जिन्होंने या तो निजी शैक्षणिक संस्थाओं को स्थापित किया है या वे उसके प्रशासक हैं, वो भी कई सालों से या कहिए दशकों से। ये संस्थाएँ गैर-सहायता प्राप्त हैं और स्ववित्त पोषित हैं और जो बेहद लोकप्रिय हैं और उच्च गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान कर रहीं है और न्यूनतम शुल्क लेकर बडी़ आर्थिक रुप से कमजोर और विशेषाधिकृत वर्ग की सेवा कर रहें हैं। हम, किसी शैक्षणिक संस्थान को स्थापित करने उसका प्रशासन करने के लिये अधिकृत हैं और हमें ऐसा करने का अधिकार भारत क़े संविधान से मिला है।

- डी. शशि कुमार (विधिक सलाहकार, निसा)

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