उछालें मारती स्कूली फीस का इलाज क्या है

प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस में की जा रही मनमानी वृद्धि को लेकर पैरंट्स मे खासा आक्रोश है। हर नए साल में 30-40 प्रतिशत फीस बढ़ाना सामान्य बात हो गई है। पैरंट्स की मांग है कि सरकार स्कूल मालिकों की इस मनमानी पर अंकुश लगाए। उनकी मांग सही है। शिक्षा को पूरी तरह बाजार पर नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन, सरकारी दखल की अलग समस्याएं है। पूरे देश में सरकारी स्कूलों की बदहाली बताती है कि सरकारी दखल से प्राइवेट स्कूलों का भी यही हाल हो जाएगा।

पाठ्यक्रम में यह दखल पहले से मौजूद है। फीस में दखल देकर सरकारी महकमा टीचरों के वेतन और सेवा शर्तों आदि पर भी हावी हो जाएगा। तब स्कूल मैनेजमेंट का लापरवाह टीचरों के विरुद्ध कार्रवाई करना कठिन हो जाएगा। शिक्षा के अधिकार का कानून पहले ही प्राइवेट स्कूलों की स्वायत्तता को संकट में डाले हुए है। 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को आयु के अनुसार कक्षा में प्रवेश देने और अनिवार्यतः प्रमोट करने से पूरी क्लास की गति शिथिल पड़ रही है। फीस पर नियंत्रण से यह सिलसिला कहीं और ही पहुंच जाएगा। सरकारी महकमे के लिए प्राइवेट स्कूलों पर नियंत्रण लाभ का सौदा है। उनके लिए नं॰ 2 की आय का एक और स्रोत खुल जाएगा।

फीस और क्वॉलिटी

समस्या की तह मे पैरंट्स की यह सोच है कि ऊंची फीस वसूल करने वाले स्कूल में शिक्षा की क्वालिटी अच्छी होती है। लेकिन ऊंची फीस और अच्छी शिक्षा का संबंध संदिग्ध है। दुबई में दो श्रेष्ठ स्कूल दुबई मॉडर्न हाई स्कूल तथा इंडियन हाई स्कूल हैं। दुबई मॉडर्न किंडरगार्टेन में 28 हजार दिरहम की सालाना फीस वसूलता है, जबकि इंडियन हाई स्कूल मात्र 4 हजार दिरहम। फिर भी दोनों का स्तर एक सा माना जाता है।

इसी प्रकार अबूधाबी के शिक्षा विभाग द्वारा रैफल्स वर्ल्ड अकैडमी तथा अल दियाफा हाई स्कूल दोनों की क्वॉलिटी 'गुड' आंकी गई थी। रैफल्स की सालाना फीस 26 हजार दिरहम और अल दियाफा की सिर्फ 10 हजार दिरहम है। इससे पता चलता है कि कम फीस पर भी अच्छी क्वॉलिटी की शिक्षा मुहैया कराई जा सकती है।

युनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया के प्रो. जान मैकडरमॉट कहते हैं कि 'एक न्यूनतम स्तर के आगे प्रति स्टूडेंट खर्च बढ़ाने से टेस्ट में सफलता पर प्रभाव नही पड़ता है। शैक्षिक प्रदर्शन में घरेलू पृष्ठभूमि और दूसरी सामाजिक स्थितियों की भूमिका ज्यादा होती है।' अमेरिका में वाबाश नैशनल स्टडी द्वारा 10 कालेजों का अध्ययन किया गया जिनकी शैक्षणिक उपलब्धि बराबर थी। पाया गया कि इनके प्रति स्टूडेंट खर्च में 6 गुने तक का अंतर था। 

भारत के संदर्भ में ऐसे अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं परंतु मुझे भरोसा है कि यहां भी जमीनी स्थिति ऐसी ही है। आखिर लालबहादुर शास्त्री किसी फाइव स्टार स्कूल में नही पढ़े थे। पैरंट्स को फीस के बजाय शिक्षा की क्वॉलिटी पर ध्यान देना चाहिए। जरूरत स्कूलों की क्वॉलिटी रैंकिंग की है, जिस प्रकार होटलों को स्टार रैंकिग दी जाती है। सरकार को चाहिए कि कानून बनाकर ऐसे मूल्यांकन कराए। स्कूलों के लिए फीस वृद्धि करने के 6 माह पहले नोटिस देना अनिवार्य बना देना चाहिए ताकि पैरंट्स अगर चाहें तो कम फीस वाले स्कूल में बच्चे का दाखिला करा सकें। परंतु स्कूलों की स्वायत्तता में दखल नहीं देना चाहिए।

स्कूलों की मुनाफाखोरी अंततः बाजार द्वारा नियंत्रित कर ली जाएगी। वर्तमान समय बदलाव का है। पैरंट्स को शिक्षा का महत्व समझ आ रहा है। बच्चे का भविष्य संवारने के लिए वे खर्च करने को तैयार है। ऐसे में कुछ अग्रणी स्कूलों द्वारा ऊंची फीस वसूल की जा रही है। लेकिन, जैसा ऊपर बताया गया है, ऊंची फीस से क्वॉलिटी स्थापित नहीं होती है। यह फीस एयर कंडीशंड ऑडिटोरियम जैसी ऊपरी सुविधाओं में खप जाती है। ऐसे में ऊंची फीस को थोड़े समय का संकट मानना चाहिए। समय बीतने के साथ कई दूसरे स्कूल खड़े हो जाएंगे, जो कम फीस में उतनी ही अच्छी शिक्षा उपलब्ध करा देंगे। 

अंततः इन स्कूलों की होड़ से ही अग्रणी स्कूलों की फीस पर लगाम लगेगी। बाजार को फीस पर नियंत्रण करने देना चाहिए। इससे शिक्षा की क्वालिटी पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा। स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए नई कालोनियों मे एक के बजाय तीन स्कूलों के लिए प्लाट आवंटित करने चाहिए। 

पारदर्शिता है इलाज

पैरंट्स द्वारा स्कूलों की क्वॉलिटी को सही ढंग से परखा जा सके इसके लिए 'शिक्षा पारदर्शिता कानून' बनाना चाहिए। हर स्कूल के लिए खुद से जुड़ी सारी सूचनाएं वेबसाइट पर डालना अनिवार्य बना देना चाहिए- जैसे पिछले पांच वर्ष में बोर्ड परीक्षाओं का रिजल्ट, टीचरों की संख्या, शैक्षणिक योग्यता तथा वेतन, टीचरों द्वारा हासिल किए गए अवॉर्ड्स, स्टूडेंट-टीचर रेशियो, स्कूल मे उपलब्ध सुविधाएं तथा स्कूल की बैलेन्स शीट। स्कूल को मुनाफा कमाने की छूट हो, परंतु इसे बताना अनिवार्य बना दिया जाए तो पैरंट्स वस्तुस्थिति को समझ सकेंगे।

स्कूलों को सरकार द्वारा रियायती दर पर भूमि उपलब्ध कराई जाती है और आयकर में छूट दी जाती है। इन स्कूलों की फीस सरकार, पैरंट्स तथा मैनेजमेंट, तीनों की भागीदारी से नियंत्रित की जानी चाहिए। इससे सरकारी सुविधाओं के दुरुपयोग से बचा जा सकेगा। इनके खातों का आडिट कराकर उसे सार्वजनिक करना चाहिए। लेकिन, सभी प्राइवेट स्कूलों की फीस पर नियंत्रण करने के चक्कर में हमें शिक्षा की क्वॉलिटी का सत्यानाश नहीं होने देना चाहिए।

- भरत झुनझुनवाला
साभारः नवभारत टाइम्स

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