आरक्षण पर बगल के बांग्लादेश से सीखो सबक

सीमापार से खबर अच्छी आई है। बांग्लादेश सरकार ने देश में सरकारी सेवाओं में आरक्षण की व्यवस्था को खत्म करने का फैसला किया है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 11 अप्रैल को संसद में सरकारी नौकरियों में आरक्षण को खत्म करने का ऐलान किया । बांग्लादेश में आरक्षण नीति के खिलाफ हजारों छात्र विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। ढाका यूनिवर्सिटी से आरक्षण व्यवस्था को लेकर आंदोलन शुरू हुआ और धीरे धीरे पूरे बांग्लादेश में फैल गया। प्रदर्शकारियों का पुलिस से टकराव भी हुआ जिसमें 100 से ज्यादा छात्र घायल हुए। सरकार को छात्रों की मांगों के आगे झुकना पड़ा और आरक्षण खत्म हो गया। हालांकि सरकार ने विकलांग और पिछड़े अल्पसंख्यकों की सरकारी नौकरियों में नामुइंदगी पक्की करने के लिए सरकार नई व्यवस्था लाने का वादा किया है।

26 मार्च 1971 में आजाद होने के बाद बांग्लादेश में कोटा सिस्टम साल 1972 में एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से लागू किया गया। अब तक कई बार इसमें संशोधन किया जा चुका है। आरक्षण खत्म होने से पहले बांग्लादेश में 44 फीसदी लोगों को योग्यता के आधार पर सरकारी नौकरी मिलती है और बाकी 56 प्रतिशत भर्ती विभिन्न कोटे के तहत होती थी। 56 फीसदी रिजर्व कोटे में 30 प्रतिशत स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों और नाती-पोतियों, 10 प्रतिशत महिलाओं, 10 फीसदी पिछड़े जिलों के लोगों के लिए, पांच फीसदी स्वदेशी समुदायों के सदस्यों के लिए और बाकी एक प्रतिशत शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के लिए आरक्षित था।

शीतल हवा जब पड़ोस से चली है तो झोके दिल्ली तक महसूस किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि जब पड़ोसी मुल्क इस तरह का साहसी कदम उठा सकता है तो देश में ये क्यों नहीं संभव है? आरक्षण के मौजूद स्वरूप को खत्म किया जाए और अगर जरूरत है तो आर्थिक आधार को आरक्षण को पैमाना बनाया जाए।

ऐसा ही नहीं की आरक्षण व्यस्था सिर्फ भारत या इसके आस पड़ोस के देशों में ही है। विकसित देशों अमेरिका, रूस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया के साथ जापान, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका में भी आदिवासी लोगों के लिए नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान है। इसके पीछे की सोच वही है कि समाज के ताने बाने में पीछे छूट गए लोगों को भी बराबरी पर लगाया जा सके।

दुनिया में शायद भारत एक मात्र ऐसा देश है जहां जाति आधारित आरक्षण का प्रावधान है। ज्यादातर लोगों की सोच है कि देश में आरक्षण आजादी के बाद शुरू हुआ पर ऐसा नहीं है। अंग्रेजों ने सबसे पहले 1882 में हंटर कमीशन से आरक्षण की शुरुआत की। इसके बाद महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्ग से गरीबी दूर करने और राज्य प्रशासन में उन्हें उनकी हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षण प्रारम्भ किया । कोल्हापुर राज्य में पिछड़े वर्गों और समुदायों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिए 1902 की अधिसूचना जारी की।  देश में सबसे पहले आरक्षण लागू करने वाले कोल्हापुर नरेश छत्रपति साहू जी महाराज को “आरक्षण का जनक” कहा जाता है। यह अधिसूचना देश में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण मुहैया कराने वाला पहला सरकारी आदेश है। 1919 में भारत सरकार अधिनियम में आरक्षण का प्रावधान किया गया। 1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी ने जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया, जिसमें गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए आठ प्रतिशत आरक्षण दिया गया था।

अंग्रेजों ने अपनी सत्ता का प्रयोग करते हुए 1932 में एक सांप्रदायिक बंटवारे के तहत दलितों और अन्य धर्मों को बांट दिया। महात्मा गांधी ने इसका विरोध किया लेकिन बाद में वो इस मुद्दे पर आंबेडकर के साथ समझौते के लिए तैयार हो गए। आरक्षण की लड़ाई में संविधान सभा में एक वोट की कमी से आरक्षण प्रस्ताव पारित नही होने पर डॉ. आंबेडकर के सामने अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण देने संबंधी गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई थी, लेकिन अपनी तर्कशक्ति का प्रयोग कर वो धारा 10 में संशोधन करने में कामयाब रहे, जिसका नतीजा आरक्षण है। जिसके तहत उस समय अनुसूचित जाति को 12.5 फीसदी और अनुसूचित जनजाति को पांच फीसदी आरक्षण मिला। इसके बाद 25 मार्च 1970 को अनुसूचित जाति का आरक्षण 12.5 से बढाकर 15 प्रतिशत तथा अनुसूचित जनजाति का आरक्षण पांच से बढाकर 7.5 प्रतिशत कर दिया गया।  

1979 में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए मंडल आयोग बनाया गया। 1990 में इस आयोग की सिफारिशों को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण दे दिया गया । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। बशर्ते, यह साबित किया जा सके कि वे औरों के मुकाबले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं। 1950 में 10 साल यानि सन 1960 तक अनुसूचित जाति के लिए 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति के लिए साढे सात फीसदी आरक्षण की बात कही गई थी। धीरे-धीरे इसे खत्म करने की बजाय मंडल कमीशन की सिफारिश पर इसमें और इजाफा करते हुए ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया। इस तरह कुल मिलाकर ये आरक्षण राष्ट्रीय स्तर पर 49.5 फीसदी तक पहुंच गया। जबकि राज्यों में स्थानीय जनजाति और जनसंख्या को देखते हुए आरक्षण की ये सीमा अलग अलग है।

आरक्षण के इन प्रावधानों को लगातार बढ़ाते हुए अब 2020 तक कर दिया गया है। आजादी के बाद से मदद का यह रवैया न केवल बढ़ता गया है बल्कि इसका दायरा और स्तर भी इतना बढ़ चुका है, जितना कि हमारे संविधान निर्माताओं ने कल्पना तक नहीं की होगी।

17 मार्च 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने जाट आरक्षण पर केंद्र के फैसले को अवैध करार देते हुए अपने ऐतिहासिक फैसले में संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) की फिर से व्याख्या करते हुए साफ किया कि देश की आरक्षण नीति से जुड़े तमाम पहलुओं पर गंभीरता के साथ चर्चा हो। प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए अगर लिंग, समुदाय या क्षेत्र आधारित आरक्षण दिया जाता है, तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता, लेकिन आरक्षण के इस प्रावधान के तहत योग्यता को दरकिनार करने का ही परिणाम है कि ब्रेन ड्रेन को लगातार बढ़ावा मिल रहा है।

इसी विषय पर टिप्पणी करते हुए पूर्व वाणिज्य सचिव और अमेरिका में देश के राजदूत रहे आबिद हुसैन ने कहा था प्रतिभा के नष्ट होने से बेहतर है कि वह पलायन कर जाए। आबिद साहब की बात ठीक थी। आजकल हो ही वो रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा समेत कई विकसित देशों में हर क्षेत्र में भारतीय युवा अपना लोहा मनवा चुके हैं और वहां की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दे रहे हैं जिसे वहां की सरकारें भी समय समय पर मानती रही हैं। ये वो ही युवा हैं जिन्हें आरक्षण जैसी बाधाओं के कारण भारत में मौके नहीं मिले तो उन्होंने विदेश की उड़ान पकड़नी ही बेहतर समझी।

डॉ आंबेडकर ने कहा था कि “दस साल में यह समीक्षा हो कि जिनको आरक्षण दिया जा रहा है क्या उनकी स्थिति में कुछ सुधार हुआ कि नहीं? उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप में कहा यदि आरक्षण से यदि किसी वर्ग का विकास हो जाता है तो उसके आगे कि पीढ़ी को इस व्यवस्था का लाभ नही देना चाहिए क्योकि आरक्षण का मतलब बैसाखी नही है जिसके सहारे आजीवन जिंदगी जिया जाये, यह तो मात्र एक आधार है विकसित होने का। आंबेडकर बुद्धिमान व्यक्ति थे। वो जानते थे कि ये आरक्षण बाद में नासूर बन सकता है इसलिए उन्होंने इसे कुछ वर्षो के लिए लागू किया था जिससे कुछ पिछड़े हुए लोग समान धारा में आ सके। आंबेडकर ने ही इसे संविधान में हमेशा के लिए लागू क्यूँ नहीं किया? लेकिन मौजूद सरकारें अपने वोट बैंक के लिए आरक्षण की मियाद को लगातार बढ़ाती जा रही हैं।

कोई भी सरकार आरक्षण हटाने के लिए तैयार नहीं। हटाना तो दूर इस मद्दें पर बात करना भी किसी पार्टी को गंवारा नहीं है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कुछ इस तरह के संकेत दिए तो बीजेपी को हार का सामना करना पडा और हार का ठीकरा भागवत के सिर फोड़ दिया गया। इसके बाद से बीजेपी भी इस पर बात करने से कन्नी काट रही है।

दिक्कत ये है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जाति की जनसंख्या करीब 19 करोड़ है जो देश की कुल आबादी का 17 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति की आबादी 10 करोड़ है और कुल जनसंख्या का करीब नौ फीसदी है। यानि देश में दलितों की कुल आबादी 29 करोड़ है जोकि कुल आबादी का 25 प्रतिशत है। वहीं ओबीसी कुल जनसंख्या का 41 फीसदी हैं। इस तरह दलित और ओबीसी को मिलाकर ये आंकडा 66 फीसदी तक पहुंच जाता है। और देश की 66 फीसदी आबादी को नाराज करने का जोखिम कोई पार्टी नहीं उठाना चाहती। भले ही आरक्षण के कारण योग्य लोगों को नौकरी नहीं मिल रही हो और प्रतिभा होते हुए भी उन्हें खाक छाननी पड़ रही हो।

आरक्षण के कारण पैदा हुई खाई ने देश के सामाजिक ताने बाने को भी नुकसान पहुंचाया है। इस महीने के शुरुआती दस दिनों में दो भारत बंद हुए। पहले बंद में असल मुद्दा एससी, एसटी एक्ट में बदलाव था लेकिन आरक्षण समर्थकों ने ये सोचकर सरकारी संपत्ति को आग के हवाले कर दिया की सरकार आरक्षण खत्म करने जा रही है। इसके एक हफ्ते बाद आरक्षण विरोधी दूसरा धड़ा मैदान में उतर आया और जमकर आगजनी की। नुकसान किसी और का नहीं बल्कि हम सभी का हुआ, देश का हुआ। सरकार अगर पड़ोसी देश से सबक ले इस दिशा में कदम बढ़ाती है उसे देर आए, दुरुस्त आए सरीखा बोल्ड कदम माना जाएगा।

- नवीन पाल (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)

नवीन पाल

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