शिक्षा क्षेत्र में समान मूल्यांकन प्रणाली से होगी गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी

इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी क्षेत्र में, चाहें वो सेवा का क्षेत्र हो अथवा उत्पादन का, जबतक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा वाली स्थिति नहीं होती है तबतक गुणवत्ता और पारदर्शिता दोनों का अभाव बना रहता है। प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ गुणवत्ता और पारदर्शिता के लिए मूल्यांकन का होना नितांत आवश्यक है। आज जब प्रश्न शिक्षा में गुणवत्ता का उठता है तो बहस को सरकारी बनाम निजी स्कूल की तरफ मोड़ देने का चलन है। यह मुद्दे से ध्यान भटकाने वाली स्थिति भर है। सवाल यह कभी नहीं होना चाहिए कि शिक्षा सरकारी हो या प्राइवेट? सवाल यह होना चाहिए कि शिक्षा गुणवत्ता से परिपूर्ण हो और उसका सतत एवं पारदर्शी मूल्यांकन किया जा सके। बहस इस बात पर भी होनी चाहिए कि मूल्यांकन की नीति न्यायसंगत हो जो समान रूप से हर एक विद्यालय पर लागू हो रही हो। सरकार के विद्यालयों के लिए अलग मानदंड, छोटे निजी विद्यालयों के लिए अलग मानदंड और बड़े बजट के विद्यालयों के लिए अलग मूल्यांकन के मानदंड नहीं होने चाहिए। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समान मूल्यांकन की पारदर्शी प्रक्रिया को स्थापित करने की बजाय हमारी पूरी बहस सरकारी बनाम प्राइवेट पर जाकर टिक जाती है। जबकि व्यवहारिक पक्ष यह है कि इस जिद के पीछे कोई तर्क नहीं है कि हर हाल में बिना किसी मूल्यांकन और प्रतिस्पर्धा के सरकारी विद्यालयों को ही बेहतर करने का प्रयास किया जाय न कि उन्हें समान रूप से निजी विद्यालयों से प्रतिस्पर्धा के लिए सज्ज किया जाय!

शिक्षा के अधिकार कानून के तहत सरकार का यह दायित्व है कि वह चौदह साल तक के हर बच्चे को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराये। हालांकि यहाँ जिसे ‘मुफ्त’ कहा जा रहा है, व्यवहारिक तौर पर वह मुफ्त नहीं है बल्कि कोई न कोई (करदाताओं के पैसे से सरकार) उस खर्चे को उठा रही है। बावजूद इसके अभिभावकों का रुझान प्राथमिक शिक्षा के मामले में सरकारी विद्यालयों के प्रति कम हो रहा है। अगर नामांकन बढ़ भी रहा है तो उपस्थिति के आंकड़े निराशाजनक आ रहे हैं। जबकि इसके उलट निजी विद्यालयों में कुछ भी मुफ्त जैसा ऑफर नहीं है फिर भी अभिभावक अपने बच्चे को भेज रहे हैं। ऐसे में कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि निजी विद्यालयों की वजह से सरकारी विद्यालयों की स्थिति खराब हुई है। जबकि सच्चाई यह है कि सरकारी विद्यालयों ने गुणवत्ता के मानकों पर खुद को खरा नहीं साबित किया और लोगों का रुझान निजी विद्यालयों की तरफ गया। निजी विद्यालयों की गुणवत्ता सरकारी विद्यालयों की तुलना में बेहतर होने के पीछे मूल कारण प्रतिस्पर्धा है। निजी विद्यालय आपसी प्रतिस्पर्धा की वजह से बेहतर कर पा रहे हैं जबकि सरकारी विद्यालयों को प्रतिस्पर्धा के दायरे से मुक्त ‘सरकारी’ होने का ऐसा तमगा मिला है, जो उसे बेहतरी के लिए न तो प्रोत्साहित होने का कोई ठोस वजह दे पा रहा है और न ही ये विद्यालय बेहतर हो रहे हैं।

सरकारी विद्यालय भी बेहतर करें इसके लिए जरुरी है कि उनका भी मूल्यांकन उन्हीं नियामकों से किया जाय, जिन मानदंडों को निजी स्कूलों के लिए तय किया गया है। इसके लिए यह अनिवार्य है कि एक स्वायत्त संस्था हो जो समान मूल्यांकन नीति से सरकारी और निजी दोनों विद्यालयों के प्रदर्शन, गुणवत्ता, खर्च और लर्निंग आउटकम का मूल्यांकन करे। अभी स्थिति अलग है। सरकार अपने विद्यालयों में खुद ही नियंत्रक है, खुद ही नियोक्ता है, खुद ही फंडर है, खुद ही नियामक बनाने वाली बॉडी है। ऐसे में भला खुली प्रतिस्पर्धा में निष्पक्षता की गुंजाइश कैसे संभव है। टेलिकॉम सेक्टर में ट्राई महज मोनिटरिंग बॉडी है न कि वो खुद एक टेलिकॉम पार्टी है, लिहाजा उससे निष्पक्षता की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन शिक्षा में तो स्कूल भी सरकार का, शिक्षक भी सरकारी, बिल्डिंग भी सरकारी, नियम बनाने का अधिकार भी सरकार को, पैसा भी सरकार का और गड़बड़ी की स्थिति में जांच भी सरकारी। यह स्थिति कतई इमानदार और निष्पक्ष स्थिति नहीं कही जा सकती है। ऐसी स्थिति में हर हाल में सरकार अपने विद्यालयों के प्रति उदार रहेगी जबकि निजी विद्यालयों के प्रति सख्त। एक निजी स्कूल खोलने के लिए तमाम तरह के परमिशन, लायसेंस आदि का प्रावधान है। क्या सरकार अपने स्कूलों को शुरू करने के लिए भी वो सारे मानक पूरा करती है? नहीं! सरकार स्कूल पहले खोलती है, फिर लायसेंस भी खुद ही लेती है और पंजीकरण भी खुद ही कर लेती है। निजी विद्यालय की मान्यता से पहले शिक्षकों की संख्या, बिल्डिंग एरिया जैसी तमाम शर्तें होती हैं जबकि सरकारी स्कूलों के लिए ये सारी शर्तें कहीं नहीं होतीं। तमाम रिपोर्ट्स यह बताते हैं कि यूपी और दिल्ली जैसे राज्यों में सरकार प्रति बच्चा एक हजार से डेढ़ हजार रूपए खर्च करके शिक्षा देती है जबकि यही सरकार निजी स्कूलों की फीस को लेकर सख्त रहती है। अगर सरकार एक बच्चे को हजार रूपये महीने से कम में नहीं पढ़ा पा रही तो उसे कोई हक़ नहीं कि वो किसी निजी स्कूल से कहे कि वो इससे कम या इतने फीस में पढाये।

ऐसे में अगर खुली प्रतिस्पर्धा की स्थिति कर दी जाय तो शायद सरकारी स्कूल भी बेहतर करने लगें और छोटे-छोटे निजी स्कूल भी बेहतर ढंग से चलें। अभी क़ानून का सारा डंडा उन छोटे-छोटे स्कूलों पर पड़ रहा है जो खराब गुणवत्ता वाले सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए विकल्प हैं। इसका बड़े स्कूलों से कोई लेना देना नहीं है, क्योंकि वैसे भी उन स्कूलों में अपने बच्चों को पढाने वाले लोग सरकारी स्कूल में बच्चों को नहीं भेजते हैं। लेकिन मध्यम निम्न वर्ग का जो बड़ा तबका है वो तो छोटे-छोटे स्कूलों पर ही आश्रित है। ऐसे में दोहरे कानूनी मानदंड होने से इन छोटे-छोटे बजट स्कूल या तो बंद हो जाते हैं या फिर ढंग से चल नहीं पाते। इसलिए आज यह जरुरी है की सबको समान अवसर मिले, पारदर्शी ढंग से कार्य हो, सभी स्कूलों के साथ न्याय हो और जो बढ़िया करे उसे रिवार्ड मिले इसके लिए समान मूल्यांकन नीति वाली स्वायत प्रणाली को लाया जाना चाहिए।

शिवानन्द द्विवेदी
(लेखक डा. श्यामा प्रसाद मुकर्जी रिसर्च फाउंडेशन के रिसर्च फेलो और द नेशनलिस्ट ऑनलाइन के संपादक हैं)