संकट से ही पर्यावरण संतुलन बनेगा
भारत और चीन के तीव्र आर्थिक विकास ने पश्चिमी देशों के लिए संकट पैदा कर दिया है. अभी तक विकासशील देश अपने संसाधनों को स्वेच्छा से सस्ते मूल्य पर पश्चिमी देशों को उपलब्ध करा रहे थे. परिणाम स्वरूप पश्चिमी देशों के बीस फीसदी लोग विश्व के अस्सी फीसदी संसाधनों का उपभोग कर रहे थे. यह व्यवस्था स्थिर थी चूंकि भारत स्वयं अपने संसाधनों का निर्यात करने को तत्पर था. पिछले दो दशक में भारत एवं चीन के तीव्र आर्थिक विकास ने पश्चिमी देशों के इस सुख में अनायस ही अड़चन पैदा कर दी है. इन दोनों देशों ने संसाधनों की खपत स्वयं बड़े पैमाने पर चालू कर दी है.
वाशिंगटन की वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष क्रिस्टोफर फ्लाविन बताते हैं कि पिछले वर्ष चीन ने विश्व के 26 फीसदी इस्पात, 32 फीसदी चावल, 37 फीसदी कपास एवं 47 फीसदी सीमेंट की खपत की है. चीन द्वारा खाद्यान्नों का आयात भी बढ़ रहा है. यदि उत्पादन में किसी कारणवश कमी आई तो खाद्यान्न के मूल्यों में वृद्धि हो सकती है जिस से सम्पूर्ण विश्व की जनता पभावित हो सकती है. भारत एवं चीन की बढ़ती मांग के साथ-साथ पश्चिमी देशों विशेषकर अमरीका की भी मांग बढ़ रही है. विश्व के संसाधनों पर दोहरा दबाव बन रहा है. पश्चिमी देशों के बीस फीसदी लोग संसाधनों की खपत में वृद्धि करने के पयास में हैं. दूसरी तरफ भारत एवं चीन उन्हीं संसाधनों पर हाथ बढ़ा रहे हैं.
इस परिस्थिति से निबटने के लिए भारत चीन के सामने दो रास्ते हैं. नरम रास्ता यह है कि विश्व के संसाधनों की पश्चिमी देशों द्वारा खपत होने दें और अपना विकास कम संसाधनों से करें. दूसरा गरम रास्ता है भारत एवं चीन अपनी खपत बढ़ाएं और संसाधनों के दाम उछलने दे-जैसे वर्तमान में तेल के मूल्य उछल रहे हैं। इसका परिणाम यह होगा कि विश्व पर्यावरण पर संकट आएगा। तेल की अधिक खपत से तापमान बढ़ेगा और तूफान आदि आने की संभावना होगी। यह सब के लिए हानिकारक होगा। साथ-साथ ऊंचे मूल्यों के कारण पश्चिमी देशों द्वारा खपत में कमी आएगी. इन समस्याओं के चलते सम्पूर्ण विश्व को `विकास' की नई परिभाषा खोजनी होगी तथा खपत कम करनी होगी। एक नया वैश्विक संतुलन स्थापित करना होगा जिसमें खपत में पश्चिमी देशों का हिस्सा कम हो जाएगा, भारत तथा चीन का हिस्सा बढ़ेगा और वैश्विक समानता स्थापित होगी.
स्वाभाविक है कि पश्चिमी देशों को नरम रास्ता पसंद आएगा चूंकि इस रास्ते विश्व अर्थव्यवस्था पर उनका वर्तमान वर्चस्व बना रहता है. इसलिए वर्ल्डवाच जैसी संस्थाएं भारत एवं चीन को सलाह देती हैं कि वे पश्चिमी देशों द्वारा की जा रही खपत का अनुसरण न करें. वे ऐसी छलांग मारें कि संसाधनों की खपत में वृद्धि किए बिना ही उनकी जनता का जीवन स्तर सुधर जाए. श्री फ्लाविन उदाहरण देते हैं चीन के कुनमिंग शहर में बस के लिए सड़क की एक लेन रिजर्व कर दी गई है. लाल बत्ती का नियंत्रण बस चालकों के द्वारा होता है जिससे बस को हरी बत्ती जादा मिलती है. फलस्वरूप बस की औसत गति 9.6 किलोमीटर पति घंटा से बढ़ कर 15.2 किलोमीटर हो गई है और बस यात्रियों की संख्या में 5 गुणा वृद्धि हुई है. भारत में चेन्नई में 70,000 मकानों पर जल संग्रहण के उपकरण लगाए जा चुके हैं. उन का कहना है कि इस पकार की तकनीकी छलांग लगा कर भारत एवं चीन संसाधनों की मांग बढ़ाए बगैर अपने नागरिकों का जीवन स्तर सुधार सकेंगे. वे कहते हैं अमरीका द्वारा भी नीतियों में परिवर्तन किया जाना चाहिए परन्तु इस परिवर्तन के लिए दबाव बनाने की उनके पास कोई योजना नहीं है. इस महारोग का उपचार भारत द्वारा सीएनजी की छलांग लगाकर नहीं बल्कि अपनी खपत बढ़ाकर एक कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर, उसी में हल निकाल कर होगा.
- Admin's blog
- Login to post comments
-


solution provided to India