सार्वजनिक नीति - उर्जा एवं पर्यावरण लेख

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उत्तराखंड के विश्व स्तरीय कार्बेट पार्क पर एक बार फिर शिकारियों की शिकंजा कसता जा रहा है। पिछले दस महीनों में बाघों के शिकार की घटनाएं निरंतर अंतराल पर सामने आई हैं। इतना नहीं नहीं, बल्कि बाघों की अन्य कारणों से मौत का सिलसिला भी जारी है। इस वर्ष अभी तक दस बाघों की मौत हो चुकी है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर वन विभाग समेत बाघों के संरक्षण में जुटी अन्य एजेंसियों की योजनाएं कारगर साबित क्यों नहीं हो रही हैं।

कार्बेट पार्क की यूपी व उत्तराखंड से लगी सीमा पर हाल ही में

चीनी वस्तुओं के किसी भी बाजार में छाए रहने का मुख्य कारण उनका तुलनात्मक रूप से सस्ता होना होता है। लेकिन यदि देसी वस्तु के सस्ते होने के बावजूद उसी चीनी वस्तु की भारी मात्रा आयात की जाए और यहां के उत्पादकों की अनदेखी की जाए तो इसे नीति निर्धारकों की अदूरदर्शिता  नहीं तो और क्या कहेंगे।

जी हां, देश के जंगलों में बांस की बड़ी तादात बेकार पड़े होने के बावजूद भारी मात्रा में चीनी बांस का आयात किया जाता है। वह भी यहां उपलब्ध बांस की कीमत से अधिक दर पर। इससे एक तरफ जहां स्थानीय उत्पादकों के सामने आजीविका का संकट

बीते 16-17 जून की रात उत्तराखंड में हुए जलप्लावन और जनधन की अपार क्षति के बाद एक बार फिर से पहाड़ों पर निर्माण और विकास कार्यों की सार्थकता और आवश्यकता पर पर्यावरणविदों व भूगर्भविज्ञानियों के बीच बहस तेज हो गई है। अचानक से ही पहाड़ों को तोड़ने के लिए विस्फोटकों के हुए प्रयोग की मात्रा का हिसाब किताब ढूंढ ढूंढकर निकाला जाया जाने लगा है। टिहरी बांध के साथ ही साथ होटलों, रिजॉर्टो के निर्माण कार्यों की एक सुर में आलोचना की जाने लगी है। कारपोरेट्स, उद्योग जगत व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित लोगों द्वारा उन्हें विनाश का पुरोधा बताया जाना तो

उत्तराखंड में जो भयानक नुकसान हमने पिछले सप्ताह देखा, उसके पीछे छिपे हैं कई सवाल, जिन्हें हम सिर्फ आपदा आने के समय ही पूछते हैं। बला टल जाती है, तो हम भी उन सवालों को पूछना बंद कर देते हैं। इसलिए हम आज तक समझ नहीं पाए हैं विकास और पर्यावरण का नाजुक रिश्ता और न ही हमारे शासकों ने समझने की कोशिश की है कि विकसित देशों में विकास के बावजूद पहाड़ क्यों सुरक्षित हैं, नदियां क्यों साफ हैं।

पहाड़ी इलाकों में न शहरीकरण को रोका जा सकता है, और न तीर्थयात्रियों-पर्यटकों को। अगर स्विट्जरलैंड में बन सकते हैं पहाड़ों में बड़े-बड़े

 

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इन दिनों पर्यावरण के अनुकूल होने के नाम पर इलेक्ट्रिक (बैटरी चालित) कारों के उत्पादन और प्रयोग को खूब बढ़ावा दिया जा रहा है। उत्पादकों को ऐसी कारों के उत्पादन के नाम पर सब्सिडी प्रदान करने का भी चलन है। भारत में भी अन्य देशों की देखा देखी बैटरी चालित वाहनों और कारों के उत्पादन और प्रयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। यहां भी ऐसे वाहनों के अधिक से अधिक उत्पादन और उपयोग के लिए उत्पादकों द्वारा सब्सिडी की अपेक्षा की जा रही है जबकि सरकार द्वारा इसका प्रलोभन दिया जा रहा है। लेकिन, क्या आपको लगता है कि बैटरी चालित वाहन वास्तव में

बीते रविवार को हम सब ने धूमधाम से लोहड़ी जलाई। इसी तरह होली के भी पहले लोग होलिका दहन करते हैं। आज के ग्लोबल वॉर्मिंग के दौर में त्योहारों के नाम पर क्या ऐसे रिवाज उचित हैं? एक ही दिन में हजारों टन ग्रीन हाउस गैसों का जहर हमारे पर्यावरण में घुल जाता है। एक ही दिन में इतनी लकड़ी जला दी जाती है, जिससे सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र का सफाया हो जाता है। उत्तर भारत में लोहड़ी पर लकड़ियां जलाने की परंपरा है। यह सार्वजनिक रूप से भी किया जाता है और अलग-अलग भी। जिन परिवारों में उस साल कोई विवाह, जन्म अथवा अन्य मांगलिक अवसर होता है, उस परिवार के सभी लोग मिलकर अलग से लोहड़ी दहन करते

उदाहरण के लिए चीनी व्स्तुओं पर प्रतिबंध उनकी घटिया गुणवत्ता व इसके अर्थव्यवस्था व स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को रोकने के लिए लगाया गया है। लेकिन भारतीय बाजार चीनी वस्तुओं से भरे पड़े हैं और खिलौनों आदि में प्रयुक्त रंग के संपर्क में आने के कारण बच्चों को कैंसर, दिल व फेफड़े की बीमारी हो रही है। क्या ही अच्छा होता कि चीनी वस्तुओं के लिए भारतीय बाजार खोल दिए जाए लेकिन इसके पूर्व उनके लिए कड़े मानक तय कर दिए जाएं और उनका अनुपालन भी सुनिश्चित किया जाए। इससे देश को कई फायदे होंगे। एक तो प्रतिबंध समाप्त होने के कारण चीनी सामान वैध तरीके से कस्टम व आयात शुल्क अदा कर देश

दिल्ली में एकबार फिर से पॉलीथिन के प्रयोग व इसकी खरीद-बिक्री को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 15 के तहत प्रतिबंध की अनदेखी करने वालों पर 10 हजार से एक लाख रूपए तक का आर्थिक दंड अथवा सात वर्ष तक की सजा अथवा दोनों का प्रावधान किया गया है। इसके पूर्व वर्ष 2009 में भी दिल्ली में प्लास्टिक के प्रयोग पर रोक लगाया गया था। लेकिन उस समय 40 माइक्रोन से मोटे प्लास्टिक व उससे निर्मित वस्तुओं, कैरीबैग आदि को प्रतिबंध से मुक्त रखा गया था। हाल ही में राजधानी में गुटखे पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि गुटखा, प्लास्टिक आदि के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर

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