शिक्षकों की जिम्मेदारी तय नहीं हुई तो भारी-भरकम खर्च के बावजूद नाकाम होगी नई शिक्षा नीति

आज देश में शिक्षा की दुर्दशा को लेकर दबी जुबान में बोलने का कोई फायदा नहीं है। दरअसल हालात बहुत बिगड़ गए हैं। दो टूक में कहें तो इसके लिए जिम्मेदार हैं स्कूल और शिक्षक जिनमें जिम्मेदारी का सर्वथा अभाव रहा है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था पर छिटपुट प्रहार करने से काम नहीं बनेगा। लेकिन भारत में शिक्षा माफिया और इनकी लॉबी इतनी मजबूत है कि इसे आड़े हाथों लेना बहुत कठिन है और नई शिक्षा नीति (एनईपी) के कर्णधार यह बखूबी जानते हैं और इससे इनकार भी नहीं कर सकते। ऐसे में शिक्षा क्षेत्र में जिम्मेदारी को लेकर जो आमूल परिवर्तन जरूरी हैउसके विरोध में मौजूदा शिक्षा व्यवस्था एड़ी-चोटी का जोर लगा देगी। पर सरकार को चाहिए कि इस काम को किसी तरह फटाफट निपटाने की बजाय उचित सिद्धांतों पर शिक्षा सुधार के भगीरथ प्रयास को पूरा करे।

हालांकि सरकार के लिए यह कहना आसान पर करना कठिन होगा। इस संदर्भ में टी एस आर सुब्रमण्यन कमेटी के सुझाव लीक से हट कर हैं और सही अर्थों में नयापन लिए हैं। सरकार तो हमेशा ऐसी किसी समस्या के वजूद को ही ‘नकारती’ रही है जबकि इस कमेटी ने इसे स्वीकार किया है और साफ शब्दों में माना है कि शिक्षा तंत्र में भ्रष्टाचार व्याप्त है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एनईपी का जो मसौदा जारी किया है उसमें न तो कुछ नया है और न ही किसी प्रकार की सख़्ती! सबसे बड़ी बात यह कि मंत्रालय इस बीमारी से लड़ने के लिए आवश्यक कोई ठोस उपाय देने से कतरा रहा है। फिर भी, एक स्तर पर मंत्रालय एनईपी के मसौदे के कुछ अभूतपूर्व प्रावधानों के लिए बधाई का पात्र है। पर इसमें इतनी संख्या में सुधार के प्रस्ताव हैं कि एनईपी को सही मायनों में लागू करना मुमकिन नहीं लगता। 1986 की एनईपी की भांति इसके भी औचित्य खोने का अंदेशा है। गौरतलब है कि 1986 की एनईपी में अनंत इच्छाएं तो थीं पर उन्हें पूरा करने का कोई ठोस साधन नहीं था।

हालांकि एनईपी के मसौदे में उत्तरदायित्व बढ़ाने के कुछ प्रावधान किए गए हैं पर अधिकांश प्रस्ताव कमजोर और अस्पष्ट हैं जैसे ‘‘शिक्षकों की जिम्मेदारी से जुड़े मसलों का हल एक मजबूत राजीनैतिक सहमति और इच्छा शक्ति से किया जाएगा’’ पर यह सहमति बनेगी कैसे इस पर कुछ भी नहीं कहा गया है। कुछ अन्य उदाहरण भी हैं जैसे ‘‘स्कूल में शिक्षा संबंधी काम-काज के लिए प्रिंसिपल को उत्तरदायी माना जाएगा’’ और ‘‘शिक्षकों की जिम्मेदारी बढ़ाने के कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाएगी’’। पर सवाल उठता है कि इन कार्यों की जिम्मेदारी किन पर होगी और वे किस समय सीमा के अंदर पूरा करेंगे। हालांकि ‘‘एबसेंटिज़्म और इनडिसिप्लीन से निपटने की शक्ति स्कूल मैनेजमेंट के हाथ में देने’ का प्रस्ताव स्वागत् योग्य है पर यह काम भगीरथ प्रयास का है जो अकेले मैनेजमेंट कमेटी के वश का नहीं! और इस नीति को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने का कोई जिक्र भी नही है।

इसके उलट, जिम्मेदारी को ताख पर रखने वाली एक्सेस और इनपुट की पॉलिसियों को आरटीई एक्ट 2009 में कानून का बल दिया गया है जिसे समाप्त करने का इस मसौदे में कोई प्रयास नहीं दिखता है। आरटीई एक्ट के सेक्शन 6 के तहत राज्यों को हर मोहल्ले-टोले में पब्लिक स्कूल खोलने का दायित्व दिया गया है। यानी अब राज्य सरकारें ऐसे गैर-जिम्मेदार पब्लिक स्कूल खोलने के लिए बाध्य हैं जिनसे माता-पिता अपने बच्चों को निकाल रहे हैं। गौरतलब है कि 2011 से 2015 की छोटी सी अवधि में भले ही पब्लिक स्कूलों की संख्या बढ़ कर 9,448 हो गई पर कुल मिला कर इनमें दर्ज बच्चों के नामों में 1.13 करोड़ की भारी गिरावट आई। दूसरी ओर भारत में प्राइवेट स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में 1.85 करोड़ का इज़ाफा देखा गया। ये डाइस के आधिकारिक आंकड़े हैं। देश में 2014-15 तक मौजूद कुल 10.53 लाख पब्लिक एलिमेंट्री स्कूलों में 3.72 लाख (लगभग कुल मिला कर 35 प्रतिशत) स्कूलों में 50 या उससे भी कम स्टुडेंट थे।

यानी प्रति स्कूल  केवल29 बच्चे! प्रति टीचर केवल 12.7 बच्चे! और प्रति वर्ष प्रति बच्चा एक टीचर के वेतन पर 40,800 रु. का खर्च! वर्ष 2014-15 के लिए टीचर की सैलरी का आंकड़ा सुन कर दांतों तले उंगली दबा लेंगे आप। जी हां, 41,630 करोड़ रु.! पेडेगॉगी के मानक पर फेल हो गए ये टाइनी स्कूल देश की छोटी जमा-पूंजी की जबरदस्त बर्बादी है। इसे जारी रखना एक तरह से आर्थिक अपराध है। एनईपी के मसौदे में कहा गया है कि ‘‘नॉन-वायबल स्कूल्स को कम्पोजि़ट स्कूल बनाने का प्रयास किया जाएगा...ताकि शिक्षा के काम-काज में सुधार हो और लागत भी कम हो’’। हालांकि जब तक स्कूल और टीचर का उत्तरदायित्व नहीं सुनिश्चित किया जाता है स्कूलों को मर्ज करने का कोई फायदा नहीं नजर आता!

सही अर्थों में यह उत्तरदायित्व बढ़ाने के लिए सरकार को वही करना होगा जो पूरी दुनिया की सबसे अच्छी शिक्षा व्यवस्थाएं करती हैं: पब्लिक स्कूलों और सरकारी अनुदान से चलने वाले स्कूलों की फंडिंग के फॉर्मूले में सुधार। यदि फंडिंग स्कूल के विद्यार्थियों की संख्या पर निर्भर करेगी तो स्कूल अच्छी-से-अच्छी शिक्षा देंगे ताकि अधिक-से-अधिक बच्चे आएं और यह संख्या बरकरार रहे। स्कूल/टीचर और जिम्मेदार हो जाएंगे जब यह फंडिंग भी स्कूल वाउचर के रूप में होगी। बच्चों की स्कूल फीज़ के नाम ये सरकारी वाउचर सीधे माता-पिता के हाथ आएंगे तो ही वे सही मायनों में अधिकार का प्रयोग कर पाएंगे और सरकार का लक्ष्य भी पूरा होगा। इस व्यवस्था का यह भी फायदा होगा कि सैकड़ों माता-पिता हर दिन स्कूल के काम-काज पर नजर रखेंगे। स्कूल भी अधिक मन लगा कर काम करेंगे ताकि अधिक से अधिक वाउचर उनके हाथ आए लिहाजा वे ऐसे माता-पिता की बात सुनेंगे। स्कूलों को हमेशा यह डर लगा रहेगा कि वाउचर वाले माता-पिता अन्य स्कूल का रुख न कर लें। यह हुई न बात, एक साधे सब सधे। वाउचर स्कीम का एक बड़ा लाभ यह है कि इससे देश के बीपीएल परिवार के बच्चों को भी बराबरी का हक़ मिलेगा। वे अपनी पसंद के प्राइवेट स्कूल में जा पाएंगे। कम से कम प्राइवेट स्कूलों में आरक्षित 25 प्रतिषत सीटों पर पढ़ रहे गरीब बच्चों को जरूर इसका लाभ होगा। आरक्षण का यह प्रावधान आरटीई एक्ट 2009 के तहत किया गया है।

शिक्षा जगत में उत्तरदायित्व के बद से बदतर होते हालात को देखते हुए जड़ से सुधार करने की जरूरत है। दरअसल संविधान के आर्टिकल 171 (3 सी) में संषोधन करना होगा ताकि राज्य के विधान परिषद में शिक्षकों के प्रतिनिधत्व की गारंटी खत्म हो जाए। इस वजह से शिक्षक अपने काम से अधिक राजनीति पर ध्यान देते हैं। आज यह संषोधन आवश्यक है कि सरकारी वेतनभोगी शिक्षकों (अनुदान पाने वाले स्कूल) को लाभ के एक पद पर काबिज़ माना जाए लिहाजा उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया जाए। ऐसा नहीं करने से वे राजनीतिक दबदबा का बेज़ा लाभ लेते रहेंगे और इसका एक पूरा माहौल बन जाएगा। दरअसल इस बिन्दु पर चुनाव आयोग को भी ध्यान देना होगा जो मतदान में भाग लेने वाली किसी पार्टी में शिक्षकों का अनुपात घटा सकता है। इससे मतदान केंद्र (बूथ) पर शिक्षकों की भागीदारी कम होगी और यह धारणा भी टूटेगी कि चुनाव के नतीजे भी शिक्षक तय करते हैं। जब तक शिक्षकों का यह दबदबा कायम रहेगा उन्हें सालों-साल स्कूल से गायब रहने से भला कौन रोक सकता है। उनके खिलाफ अनुशासन संबंधी कोई कार्यवाही की तो सोच भी नहीं सकते!

बच्चों के माता-पिता के हाथ मजब़ूत करने में मीडिया/वेबसाइट की भी अहम् भूमिका हो सकती है। यदि हर शहर के विभिन्न स्कूलों के बच्चों के सीखने के स्तर मीडिया/वेबसाइट पर प्रकाशित किए जाएं तो माता-पिता अधिक सोच-समझ कर निर्णय ले पाएंगे। साथ ही, इंटर-स्कूल कॉम्पटीशन बढ़ेगा। हमारा यह विचार तो हमारे प्रधानमंत्री का भी है जो कहते हैं कि सीखने का अपेक्षित स्तर हर क्लासरूम के बाहर की दीवार पर स्पष्ट शब्दों में अंकित हो। मौजूदा सरकार चाहती है कि एनईपी का नए सिरे से निर्माण किया जाए। लेकिन यदि इस बार भी उत्तरदायित्व सुनिष्चित करने से चूक गए तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था कभी उस शिखर पर नहीं होगी जहां इसे होना चाहिए।

- गीता किंगडन
लेखिका लंदन विश्विद्यालय में शिक्षा अर्थशास्त्र की प्रोफेसर हैं और लखनऊ के सिटी मांटेसरी
स्कूल की प्रेजि़डेंट हैं।

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