वोट उसे जो युवाओं के बूते तरक्की लाए

अगले महीने होने वाले आम चुनाव भारतीय इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण चुनाव हो सकते हैं। देश के सामने विशाल युवा आबादी के रूप में सीमित मौका है। यदि हम उचित प्रत्याशी को चुनते हैं तो यह फैसला करोड़ों भारतीयों की जिंदगी में समृद्धि लाएगा और वक्त के साथ भारत एक मध्यवर्गीय देश हो जाएगा। यदि हम गलत उम्मीदवार चुनते हैं तो फायदे की यह स्थिति विनाश में बदल सकती है और भारत इतिहास में पराजित देश के रूप में दर्ज हो सकता है।

भारत के अवसर इस तथ्य में निहित हैं कि यह एक खास तरीके से युवा देश है। खास इस तरह कि यहां ज्यादातर लोग कामकाजी उम्र के हैं जबकि बुजुर्गों और कम उम्र लोगों की आबादी तुलनात्मक रूप से कम है। आबादी का ऐसा मिश्रण हो तो नतीजा तीव्र आर्थिक वृद्धि में होता है, जिसकी मिसाल इतिहास में मिलती है। क्योंकि उत्पादक आयु से मिलने वाले फायदे अनुत्पादक आयु वालों को सहारा देने के बोझ पर भारी पड़ते हैं। आईएमएफ  के मुताबिक ऐसी आर्थिक उछाल सालाना जीडीपी वृद्धि में दो प्रतिशत अंकों में दिखाई देती है। पश्चिम और सुदूर पूर्व के सबसे सफल देशों ने युवा आबादी के इस फायदे को अनुभव किया है। हाल ही में चीन ने अपनी युवा आबादी के बल पर ही तरक्की हासिल की है।

युवा आबादी की ताकत को पहचानने वाली पार्टी और प्रत्याशी उत्पादक आधारभूत ढांचे तथा युवाओं का हुनर बढ़ाने में निवेश करेंगे और अनुत्पादक सब्सिडी में कटौती लाएंगे। वे ऐसा माहौल बनाएंगे, जिसमें उद्यमी निवेश के लिए प्रोत्साहित होंगे। इससे बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा होंगी, जिनमें प्रशिक्षित युवा काम करेंगे। इन्हें रोजगार मिलेगा तो पैसा आने से उनका उपभोग बढ़ेगा। इससे उपभोक्ता उत्पादों के उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और आर्थिक वृद्धि दर ऊंची उठेगी। कर्मचारियों के रूप में वे बचत भी ज्यादा करेंगे, जिससे देश में मौजूद पूंजी में इजाफा होगा, जो अभी कम है। इससे फिर निवेश और वृद्धि को प्रोत्साहन मिलेगा। वे अपने बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर अधिक खर्च करेंगे, जिससे भविष्य में और उत्पादक वर्कफोर्स पैदा होगा। आबादी के संक्रमण में गिरती फर्टीलिटी का नतीजा अधिक स्वस्थ महिलाओं में होगा, जो वर्कफोर्स में शामिल होकर आर्थिक वृद्धि में योगदान देंगी। अधिक उत्पादन और आपूर्ति के कारण महंगाई कम होगी। अधिक आमदनी और कम सब्सिडी के कारण राष्ट्रीय वित्तीय स्थिति अधिक सबल बनेगी और सरकार के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबों के कल्याण में अधिक निवेश करना संभव होगा।

ऐस में सवाल उठता है कि आबादी से फायदा उठाने में सबसे सक्षम दल कौन सा है? निश्चित ही क्षेत्रीय दलों में तो यह काबिलियत है नहीं, क्योंकि उन पर स्थानीय मुद्दे हावी हैं और वे केवल धर्म व जाति के पत्ते खेलने में माहिर हैं। आर्थिक वृद्धि की उन्हें परवाह नहीं है। आम आदमी पार्टी को सिर्फ भ्रष्टाचार व क्रोनी कैपिटलिज्म (यानी मिलीभगत वाले पूंजीवाद) की चिंता है। यह निजी निवेश के खिलाफ है और इसकी संभावना नहीं है कि यह निवेश और रोजगार को आकर्षित करने वाली नीतियां लाएगी। यदि आप मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी या मायावती की बसपा या केजरीवाल की 'आप' को वोट देंगे तो अपना वोट बर्बाद ही करेंगे।

दो राष्ट्रीय पार्टियों में से कांग्रेस में मौजूद सुधारक युवा आबादी के फायदे को समझते हैं, लेकिन वे कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि सत्तारूढ़ नेहरू-गांधी वंश आर्थिक वृद्धि के लिए उनके जुनून से सहमत नहीं है। सोनिया गांधी और राहुल निवेश और नौकरियों के जरिये होने वाली तुलनात्मक रूप से धीमी प्रक्रिया का इंतजार करने की बजाय गरीबों को रियायतें बांटने की तीव्र प्रक्रिया के हामी हैं। उनकी प्राथमिकता सड़कें और बिजलीघर नहीं बल्कि राशन का अनाज, बिजली व गैस सिलेंडरों पर सब्सिडी, मनरेगा रोजगार और इस जैसी कल्याणकारी योजनाओं में हैं। इस नीति से उन्हें वोट भी मिलते हैं।

चूंकि कांग्रेस ने वृद्धि और समानता के बीच गलत चुनाव किया, सुधारों की प्रक्रिया रुक गई और भारत की आर्थिक वृद्धि दर 9 फीसदी से तेजी से गिरकर 4.5 फीसदी पर आ गई। पैसा उत्पादकता में नहीं लगाया गया, लेकिन रियायतों के जरिये आमदनी बढऩे के साथ महंगाई भी बढ़ गई। चूंकि यूपीए सरकार के कार्यकाल में शक्ति के दो केंद्र थे इसलिए नौकरशाही भी असमंजस में रही। और असाधारण भ्रष्टाचार ने सरकार को पूरी तरह पंगु बना दिया। लाल और हरी फीताशाही के कारण सैकड़ों परियोजनाएं रोक दी गईं। इन सब कारणों से मुझे भरोसा नहीं है कि कांग्रेस युवा आबादी होने का फायदा दे पाएगी।

अब बची भारतीय जनता पार्टी। इसने पिछले दस साल में कांग्रेस के आर्थिक वृद्धि विरोधी एजेंडे का विरोध न करके हमें नीचा दिखाया। हालांकि, पिछले एक साल में इसकी सोच में नरेंद्र मोदी ने नाटकीय बदलाव लाया है, जिनका विकासवादी एजेंडा निवेश, नौकरियों, कौशल प्रशिक्षण और वृद्धि पर केंद्रित है। मोदी नीतियों को अमल में लाने में माहिर हैं। वे प्राथमिकताओं की प्रगति पर निकट से निगाह रखेंगे, लाल व हरे फीते काट डालेंगे और सेवाओं में सुधार लाएंगे। किंतु केंद्र में उनकी राह आसान नहीं होगी, जहां उन्हें गठबंधन धर्म से संतुष्ट रहना होगा। हालांकि, जिस तरह उन्होंने अपनी पार्टी में नेतृत्व हासिल किया है, उसमें उन्होंने एक नेता की सहज-प्रेरणा दिखाई है। वे नौकरशाही को भी स्पष्ट निर्देश देंगे, जिससे व्यवस्था की जड़ता दूर होगी। यदि उद्देश्य स्पष्ट हो तो भारतीय नौकरशाही उत्कृष्ट प्रदर्शन करने की क्षमता रखती है, जैसा कि हमने नरसिंहराव के शुरुआती दो वर्षों में 1991 से 1993 के दौरान देखा था।

नरेंद्र मोदी मेरी पसंद इसलिए हैं, क्योंकि देश को युवा आबादी का फायदा पहुंचाने की सर्वाधिक संभावना उनमें है। मैं पहली बार भाजपा को वोट देने की सोच रहा हूं। मैंने पहले कभी इसे वोट नहीं दिया है, क्योंकि मुझे इसकी सांप्रदायिक, बहुसंख्यकवादी राजनीति और हिंदुत्व का एजेंडा पसंद नहीं है। मुझे मोदी की तानाशाही और धर्मनिरपेक्षता विरोधी प्रवृत्ति की चिंता है, लेकिन कोई प्रत्याशी परिपूर्ण नहीं होता।

मैं मानता हूं कि मोदी का एक काला पक्ष भी है, लेकिन मैं यह जोखिम लूंगा, क्योंकि मैं युवा आबादी के फायदे को विनाश में बदलने का इससे बड़ा जोखिम नहीं ले सकता। एक गरीब देश में रोजगार निर्मित करना पहली प्राथमिकता होनी ही चाहिए। जीडीपी दर में एक फीसदी की वृद्धि से मोटेतौर पर 15 लाख सीधे रोजगार पैदा होते हैं। इनमें से प्रत्येक रोजगार से तीन अप्रत्यक्ष रोजगार निर्मित होते हैं और प्रत्येक रोजगार से पांच लोगों को सहारा मिलता है। यानी एक फीसदी वृद्धि से तीन करोड़ लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हम अपनी राष्ट्रीय वृद्धि दर को 4.5 फीसदी से बढ़ाकर 8 फीसदी करके हर साल दस करोड़ लोगों के जीवन में खुशहाली और सुरक्षा ला सकते हैं। अब यह ऐसी बात है, जिसके लिए दाव लगाया जा सकता है। जो लोग इसके ऊपर धर्मनिरपेक्षता को तरजीह देते हैं वे या तो सत्ता में एक विशिष्ट वर्ग को ही बनाए रखना चाहते हैं या अनैतिक हैं।

- गुरचरन दास (प्रसिद्ध स्तंभकार और लेखक)
साभारः दैनिक भास्कर

गुरचरण दास

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.