भारतीय शिक्षा व्यवस्था को जियो क्रांति की दरकार!

रिलायंस ने 1 सितंबर 2016 को अपनी दूरभाष सेवा ‘जियो’ का लोकार्पण किया। इसके तहत फोन पर निशुल्क बातचीत करने और ग्राहको के लिए 4 जी इंटरनेट डेटा प्लान उपलब्ध है। इस योजना का लाभ उठाने के लिए आवश्यक रिलायंस जियो का सिम हासिल करने के लिए पूरा देश उमड़ पड़ा और कतारबद्ध होकर खड़ा हो गया।

देश के विभिन्न इलाकों की मेरी यात्रा के दौरान मैनें पाया कि मेरे मित्रों सहित बहुत सारे लोग हमेशा ऑनलाइन रहते थे खुशी खुशी निशुल्क 4 जी डेटा सर्विस का इस्तेमाल कर रहे थे। ऐसा होते हुए अब छह महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है। जियो ने हाल ही में अपनी सेवा के बदले 100 रूपए प्रति माह के बेसिक कैपिटेशन चार्ज लेने की घोषणा की जो कि अप्रैल 2017 से लागू हो गयी। जीवन भर मैं एयरटेल का ग्राहक रहा हूं और मेरे लिए अब तक जियो की सुनामी से न जुड़ना आश्चर्य करने वाला था। मैं अपने दिमाग को इससे दूर रखने की भरसक कोशिश कर रहा था और एयरटेल के साथ अपना भरोसा बनाए रखना चाहता था। हालांकि तुलनात्मक रूप से ज्यादा कीमत चुकाना भी सही नहीं था।

जनवरी 2017 में मैंने एक नया फोन खरीदा और जियो से जुड़ने का सोचा, लेकिन इससे पहले की मैं ऐसा कर पाता, एयरटेल ने सभी आवश्यक लाभ कम कीमत में उपलब्ध कराने वाला प्लान दिया। मैं खुशी खुशी एयरटेल के साथ बना रहा और मेरा पुराना नंबर भी बरकरार रहा वह भी ज्यादा बेहतर कीमत पर। इस पूरे वाकये के दरम्यान मैं यह सोचता रहा कि वास्तव में बतौर एक उपभोक्ता मेरी ख्वाहिश थी क्या?

कम लागत में बेहतर सेवा मेरी सूची में शीर्ष पर थी। दरअसल, जियो की बाजार आधारित प्रतिस्पर्धा वाली व्यवस्था ने एयरटेल द्वारा मुझे यह सब उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया था।

यहां तक कि सरकार द्वारा संचालित बीएसएऩएल/ एमटीएनएल ने भी इस परिपाटी का अनुसरण किया और कीमतों को घटाते हुए अपनी सेवा में बेहतरी करने को मजबूर हुआ। जबकि इस सारी प्रक्रिया का नियमन व निरीक्षण एक अन्य स्वतंत्र सरकारी प्राधिकरण द टेलीकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) द्वारा किया जा रहा था ताकि किसी प्रकार की गड़बड़ी न होना सुनिश्चित किया जा सके।

अब भारतीय शिक्षा प्रणाली के मामले को देखते हैं। यहां हितधारकों (स्टेक होल्डर्स) से संबंधित सारी नीतियां, नियमन व काम काज के समस्त तौर तरीके (कार्यचर्या/ फ्रेमवर्क) सभी स्तर पर सरकार ही तय करती है। यही विभाग इसे कोष उपलब्ध कराती है और वित्त प्रदान करती है। सबसे बड़ी बात यह है वही अधिकारी सरकारी स्कूलों के माध्यम से शिक्षा से जुड़े प्रावधान तैयार करने के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। इस क्षेत्र में भारत के अन्य बड़े सेवा प्रदाताओं विशेषकर कम लागत वाले बजट प्राइवेट स्कूलों का नियमन, समीक्षा व प्रबंधन सरकार द्वारा ही किया जाता है। बजट प्राइवेट स्कूल ऐसे स्कूल होते हैं जहां प्रति छात्र लागत उसी क्षेत्र में संचालित होने वाले सरकारी स्कूलों की तुलना में कम होता है। चूंकि छात्रों की सीखने की क्षमता (लर्निंग आउटकम) में सुधार के उद्देश्य से देश में सीखने की क्षमता के मूल्यांकन का प्रावधान है, जो बताते हैं छात्रों के सीखने की क्षमता के मामले में बजट प्राइवेट स्कूल सरकारी स्कूलों की तुलना में लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि इन बजट प्राइवेट स्कूलों की प्रतिस्पर्धा सीधे सीधे सरकारी स्कूलों के साथ है। भारत में, सरकारी स्कूलों की तुलना में बजट प्राइवेट स्कूलों में अधिक बच्चे पढ़ते हैं। असर (एएसईआर) 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2010 से 2014 के बीच सरकारी स्कूलों में दाखिले 6.2 प्रतिशत तक कम हो गए जबकि इसी दौरान निजी स्कूलों में दाखिले 6.5 प्रतिशत तक बढ़ गए। इस घटना ने छात्रों और अभिभावकों के हितों की कीमत पर अनावश्यक युद्ध पैदा कर दिया। कम कीमत वाले गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूल सरकारी स्कूलों के एक विकल्प के तौर पर उभरे हैं, विशेषकर, शहरों और ग्रामीण इलाकों के गरीब अभिभावकों के लिए। यूपी और हरियाणा जैसे बड़े राज्यों के 50 प्रतिशत से ज्यादा छात्रों ने गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में दाखिला लिया है।

इसके अलावा, मूल्यांकन व समीक्षा का कार्य भी उसी सरकारी विभाग द्वारा किया जाता है। यह किसी भी सूरत में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की सम्यक भावना नहीं कही जा सकती। अभिभावकों के पास आकिर विकल्प ही क्या है? क्या एक बेहतर और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा वाले शैक्षिक माहौल की स्थापना नहीं की जा सकती जो हमारे बच्चों के संपूर्ण शैक्षणिक परिणाम की गुणवत्ता में सुधार सुनिश्चित कर सके।

मुझे शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी भूमिकाओं को अलग अलग करने वाले ट्राई के समान प्राधिकरण वाले विकल्प प्राप्त करना पसंद होगा जो संभवतः जियो जैसे मॉडल को शिक्षा के क्षेत्र में आना प्रोत्साहित करे और शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सके, तथा जो विकल्प की स्वतंत्रता और प्रतिस्पर्धा को छात्रों के सीखने की प्रवृति में बदलाव ला सके। मुझे स्वतंत्रता और विकल्प पसंद है और मुझे पक्का विश्वास है कि आपको भी यही पसंद होगा। सरकारी भूमिकाओं को अलग अलग करना इस ओर पहला कदम बढ़ानें का आसान तरीका हो सकता है।

देश के एक नागरिक के तौर पर मैं भारत में मनपसंद शिक्षा की मांग करता हूं..

नई शिक्षा नीति में कौन कौन से प्रावधान होने चाहिए?

नियामक, वित्त प्रदाता व शिक्षा प्रदाता की सरकार की भूमिका को अलग अलग करें
नियंत्रण की बजाए स्वायत्ता को प्रोत्साहित करें
सभी शिक्षा प्रदाताओं की तीसरे पक्ष से समीक्षा हो
सभी के लिए समान नियम हों
छात्रों के सीखने और अभिभावकों के लिए विकल्प पर ध्यान केंद्रीत हो

 

- नितेश आनंद (एडवोकेसी एसोसिएट, सीसीएस)