सबके लिए नहीं है यह शिक्षा

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एक तरफ़ सरकार ने छात्रों में तनाव कम करने के लिए 10 वीं में ग्रेडिंग सिस्टम लागू किया है, दूसरी ओर अच्छे कॉलेजों में दाखिले के लिए 12 वीं के अंकों को आधार बनाया जा रहा है. क्या इस व्यवस्था से छात्रों में तनाव कम होगा?

दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स ने प्रवेश के लिए जो पहली कट ऑफ़ लिस्ट जारी की है, उसमें गैर कॉमर्स छात्रों के लिए किसी एक विषय में 100 फ़ीसदी अंक तय किये गये हैं. केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल इसे अव्यावहारिक बताकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते हैं. लेकिन डीयू में दाखिले की इस प्रक्रिया ने देश की शिक्षा व्यवस्था की कई खामियों को उजागर कर दिया है. सन 1987 में जब मैंने इसी श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स में दाखिला लिया था तो उस साल 10 लाख बच्चे 12 वीं की परीक्षाओं में बैठे थे और एसआरसीसी में 800 सीटें थीं. 2011 में करीब 1.1 करोड़ बच्चे 12 वीं की परीक्षाओं में शामिल हुए हैं, पर वहां सीटों की संख्या उतनी ही है. जब देश में युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है तो सीटों की संख्या क्यों नहीं बढ़ायी गयी?

देश के प्रमुख कॉलेजों में दाखिले से लिए भीड़ हर साल बढ़ती जा रही है. ऐसे में कॉलेज बेहतर अंक वालों को तरजीह देते हैं, ताकि प्रतिभाशाली छात्रों का चयन हो सके. इसे उचित ठहराने के लिए कॉलेज प्रशासन परंपरा की दुहाई देता है. पर हमें याद रखना चाहिए कि बेहतर नंबर लाना ही योग्यता का पैमाना नहीं हो सकता है. कई ऐसे उदाहरण हैं, जब 12 वीं में अच्छे अंक नहीं लाने के बावजूद छात्रों ने आगे बेहतर प्रदर्शन किया है.

हमारी शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी खामी इस पर सरकारी नियंत्रण भी है. लाइसेंस राज के कारण पिछले 20 साल से उच्च शिक्षा व्यवस्था का विस्तार नहीं हो पाया है. देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था लगातार बदहाल भी होती गयी. कॉलेज और यूनिवर्सिटी में लाइसेंस राज से प्रतिस्पर्धा, गुणवत्ता और खोज की क्षमता प्रभावित होती है. यही वजह है कि उच्च शिक्षा के अधिकतर मान्यताप्राप्त संस्थानों में साल में केवल 180 दिन ही पढ़ाई होती है. शिक्षण का तरीका भी समय के अनुकूल नहीं है. पाठ्यक्रम ऐसे हैं कि डिग्री पाने के बाद भी नौकरी मिलना मुश्किल है.

सरकार को उच्च शिक्षा का व्यापक विस्तार करने के साथ-साथ संस्थानों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ानी चाहिए. साथ ही कम्युनिटी कॉलेज की एक नयी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जहां शिक्षा को रोजगारपरक बनाया जाये. क्योंकि पॉलीटेक्निक स्कूल की व्यवस्था असफ़ल हो चुकी है. इन संस्थानों के पाठ्यक्रम, इन्फ्रास्ट्रक्चर और फ़ैकल्टी स्तरीय नहीं हैं. बदलते समय के साथ उच्च शिक्षा के लिए कॉलेजों को दाखिले की प्रक्रिया में भी बदलाव करना चाहिए. मेरा मानना है कि 20 फ़ीसदी सीटें बेहतर अंक पाने वालों के लिए होनी चाहिए और बाकी सीटों पर दाखिला इंटरव्यू और छात्रों की अन्य गतिविधियों जैसे राइटिंग, रीडिंग स्किल आदि को परखने के बाद होनी चाहिए.

जिंदगी में सफ़ल होने के लिए अन्य गतिविधियों का विकास बेहद जरूरी है. शिक्षा का मतलब सिर्फ़ बेहतर अंक लाना ही नहीं है. शिक्षा छात्रों के पूर्ण विकास पर आधारित होनी चाहिए, ताकि देश और समाज की बेहतरी में भी छात्र योगदान दे सकें. एक तरफ़ सरकार ने छात्रों में तनाव कम करने के लिए 10 वीं में ग्रेडिंग सिस्टम लागू किया है, दूसरी ओर अच्छे कॉलेजों में दाखिले के लिए 12 वीं के अंकों को आधार बनाया जा रहा है. क्या इस व्यवस्था से छात्रों में तनाव कम होगा? इन सबके बीच सीबीएसइ को भी मार्किंग के तरीके के बारे में सोचना होगा. आज 100 फ़ीसदी वाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है. पहले 80 फ़ीसदी लाना ही बड़ी उपलब्धि होती थी. ऐसे में सीबीएसइ को भी बच्चों के भविष्य के बारे में सोचना होगा.

साथ ही कॉलेजों को भी सिर्फ़ सीबीएसइ बोर्ड के मद्देनजर ही सारे निर्णय नहीं लेने चाहिए. सभी राज्यों के अपने-अपने बोर्ड हैं और वहां भी लाखों छात्र 12 वीं की परीक्षा में शामिल होते हैं, लेकिन वहां सीबीएसइ की तरह नंबर नहीं आते हैं. ऐसे में हजारों प्रतिभाशाली छात्र बेहतर कॉलेजों में दाखिले से वंचित रह जाते हैं. आखिर हम देश में कैसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं? हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली की खामियों के कारण लाखों प्रतिभाशाली छात्र बेहतर शिक्षा से वंचित हो रहे हैं. जबकि देश के सभी छात्रों को एक समान मौका मिलना चाहिए. कम से कम स्कूल स्तर तक तो समान शिक्षा प्रणाली लागू होनी चाहिए.

देश में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति से सभी वाकिफ़ हैं. सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत के कारण ही निजी स्कूलों की संख्या दिनों दिन बढ़ रही है. साधन संपन्न लोग अपने बच्चों का दाखिला ऐसे स्कूलों में करवाते हैं, जबकि गरीब लोगों के पास सरकारी स्कूलों के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है. यानी प्राथमिक स्तर पर ही देश में दो तरह की शिक्षा व्यवस्था मौजूद है. सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में बच्चों को बेहतर शिक्षा नहीं मिल पाती है और वे निजी स्कूलों के छात्रों के मुकाबले पिछड़ जाते हैं.

- मनीष सभरवाल

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शिक्षा और स्वास्थ्य मूल भूत अधिकार होने चाहिए. आरक्षण के नाम पर शिक्षा के अधिकार मे असमानता लाई गयी. सरकारी स्कूल खुलते नही और ना ही सरकार जो स्कूल वर्तमान समय मे खुले है, उन का को रख रखाव का रही है. बिल्डर्स जो नेताओ के साथ से सस्ती ज़मीन लेकर स्कूल और कालेजो के मालिक है वो महँगी केपिटेशन फीस के बिना दाखिला नही देते. बिना मोटी रकम दिए कोई भी इस देश मे शिखा नही ले सकता, हाँ आरक्षित वर्ग की बात अलग है. ये व्यवस्था फुट डालो और राज करो की ब्रिटिश सरकार की कड़ी मात्र है. अब हम स्वास्थ्य सेवाओं की बात करे, किसी सड़क दुर्घटना मे सरकार एंबुलेन्स आदमी को ले जाती है, पुलिस केस बनता है, लेकिन सरकार अस्पताल कॉंट्रॅक्टर यानी ठेके दार चला रहे है, बिना आपरेशन का पैसा लिए वो इलाज शुरू नही करते, रही सही कसर डाक्टर निकल देते है वो मरीज़ो को इस हालत मे प्राइवेट कार्पोरेट अस्पताल की तरफ धकेलते है. सरकार जब सड़क दुर्घटना के जीवन की ज़िम्मेदारी नही लेती तो उस व्यवस्था का समूल प्रलय के समान नष्ट होना चाहिए.