सार्वजनिक नीति - लेख

उत्कृष्ट शिक्षा के माधयम से पहुंच में सुधार

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की अति महत्वपूर्ण परियोजना का नाम स्कूल चयन अभियान है और इसे वर्ष 2007 में आरंभ किया गया था। यह ऐसा अभियान है जिसमें वर्तमान भारत के स्कूली शिक्षा पध्दति में बहुत ही जरूरी सुधार किए जाएंगे और इसके लिए शिक्षा प्रमाणकों, नियामक सुधारों और प्रोत्साहक शिक्षा जिज्ञासुओं की त्रि-भुजा पहुंच का प्रयोग किया जाएगा।

40 प्रतिशत भारतवासी अशिक्षित हैं, और सरकारी स्कूल भारत के बच्चों की जरूरतों पर खरे नहीं उतरते। नागरिक समाज केन्द्र गुण सुधार, विशेषकर गरीबों के लिए शिक्षा की पहुंच पर प्रकाश डालता है। नीति निर्धारकों, शिक्षा विशेषज्ञों और आम कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर स्कूली चयन अभियान हमारा ध्यान दाखिले के अवरोधों को हटाने और शिक्षा प्राप्त करने वालों को प्रोत्साहित में केन्द्रित करता है और स्कूलों और कॉलेजों को लाभप्रद बनाते हुए विधि और विस्तार की गुंजाइश और शिक्षा प्रमाणकों के माधयम से प्रतिस्पर्धाओं की ओर आगे बढ़ता है।

अधिक जानकारी के लिये देखें: स्कूल चयन अभियान

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निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किए गए शिक्षा का अधिकार कानून के कारण देश यूनिवर्सल इनरॉल्मेंट के लक्ष्य के करीब तो पहुंच गया लेकिन गुणवत्ता युक्त शिक्षा अब भी हमारे यहां दूर की कौड़ी है। छात्रों के सीखने के स्तर व गुणवत्ता को जांचने वाले अंतर्राष्ट्रीय‘प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पिसा)’कार्यक्रम में भारत 74 प्रतिभागी देशों में 72वें स्थान पर रहा। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) के मुताबिक वर्ष 2010 में सरकारी स्कूलों के चौथी कक्षा के 55.1 फीसदी बच्चे कम से कम घटाव के सवाल हल कर लेते थे,

समाज के कमजोर तबके की सुरक्षा सुनिश्चित करना हर सभ्य समाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। भारत के संदर्भ में बात करेँ तो यहाँ बच्चोँ, महिलाओँ और अल्पसंख्यकोँ की सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सरकार और पूरे समाज के हाथ में है। यहाँ महिलाओँ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के मामले में कई महत्वपूर्ण बाधाएं हैं क्योंकि यहाँ तमाम तरह के पितृसत्तात्मक नियम बना दिए गए हैं जिन्हेँ न सिर्फ महिलाओँ की अधिकतर हिस्से बल्कि तकरीबन सभी पुरुषोँ का समर्थन हासिल है। लेकिन बच्चोँ की सुरक्षा के मामले में सरकारी मशीनरी की शिथिलता, भ्रष्टाचार और जांच के निष्क्रिय व

वर्ष 2018 के लिए बजट पेश करने का समय नजदीक आ गया है। पूर्ण बजट पेश करने का यह मोदी सरकार के कार्यकाल का आखिरी मौका होगा। 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं और वित्त मंत्री का ध्यान सभी को खुश करने पर होगा। आर्थिक प्रगति और विकास का नारा देकर सत्ता में आयी मोदी सरकार का ध्यान शुरू से ही शिक्षा पर भी रहा है। नई शिक्षा नीति लाने का प्रयास इसी एजेंडे के तहत शुरू किया गया था हालांकि इसमें अबतक सफलता नहीं मिल सकी है। स्मृति ईरानी को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय से हाथ धोना पड़ा और प्रकाश जावड़ेकर को बड़ी उम्मीदों के साथ यह जिम्मेदारी सौंपी गई।

- सरकार खुद यह स्वीकार कर चुकी है कि आधार कार्ड के इस्तेमाल से 60,000 करोड रुपये बचे हैं, इसका मतलब है कि सिस्टम में तमाम खामियाँ हैं। 
- सरकार हर बच्चे की स्कूलिंग पर साल में कम से कम 25,000 रुपये खर्च करती है। इसके बावजूद सरकारी स्कूल अच्छी शिक्षा देने में असफल हैं, इसके लिए डिलिवरी सिस्टम ही जिम्मेदार है।

1.3 बिलियन आबादी के साथ भारत की समस्या भी काफी बडी है, यहाँ 1 बिलियन लोग प्रतिदिन 2 डॉलर्स से कम कमाते हैं, 30 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं,

पहली बार कर्नाटक सरकार ने एक प्रस्ताव दिया जिसका उद्देश्य था लोगोँ के लिए व्यक्तिगत स्तर पर स्कूल की शुरुआत करना और उसे चलाना आसान बनाना। प्रस्ताव के अनुसार, एक शैक्षिक संस्थान खोलने के लिए कोई भी प्राइवेट बॉडी लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (एलएलपी) रजिस्टर  कराकर काम कर सकती है, उसके लिए एक सोसायटी अथवा चैरिटेबल ट्रस्ट बनाकर कार्य करने की बाध्यता नहीं होगी। लेकिन इसकी शर्त यह होगी कि इनका प्राथमिक उद्देश्य शिक्षा ही होगा और संस्थान नॉन-प्रॉफिट शेयरिंग आधार पर ही चलेगा।

कल्पना कीजिए कि आप एेसे आदर्शवादी युवा हैं, जिसमें भावी पीढ़ी के बच्चों को प्रेरित करने की महत्वाकांक्षा है। इसलिए आप स्कूल खोलते हैं। आप अपने जैसे ही प्रेरक शिक्षक जुटाते हैं। स्कूल तत्काल सफल हो जाता है और उसे छात्रों, पालकों और समाज का सम्मान प्राप्त होता है। फिर 2010 में एक नया कानून (राइट टू एजुकेशन एक्ट) आता है। इसमें सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षकों में वेतन की समानता की बात है। आप अपने शिक्षकों का वेतन दोगुना कर 25 हजार प्रतिमाह करने पर मजबूर होते हैं। यहां तक कि श्रेष्ठतम निजी स्कूल जैसे दून स्कूल और मेयो को भी वेतन बढ़ाने पड़ते हैं

'यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइज़ेशन' (यूनेस्को) ने हाल ही में वर्ष 2017-18 के लिए 'द ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग (जीईएम) रिपोर्ट' को जारी किया है। रिपोर्ट में दुनियाभर में स्कूली शिक्षा के हालात पर प्रकाश डाला गया है। लेकिन यूनेस्को की रिपोर्ट, भारत में स्कूली शिक्षा को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित नजर आ रही है। रिपोर्ट का नाम 'अकाउंटेबिलिटी इन एजुकेशन' भी भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ज्यादा प्रतीत होता है। यूनेस्को द्वारा जारी रिपोर्ट में भारत सहित अन्य देशों में स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में अकाउंटेबिलिटी अर्थात जवाबदेही

निजी स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोत्तरी और उस पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की तरफ से की जा रही कार्रवाई इन दिनों चर्चा में है। बेशक निजी स्कूलों को मनमाने ढंग से फीस में बढ़ोत्तरी को अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन फीस बढ़ोतरी नियंत्रित कैसे हो इसके तरीके अलग अलग हो सकते  हैं। निजी स्कूलों के फीस नियंत्रण पर चर्चा करने से पहले एक अहम सवाल यह है कि छठवें और सातवें वेतन आयोग के बाद अध्यापकों के वेतन में जो बढ़ोत्तरी हुई है, क्या उसी अनुपात में सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है? जब तक इन सवालों पर विचार नहीं किया जाएगा, सरकारी

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