आर्थिक सुधारों से ही सुधरेगी शिक्षा की तस्वीर

बजट 2017 पेश करने का समय सिर पर आ गया है और शिक्षा व्यवस्था का क्षेत्र ऐसे कुछेक क्षेत्रों में शामिल है जिन पर वित्त मंत्री को तुरंत ध्यान देना चाहिए। हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल तहस-नहस हो चुकी है और उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दे पा रही। हम जब तक इसे दुरुस्त नहीं करेंगे, तब तक अच्छे दिन लाने की सरकार के तमाम कोशिशें बेकार साबित होंगी। 

वर्ष 2010 में ओईसीडी (ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट) की रैंकिंग में पीसा (प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेन्ट्स एसेस्मेंट) के 73 सदस्य देशों में से भारत को 72वां स्थान दिया गया। इसकी प्रतिक्रिया के रूप में भारत ने बाद की रैंकिंग प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन देश से भी बुरी खबर ही मिल रही है। वर्ष 2016 के लिए 18 जनवरी को जारी की गई एनुअल स्टेटस ऑफ एडुकेशन रिपोर्ट में पढ़ाई की गुणवत्ता की दयनीय स्थिति को उजागर किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि तीसरी कक्षा के सिर्फ 25 फीसद छात्र ही दूसरी कक्षा के स्तर की किताबें पढ़ सकने में सक्षम हैं। ऐसे ही चिंताजनक नतीजे हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा कराए गए सर्वे में सामने आए हैं। 

छठी कक्षा के 74% छात्र अपनी हिन्दी पाठ्यपुस्तक से एक पैराग्राफ नहीं पढ़ सके, 46% छात्र दूसरी कक्षा के स्तर की साधारण कहानी नहीं पढ़ सके और 8% छात्र अक्षरों को नहीं पहचान पाए। शिक्षकों के 60 लाख पदों में से 10 लाख पद खाली पड़े हैं। विश्व बैंक के एक अध्ययन के मुताबिक देश में 25% शिक्षक कक्षा में अनुपस्थित रहते हैं। जो शिक्षक स्कूल में मौजूद रहते हैं, उनमें से अधिकतर में न तो अच्छे प्रदर्शन के लिए कोई प्रेरणा होती है और न ही कौशल। इस सब के शिकार होते हैं हमारे नौनिहाल। 

1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में 7 फीसद की औसत वृद्धि दर से विकास हो रहा है। इसके परिणामस्वरुप यह मध्य आय वर्ग का देश बन गया है। क्रय शक्ति में बढ़ोतरी के साथ ही लोगों की आकांक्षाएं भी बढ़ीं हैं। अभिभावक अब बच्चों के लिए बेहतर व्यवस्था चाहते हैं यहां तक कि गरीब अभिभावक भी, जिनके लिए अपने जीवन को बदलने की एकमात्र आशा बच्चों को अच्छी शिक्षा दे कर ही पूरी हो सकती है, पढ़ाई के लिए गैर-सरकारी स्कूलों को चुनने लगे हैं।

गीता गांधी किंग्डन की डिस्ट्रिक्ट इनफॉर्मेशन सिस्टम ऑन एडुकेशन (डीआईएसई) के शुरुआती आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि वर्ष 2010 और 2014 के बीच 13,498 नए सरकारी स्कूल खुलने के बाद भी सरकारी स्कूलों में छात्रों के नामांकन में 1.13 करोड़ की कमी आई है जबकि निजी स्कूलों में 1.85 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। 10.2 लाख सरकारी स्कूलों में से एक लाख स्कूलों में सिर्फ 20 बच्चों का नामांकन हुआ है। इसके अलावा 3.6 लाख सरकारी स्कूलों में छात्रों की अधिकतम संख्या सिर्फ 50 तक है। निश्चित ही ऐसे स्कूलों में निवेश करने का कोई विशेष फायदा नहीं मिल पा रहा है। इसलिए सिर्फ बजट में आवंटन बढ़ा देने से कोई खास फर्क नजर नहीं आने वाला है। 

मौजूदा समय में सरकार शिक्षा पर जीडीपी का 3.8% खर्च करती है जबकि लंबे समय से इस खर्च को 6 फीसद तक बढ़ाने की उम्मीद की जाती रही है। हर वित्त मंत्री को इस मुश्किल परिस्थिति का सामना करना पड़ता है जब खर्च बढ़ाने की उम्मीद हर कोई करता है लेकिन इसका बोझ कोई उठाना नहीं चाहता। यहां पहला सवाल यह है कि, क्या हम शिक्षा पर किए जा रहे खर्च में इस तरह से बदलाव ला सकते हैं कि मौजूदा आवंटन से हमें इस तरह से नतीजे मिलें तो आवंटन बढ़ाने पर मिल सकेगा? हां, ऐसे खर्च जिनसे पैसे को मोल वसूल नहीं हो पाता और बर्बादी को रोक कर। इसलिए हमें असरदार बजट प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। 

अब दूसरा सवाल यह है कि इसे हासिल कैसे किया जाए, खास तौर पर तब जब केंद्र इस संबंध में बहुत कुछ नहीं कर सकता क्योंकि शिक्षा राज्य का विषय है। शिक्षा का अधिकार कानून, 2009 में कई खामियां हो सकती हैं, लेकिन अगर वित्त मंत्री इसके लिए कोई ढांचा तैयार कर पाएं तो इसमें काफी संभावनाएं भी हैं। आरटीई कानून की धारा 12.1 (सी) में निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए 25% सीटें आरक्षित कर मुफ्त पढ़ाई का प्रावधान किया गया है। इससे निजी स्कूलों में गरीब छात्रों के लिए करीब 20 लाख सीटों की व्यवस्था हो गई है। स्कूलों को इसके लिए राज्यों से धन की आपूर्ति कराई जाती है जिसके लिए सर्व शिक्षा अभियान के तहत मानव संसाधन विकास मंत्रालय बजटीय आवंटन करता है। 

लेकिन स्कूलों पर इस प्रावधान को लागू करने में रूचि नहीं दिखाने के आरोप लगे हैं और उनकी शिकायत यह है कि इसके लिए उन्हें कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जा रहा है। प्रजा फाउंडेशन के हाल ही में कराए गए अध्ययन के मुताबिक दिल्ली नगर निगम से स्कूलों में औसतन प्रति छात्र 50,000 रु वार्षिक खर्च होता है। निजी स्कूलों में निश्चित ही इससे ज्यादा खर्च आता होगा। लेकिन दिल्ली सरकार निजी स्कूलों को एक छात्र के लिए 19,000 रु प्रति वर्ष के हिसाब से भुगतान करती है।

वित्त मंत्री इतना कर सकते हैं कि आरटीई एक्ट के तहत इस प्रावधान को लागू करने के लिए आवंटित राशि का भुगतान सीधे छात्रों को कराएं। इसके लिए अभिभावक के खाते में डाइरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर या वाउचर या स्मार्ट कार्ड के जरिए भुगतान की व्यवस्था की जा सकती है। अच्छी बात यह है कि सरकार इस मौके का फायदा उठाने के लिए जरुरी बुनियादी ढांचा तैयार कर चुकी है। करीब 92% बच्चों के पास आधार कार्ड और उनके अभिभावकों के पास बैंक खाते हैं। इससे हर बच्चे की व्यक्तिगत रूप से निगरानी संभव है। एक बार गरीबों तक सीधा लाभ पहुंचने लगे तो उनके पास यह विकल्प होगा कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजे और क्रय शक्ति बढ़ने से, स्कूलों पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार का दबाव भी बढ़ेगा। 

इससे शिक्षा में निजी क्षेत्र समानता के साथ ही अच्छी शिक्षा देने में कारगार साबित होंगे जो सार्वजनिक क्षेत्र का लक्ष्य है। इसलिए, संविधान में दिए गए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को बुनियादी अधिकार बनाने के अधिकार (86वां संशोधन), आरटीआई एक्ट के रूप में कानून की ताकत, धन मुहैया कराने की व्यवस्था और बुनियादी ढांचे के अपनी जगह दुरुस्त होने पर, मुझे मौजूदा वित्त मंत्री के सामने शिक्षा व्यवस्था का वास्तुकार बन सकने की बड़ी संभावनाएं दिखाई दे रही हैं, लगभग वैसे ही, जैसे 1991 में डॉ मनमोहन सिंह, आर्थिक सुधारों के वास्तुकार बन गए थे।  

- अमित चंद्र; लेखक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के एसोसिएट डाइरेक्टर हैं।
पूर्व प्रकाशित स्वराज मैगजीन
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