भारत मे आर्थिक सुधार की गति और ज़रूरी सबक

विदेशी मुद्रा में पूर्णतया कंगाल होने के बाद ही देश के राजनीतिक वर्ग को 1991 में आर्थिक सुधार लाने की सुध आयी. डेंग ज़ियाओपिंग के नेतृत्व में चीन में 12 साल पहले ही आर्थिक सुधार शुरू हो चुके थे. ये देर से की गयी शुरुआत एक महत्त्वपूर्ण वजह है कि आज भारत और चीन के विकास में इतना फासला है. भारत में दो चरणों में सुधारों को क्रियान्वित किया गया: पहला चरण था 1991 से 1993 के बीच प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हाराव के नेतृत्व में और दूसरा चरण था 1997 से 2004 के बीच प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व काल में. इसके विपरीत, चीन में सुधारों का सिलसिला अनवरत चलता आ रहा है.

हाल ही में गुडगाँव में संपन्न हुई मोंट पेलेरिन सोसाइटी की एशिया रीजनल मीटिंग में ये विचार व्यक्त करते हुए भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री और लेखक-पत्रकार अरुण शौरी ने कहा कि जिस समय हमारे देश को विदेशी मुद्रा की बहुत ज़रुरत थी उस समय सरकार द्वारा उन कड़े लाइसेंसों को हटाना जो आयात, निर्यात और अन्य उत्पादन पर रोक लगाते थे, अपने आप में एक बड़ा छलांग थी. पर उदारीकरण के लिए ज्यादा बड़े कदम उठाने की आवश्यकता थी. सार्वजनिक इकाइयों से सरकारी धन का छोटा सा विनिवेश काफी नहीं था. असली प्रबंधन तो सरकार के ही हाथों में रह गया. सरकारी ईक़ुइटी की बिक्री से जो धन प्राप्त हुआ वो समस्त सरकारी घाटे को दूर करने में ही चला गया. वहीँ उस इकाई का चरित्र पहले की ही तरह सरकारी, अक्षम और गैरजिम्मेदाराना रह गया. उदारीकरण के दूसरे चरण में सरकार ने असली स्वामित्व और नियंत्रण निजी हाथों में देने की कोशिश करी पर स्वाभाविक रूप से इस राह में बहुत प्रतिरोध का सामना करना पड़ा.

जब कि पिछले चार सालों में जब ये कहा जा रहा था की केंद्र में सुधारको की एक आदर्श टीम मौजूद है, नागरिक उड्डयन छोड़ सभी सेक्टरो में सुधार की गति ना के बराबर बनी हुई है. श्री शौरी ने कहा इस ठहराव से हमें एक अहम सीख प्राप्त होती है. और वो ये है कि यदि कुछ नेता बहुत अच्छे कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पढ़े हुए हैं और यदि वो प्रतिष्ठित सामाजिक हलकों में सुधार की भाषा बोलते हैं, इस का अर्थ ये नहीं होता की वो अंत में वही करेंगे जो ज़रूरी है.

सब से अहम बात ये है कि अभी तक जो भी सुधार हुए हैं वो आर्थिक नीति के क्षेत्र मं  हुए हैं और प्रशासन तथा सरकरी प्रणाली को सुधारने की दिशा में कुछ भी नहीं हुआ.

उलटे इन मामलो में पिछले तीन दशकों में केवल और अधिक क्षय ही हुआ है. सालो साल से चलती आ रही सुस्त व भ्रष्ट प्रणाली और नियमो को ताक में रखने वाली व्यवस्था कहाँ तक देश के आर्थिक स्वास्थ्य को सुद्रण रख पाएगी, उन्होने कहा.

फिर भी एक सवाल उठता है है कि अगर भारत में आर्थिक सुधार इतने  अनियमित रहे हैं तो देश में विकास कि दर इतनी अच्छी कैसे चलती आ रही है ? जवाब एकदम सीधा है: भारतीय उद्यमी और कामकाजी वर्ग में बहुत अधिक सामर्थ्य है और जितनी भी जगह अभी तक हुए सुधारों ने साफ करी, उसमे ही इन दो वर्गो ने काफी तरक्की कर ली. इस से ये पता चलता है कि अगर एक तरफ हम सुधार की गति बनाये रखें और दूसरी तरफ सरकारी कार्य प्रणाली को और चुस्त तथा मुस्तैद करें तो इन दो वर्गो को अपनी प्रतिभा और कौशल काम में लाने का और निखारने का अच्छा मौका मिलेगा.

उन्होने कहा कि इस समय भारत में सब से अधिक महत्त्वपूर्ण है सामान्य शासन को सुधारना और सिर्फ आर्थिक सुधारों से ये कठिन लक्ष्य हासिल नहीं होगा. लोगों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी तभी सुधरेगी जब सरकारी कार्य प्रणाली ठीक हो सकेगी. इसी के साथ हमारे उद्यमियों, और यहाँ तक की सामान्य मध्यम वर्ग को भी आगे बढ़कर सार्वजनिक क्षेत्र में अपना कौशल और उर्जा देनी पड़ेगी तथा व्यवस्था में सुधार के लिए बोलना पड़ेगा. अगली सरकार कैसी होती है ये भी एक चिंतनीय प्रश्न है क्यूंकि देश की विकास की गति अगले प्रधान मंत्री और उनकी टीम के लिए गए फैसलों पर बहुत अधिक निर्भर करेगी.

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