शिक्षा की राह में उलझाव का क्या काम?

विकास की मंजिल पाने की मुख्य राह शिक्षा दिखाएगी। तरक्की में शिक्षा अहम है। यह जुमला विद्वानों की सभा से लेकर, गोष्ठिïयों, संगोष्ठियों में खूब सुनाई देगा। मगर उज्जवल भविष्य की नींव कहलाने वाली शिक्षा, आम जन की पहुंच से उतनी दूर और मुश्किल हो रही है, जैसे मंगल पर पानी की खोज। चुनावी बिसात पर बैठे नेताओं ने अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा को आरटीई के सांचें में ढाला। मगर यहां भी बढ़ती मुनाफाखोरी ने अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को कुचलता हुआ आगे निकल गया। स्कूलों के गेट पर सुबह ६ बजे से बच्चों के एडमिशन के लिए लगी अभिभावकों की लंबी कतारों से जाहिर होता है, कि अधिकतम कमाने की भूख ने विकास के उस मॉडल को मसल दिया है जिसे सर्वपल्ली राधाकृष्णन, सावित्री बाई फुले और पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉ. एपीजे कलाम ने शिक्षा की नींव पर खड़ा किया था।

शहरों में निजी स्कूल संचालन का कार्य बच्चों को अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने की बजाय, माफियाओं को एक सुरक्षित व्यवसाय देना बन कर रह गया है। नर्सरी में बच्चे के प्रवेश से लेकर उसके टीसी निकलवाने जैसी हर चीज की कीमत तय हो गई है। अपने लाडले को कलेक्टर या इंजीनियर बनाने का सपना देखने वाले माता-पिता का काम, अब बच्चे को स्कूल में दाखिला कराने से नही चलता। स्कूल के प्रॉस्पेक्टस से लेकर मासिक शुल्क और तमाम मैंटेनेंस शुल्क की सूची इतनी बड़ी है कि निजी कंपनी का साधारण नौकरीपेशा पिता अकेले यह खर्च उठा नहीं सकता। मजबूरन मैट्रो शहरों व इनसे जड़े तमाम सेटेलाइट शहरों में बच्चे को पढ़ाने के लिए अब मां को भी नौकरी की दुनिया में कदम रखना पड़ रहा है। शिक्षा की व्यवसायिकता पर यहीं पूर्ण विराम नहीं लगता। बच्चे को अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए आपको जेब की मजबूती के साथ पैरों की मजबूती होना भी बेहद जरुरी है।

नर्सरी में किसी अच्छे स्कूल में दाखिले के लिए शहर के तमाम स्कूलों के बाहर सुबह से प्रवेश फार्म और प्रास्पेक्टस के लिए लगी लंबी लाइनों में दंगल करना होगा। दफ्तर, दुकान छोडक़र धक्के खाकर प्रॉस्पेक्टस और प्रवेश फार्म लेना पड़ेगा। स्कूल की जांच-पड़ताल और प्रवेश की बुनियादी प्रक्रिया में हजारों रुपए की भेंट चढ़ानी होगी। कहीं एक हजार रुपए का प्रॉस्पेक्टस मिलेगा, तो कहीं 15 सौ रुपए का। नामचीन निजी विद्यालयों के प्रवेश फार्मों की कीमतें भी हर साल महंगाई के साथ आसमान छूती जाती हैं। पांच सौ रुपए से 25 सौ रुपए में केवल प्रास्पेक्टस सह प्रवेश फार्म मिलेंगे। 10 स्कूलों के प्रवेश फार्म लेना यानि, एक मध्यम वर्गीय परिवार की एक माह की आमदनी। दफ्तर से छुटटी लेकर पहले फार्म लेना, फार्म में लिखी बेबुनियाद जरुरतों को पूरा करना। बच्चे के बजाय माता-पिता की जन्मतिथि, माता-पिता की आय का स्त्रोत, बच्चे को स्कूल छोडऩे कौन से वाहन से आएंगे, घर में नौकर हैं या नहीं स्कूलों के ऐसे सवाल हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि स्कूल नहीं मैट्रीमोनियल साइट पर पंजीयन चल रहा हो। 10 पन्नों के फार्म को भरना, फिर स्कूल के तयशुदा बैंक में जमा करना बिगबॉस के टॉस्क को पूरा करने सरीखा है। एडमिशन बच्चे का लेकिन किताबों का रट्टा माता-पिता लगाते हैं। पता नहीं कौन से स्कूल में साक्षात्कार में अभिभावकों से क्या सवाल पूछ लिया जाए। जवाब न दे पाए तो सारी मेहनत पर अयोग्यता का ठप्पा लग जाएगा। अगले साल नर्सरी में दाखिले के लिए दोबारा उतने ही धक्के खाने पड़ेंगे, जितने अभी खाए हैं।

90 के दशक के बाद से सरकारों ने यकीनन अर्थव्यवस्था को व्यवसायीकरण और तकनीकि का अमलीजामा पहनाया है और इसका अंतर भी साफ देखा जा सकता है। बैंक और जरुरी सेवाओं ने तकनीकि का लिहाफ ओढक़र खुद को संवारा है। डाक, बैंक व अन्य सरकारी सेवाएं इंटरनेट, ऑनलाइन सुविधाओं आदि के दम पर जनता के और करीब पहुंची हैं, मगर शिक्षा का क्षेत्र का कथित व्यवसायीकरण होने के बाद भी आमजन से और दूर होती जा रही है। अपने ही बच्चे के प्रिंसिपल से मिलने के लिए अभिभावकों को दफ्तर से छुट्टी लेकर अपांइटमेंट लेना पड़ता है। स्कूल प्रोजेक्ट से लेकर शिक्षा के नाम पर स्कूलों में आए दिन नए-नए शुल्क इजाद किए जाते हैं। जिसका सीधा बोझ आम आदमी की जेब पर जाता है। अब सवाल यह है कि उदारीकरण और बाजारीकरण के बाद जब अन्य सरकारी और गैरसरकारी सेवाओं में आमूल चूल परिवर्तन हो सकता है और जनता को इसका लाभ मिल सकता है तो शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? आखिर क्या कारण है कि शिक्षा के क्षेत्र की उपरोक्त वर्णित समस्याओं का समाधान निकलने की बजाए वर्ष दर वर्ष और उलझता जा रहा है?

दरअसल, इसका एक सबसे बड़ा कारण सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता का लगातार रसातल में गिरते जाना और अच्छे और छात्रों की संख्या के अनुपात में नए निजी स्कूलों का कम खुलना है। यह सत्य है कि अभिवावकों के बीच अपने बच्चों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा दिलाने को लेकर जागरुकता बढ़ी है। इसके साथ ही अभिभावकों में अन्य जरूरी कार्यों में होने वाले निवेश में कटौती कर उस पैसे को बच्चों की अच्छी शिक्षा में खर्च करने की भी चाहत बढ़ी है। चूंकि इस मांग और पूर्ति के बीच बड़ी खाई है जिसका फायदा निजी स्कूल संचालकों द्वारा उठाया जाता है। इसे एक साधारण उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। मान लेते हैं कि स्कूल चलाना एक व्यवसाय है और स्कूल संचालक एक व्यवसायी। इस प्रकार, बच्चों का दाखिला कराने पहुंचने वाले अभिभावक उपभोक्ता हुए प्रतिस्पर्धा युक्त मुक्त बाजार का नियम है कि यदि किसी वस्तु की मांग बढ़ती है तो व्यवसायी वस्तु की आपूर्ति बढ़ाते हुए मांग को पूरा कर अपने लाभ को बढ़ाता है। किंतु क्रोनीइज़्म अर्थात सरकार की मिलीभगत से यदि बाजार में प्रतिस्पर्धा की स्थिति पैदा होने से रोकी जाती है तो व्यवसायी वस्तु का उत्पादन बढ़ाने की बाजाए उसकी कीमत बढ़ाकर लाभ को अधिकतम करते हैं। वर्तमान में शिक्षा के क्षेत्र में भी यही क्रोनीइज़्म की हालत है। सरकार द्वारा नए स्कूल खोलने की राह में तमाम लाइसेंस और परमिट के रोड़े पैदा किए गए हैं, जिनके कारण शिक्षा के प्रति समर्पित लोगों का प्रवेश आसानी से संभव नहीं हो पाता। यही कारण हैं कि बड़े व नए स्कूल खोलने की अनुमति अधिकांशतः बड़े पूंजीपतियों व नेताओं तथा अधिकारियों को ही मिल पाती है। 

नए स्कूलों के खुलने व खासतौर से निजी स्कूलों में बढ़ती फीस और तमाम शुल्कों पर लगाम कसने केलिए जरुरी है कि स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा का माहौल निर्मित किया जाए। ठीक वैसे ही जैसे रिलांयस जियो द्वारा 4जी का फ्री इंटरनेट नेटवर्क देने से तमाम मोबाइल कंपनियों में खलबली मची, तो कंपनियों ने अपने महंगे इंटरनेट पैक के दाम घटाए, साथ ही बेहतरीन नेटवर्क देना शुरू किया। ठीक इसी तरह स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा बढऩे से यकीनन उनकी फीस और प्रवेश के कड़े नियमों में बदलाव आएगा। इसके लिए स्थानीय स्तर पर अच्छे स्कूलों की संख्या बढ़ानी होगी। शहर के एक इलाके में एक से अधिक स्कूल होने की स्थिति से अभिभावकों के सामने विकल्प होगा। जिस विद्यालय में अभी पांच सौ छात्र प्रवेश के लिए लाइन लगाते हैं, उसी विद्यालय में प्रवेश के लिए फिर कुल 150 छात्र रह जाएंगे। स्कूल स्वयं प्रवेश के नियमों में बदलाव लाएंगे। स्कूलों की दुकानदारी कम होगी, शिक्षा का स्तर बढ़ेगा और फीस की रकम घटेगी। इसलिए स्कूलों की संख्या को हर हाल में बढ़ाना होगा। निजी, सरकारी दोनों क्षेत्रों में स्कूलों की संख्या बढऩा तभी संभव होगा जब सरकार स्कूल खोलने और बोर्ड द्वारा मान्यता संबंधी नियमों में लचीलापन लाए। 

सस्ती, अनिवार्य, गुणवत्तापरक शिक्षा देने केलिए इन स्कूलों को खोलने के नियम आसान हों। मान्यता प्रणाली को सरल बनाया जाए। केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालय, शासकीय, अद्र्धशासकीय और निजी स्कूलों के लिए अलग-अलग नियम बनाना भी जरुरी है। नियम आसान होंगे तो स्कूल खोलने वालों की संख्या में इजाफा होगा। स्कूल संचालक सिर्फ भ्रष्टाचारी, राजनैतिक सिफारिश वाले शिक्षा माफिया नहीं होंगे, अच्छे शिक्षक, समाजसेवी व सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य भी तब स्कूल खोल पाएंगे। इसके साथ बच्चे को स्कूल स्वयं चुनने का अधिकार दिया जाए। इस अधिकार में आवेदक स्वयं स्कूल में जाकर संपर्क करने के बजाय, सरकार के माध्यम से लॉटरी द्वारा स्कूलों को बच्चे अलॉट किए जाएं। लॉटरी प्रक्रिया के तहत सरकार इलाकेवार स्कूलों की सूची जारी कर बच्चों से मनपसंद स्कूल का आवेदन आमंत्रित करे। 

आवेदन ऑनलाइन या ऑफलाइन दोनों हो सकते हैं। प्राप्त आवेदनों में लॉटरी निकालकर बच्चों को स्कूल आबंटित किया जाए। जिस बच्चे की लॉटरी में जो स्कूल आए उसे सरकार स्वयं उस स्कूल में भेजे। जब शिक्षा विभाग या जिला प्रशासन के माध्यम से सीधे बच्चे स्कूल में जाएंगे तो प्रवेश शुल्क, प्रॉस्पेक्टस फीस और प्रवेश के लिए स्कूलों के बाहर सुबह से ही लगने वाली लंबी कतारों की समस्या खुद ब खुद हल हो जाएगी। अभिभावकों को दफ्तर छोडक़र स्कूल के बाहर खड़े होने के झंझट से भी मुक्ति मिलेगी। स्कूलों के  एकाधिकार और मनमानी पर सीधे तौर पर प्रतिबंध लगेगा। स्कूल भी ज्यादा से ज्यादा बच्चों को अपने स्कूल में लाने केलिए फीस घटाएंगे, गुणवत्तापरक शिक्षा और सुरक्षित माहौल केप्रति संवेदनशील होंगे। सरकार को स्कूल खोलने के नियमों व दांवपेचों को उलझाने के बजाय सरल कर सुलझाना होगा। निजी और बड़े स्कूलों के नियम अलग, सस्ती फीस वाले स्कूलों के नियम अलग हों। ताकि स्कूल संचालक मान्यता के लिए भ्रष्टाचार के रास्ते से बचेंगे और इसका सीधा और सकारात्मक असर स्कूलों की फीस और शिक्षा की गुणवत्ता पर पर देखने को मिलेगा।

- शालू अग्रवाल (लेखिका वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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