निजीकरण ही है अंतिम समाधान

यह अच्छा है कि वर्तमान मोदी सरकार विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए अपने पूर्ववर्ती सरकारों की भांति भावुकता की बजाए व्यावहारिकता के आधार पर फैसले लेती दिख रही है। वित्तमंत्री अरुण जेटली के राज्यसभा में दिया गया वह बयान जिसमें कि उन्होंने घाटे में चल रही 79 सार्वजनिक इकाईयों को निजी करने के विकल्प को खुला रखने की बात कही थी, इसका ज्वलंत प्रमाण है। स्थिति की गंभीरता को और अधिक स्पष्ट करते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि यदि सिर्फ उक्त 79 इकाईयों में लगे निवेश की धनराशि को ही वसूल लिया जाए तो देश के प्रत्येक नागरिक को 1,30,000 रुपए प्राप्त हो सकते हैं। वित्तमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार अब ऐसी इकाईयों को और नहीं झेल सकती और उसके पास उक्त इकाईयों को विनिवेश के लिए खोलने के अलावा और कोई चारा नहीं है।

विदित हो कि सरकार द्वारा विभिन्न सार्वजनिक इकाईयों में किए गए निवेश से आय होने की बजाए प्रतिवर्ष 10,000 करोड़ से ज्यादा की धनराशि और खर्च की जा रही है। अब सरकार ने ऐसी इकाईयों में विनिवेश करने का फैसला लिया है तो इसे कुल मिलाकर सही कदम ही कहा जाएगा। हालांकि विनिवेश भी अंतिम समाधान नहीं है। मरणासन्न सार्वजनिक इकाईयों का अंतिम समाधान उन्हें बंद कर देना अथवा उसका निजीकरण कर देना ही हो सकता है। इसप्रकार, यदि वित्तमंत्री यह बयान देते हैं कि सरकार ने उक्त इकाईयों के निजीकरण के विकल्प खुले रखे हैं तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। वैसे भी प्रधानमंत्री मोदी भी स्वयं ये कबूल करते हैं कि व्यापार करना सरकार का काम नहीं, बल्कि व्यापारी माहौल तैयार करना सरकार का काम है।

विनिवेश और निजीकरण की बात करते समय हमें इन दोनों के बीच के मौलिक फर्क को जानना जरूरी है। सार्वजनिक इकाईयों में विनिवेश से तात्पर्य यह है कि उसमें अधिकतम 49 प्रतिशत की हिस्सेदारी निजी हो सकती है। इस प्रकार, उस इकाई पर स्वामित्व सरकार का ही होता है बस एक बोर्ड का गठन कर उसके डायरेक्टर, जो कि गैरसरकारी व्यक्ति होता है, नियुक्त कर दिए जाते हैं। जबकि निजीकरण की स्थिति में कम से कम 51 प्रतिशत की हिस्सेदारी निजी शेयरधारकों की होती है। इस प्रकार व्यापार में सरकारी दखलंदाजी न्यूनतम हो जाती है।

उदारवादी अर्थशास्त्रियों के मुताबिक भी सरकार को सबकुछ स्वयं न करके सिर्फ उन्हीं कार्यों को अपने हाथ में लेना चाहिए जो निजी संस्थाओं द्वारा किया जाना संभव ना हो, जैसे कि देश की सुरक्षा व्यवस्था। इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यापार आदि का कार्य निजी/बाजार करे तो ही बेहतर है। उदाहरण के लिए कोयले की खुदाई, घड़ियों का निर्माण, ट्रैक्टर अथवा कारों का उत्पादन। इतिहास गवाह रहा है कि जिन जिन देशों में सरकारों ने समस्त कार्य खुद करने शुरू किए, उन उन देशों में जनता ही घाटे में रही है।

 

- अविनाश चंद्र